भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 226
२२०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| ज्ञानात्मविज्ञाननिवृत्तिरिति चेत् ? | मात्रसे ही अब्रह्म एवं अनात्मविज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती। | | न; "तत्त्वमसि" ( छा०उ० ६।८—१६) "नेति नेति" (बृ०उ०२।३।६) "आत्मैवेदम्" ( छा० उ० ७।२५।२) "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) ब्रह्मैवेदममृतम्" (मु० उ० २।२।११) "नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ" (बृ० उ० ३।८।११) "तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि" (के०उ० १।४) इत्यादिवाक्यानां तद्वादित्वात्। | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि "तू वह है", "यह (कार्य) आत्मा नहीं है, यह (कारण) आत्मा नहीं है", "यह सब आत्मा ही है", "एक ही अद्वितीय है" "यह अमृत ब्रह्म ही है", "इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है", "उसीको तू ब्रह्म जान" इत्यादि वाक्य उस (अनात्मप्रतिषेध) का ही प्रतिपादन करनेवाले हैं। | | द्रष्टव्यविधेर्विषयसमर्पकाण्येतानीति चेत् ? | पूर्व०—ये तो ^१द्रष्टव्यविधिके विषयको समर्पण करनेवाले हैं। | | न, अर्थान्तराभावादित्युक्तोत्तरत्वात्। आत्मवस्तुस्वरूपसमर्पकैरेव वाक्यैः "तत्त्वमसि" इत्यादिभिः श्रवणकाल एव तद्दर्शनस्य कृतत्वाद् द्रष्टव्यविधेर्नानुष्ठानान्तरं कर्तव्यमित्युक्तोत्तरमेतत्। | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो; क्योंकि 'इनका अर्थान्तर नहीं हो सकता' ऐसा कहकर हम इसका उत्तर पहले ही दे चुके हैं। आत्मवस्तुके स्वरूपको समर्पण करनेवाले "तत्त्वमसि" इत्यादि वाक्योंसे ही उनके श्रवणकालमें ही आत्मदर्शन हो जानेके कारण द्रष्टव्यविधिसे कोई अन्य अनुष्ठान कर्त्तव्य नहीं है—इस प्रकार इसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है। |


१. 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' इस वाक्यसे होनेवाली विधि।