बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 194, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८८ | वृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| विरुद्धं बहु तर्कयद्भिर्व्याकुलीकृतः शास्त्रार्थः, तेनार्थनिश्चयो दुर्लभः। ये तु केवलशास्त्रानुसारिणः शान्तदर्पास्तेषां प्रत्यक्षविषय इव निश्चितः शास्त्रार्थो देवतादिविषयः। | बहुत-से विरुद्ध तर्क करते हैं उन तार्किकोंने तो शास्त्रको दुर्विज्ञेय कर दिया है, इससे उसके तात्पर्यका निश्चय होना कठिन हो गया है। किंतु जो केवल शास्त्रका ही अनुसरण करनेवाले और दर्पहीन पुरुष हैं उन्हें तो शास्त्रका देवतादि-विषयक अभिप्राय प्रत्यक्षके समान निश्चित है। | | तत्र प्रजापतेरेकस्य देवस्यात्राद्यलक्षणो भेदो विवक्षित इति तत्राग्निरुक्तोऽत्ता, आद्यः सोम इदानीमुच्यते—अथ यत्किञ्चेदं लोक आर्द्रं द्रवात्मकं तद्रेतस आत्मनो बीजादसृजत; “रेतस आपः” (ऐ० उ० १ । ४) इति श्रुतेः। द्रवात्मकश्च सोमः। तस्माद्यदार्द्रं प्रजापतिना रेतसः सृष्टं तदु सोम एव। | इतना निश्चय हो जानेपर अब एक देव प्रजापतिके अत्ता (भोक्ता) और आद्य (भोग्य) रूप भेदका निरूपण करना अभीष्ट है, उसमें 'अत्ता' रूप अग्निका वर्णन तो कर दिया गया, अब 'आद्य' रूप सोम-का वर्णन किया जाता है। यह जो कुछ लोकमें आर्द्र--द्रवात्मक है उसे उसने अपने बीज रेतस् (वीर्य) से उत्पन्न किया; जैसा कि “रेतस्से जल हुआ” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। सोम भी द्रवात्मक होता है। अतः प्रजापतिके द्वारा जो कुछ अपने वीर्यसे द्रवात्मक रचा गया है वह सोम ही है। | | एतावद्वै एतावदेव नातोऽधिकमिदं सर्वम्। किं तत्? अन्नं चैव सोमो द्रवात्मकत्वादाप्याय- | यह सब इतना ही है, इससे अधिक नहीं है। वह क्या है? यही कि द्रवात्मक होनेके कारण |