भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 257
ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ२५१
संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
(बृ० उ० ३ । ९ । २६) "अशनायाद्यत्येति" "य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युः" (छा० उ० ८ । ७ । १) "एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने" (बृ० उ० ३ । ८ । ९) इत्यादिश्रुतिभ्यः। कणादाक्षपादादितर्कशास्त्रेषु च संसारिविलक्षण ईश्वर उपपत्तितः साध्यते। संसारदुःखापनयार्थित्वप्रवृत्तिदर्शनात्स्फुटमन्यत्वमीश्वरात्संसारिणोऽवगम्यते। "अवाक्यनादरः" (छा० उ० ३ । १४ । २) "न मे पार्थास्ति" (गीता ३ । २२) इति श्रुतिस्मृतिभ्यः ।"क्षुधादिका उल्लङ्घन किये हुए है", "जो आत्मा निष्पाप, जराशून्य और मृत्युहीन है" "निश्चय इस अक्षरके प्रकृष्ट शासनमें" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। कणाद और गौतमादिके तर्कशास्त्रोंमें भी युक्तिसे संसारी जीवसे पृथक् ईश्वर सिद्ध किया जाता है। संसारदुःखकी निवृत्तिके प्रयोजनसे जीवकी प्रवृत्ति देखी जानेके कारण ईश्वरसे जीवका अन्यत्व स्पष्टतया ज्ञात होता है; जैसा कि [आत्मा] "वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है" इस श्रुतिसे और "हे पार्थ! मेरा कोई कर्तव्य नहीं है" इस स्मृतिसे सिद्ध होता है।
"सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः" (छा० उ० ८ । ७ । १) "तं विदित्वा न लिप्यते" (बृ० उ० ४ । ४ । २३) "ब्रह्मविदाप्नोति परम्" (तै० उ० २ । १ । १) "एकधैवानुद्रष्टव्यमेतत्" (बृ० उ० ४।४।२०) "यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वा" (३ । ८ । १०) "तमेव धीरो विज्ञाय" (४ । ४ । २१) "प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते" (मु० उ० २ । २ । ४) इत्यादिकर्मकर्तृनिर्देशाच्च ।इसके सिवा "वह अन्वेषण करने योग्य और विशेषरूपसे जिज्ञासा करने योग्य है", "उसे जानकर लिप्त नहीं होता", "ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता है," "इसे एक रूपसे ही देखना चाहिये", "हे गार्गि ! जो कोई इस अक्षरको न जानकर," "बुद्धिमान् पुरुष उसे ही जानकर", "प्रणव धनुष है, आत्मा (मन) बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य है" इत्यादि वाक्योंसे जीव और ईश्वरका कर्तृत्व और कर्मत्व बतलाये जानेसे भी [उनमें भेद सिद्ध होता है]।