बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 260, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 260
| २५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| इति सहस्रशो ब्रह्मात्मशब्दयोः सामानाधिकरण्यादेकार्थत्वमेवेत्यवगम्यते। अन्यस्य ह्यन्यत्वे सम्पत्क्रियते नैकत्वे। "इदं सर्वं यदयमात्मा" (बृ० उ० २।४।६) इति च प्रकृतस्यैव द्रष्टव्यस्यात्मन एकत्वं दर्शयति। तस्मान्नात्मनो ब्रह्मत्वसम्पदुपपत्तिः। | सहस्रों श्रुतियोंसे 'ब्रह्म' और 'आत्मा' शब्दोंका सामानाधिकरण्य देखे जानेसे इनका एक ही अर्थ है—यह बात ज्ञात होती है। तथा एक पदार्थसे दूसरेके भिन्न होनेपर ही [उसकी तद्रूपताका] सम्पादन किया जाता है, एक होनेपर नहीं। किंतु "यह जो कुछ है सब आत्मा है" यह श्रुति इस प्रकृत द्रष्टव्य आत्माका एकत्व दिखलाती है। अतः आत्माके लिये ब्रह्मत्व-सम्पादन करना उपपन्न नहीं है। |
| न चाप्यन्यत्प्रयोजनं ब्रह्मोपदेशस्य गम्यते, "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" (मु० उ० ३।२।९) "अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि" (बृ० उ० ४।२।४) "अभयं हि वै ब्रह्म भवति" (४।४।२५) इति च तदापत्तिश्रवणात्। सम्पत्तिश्चेत्तदापत्तिर्न स्यात्। न ह्यन्यस्यान्यभाव उपपद्यते। | इसके सिवा ब्रह्मोपदेशका कोई दूसरा प्रयोजन भी जाना नहीं जाता; क्योंकि "ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही होता है," "हे जनक! निश्चय तू अभयको प्राप्त हो गया है," "[जो ब्रह्मको इस प्रकार जानता है] वह निर्भय ब्रह्म हो जाता है।" इत्यादि वाक्योंसे ब्रह्मकी प्राप्ति सुनी गयी है। यदि आत्माकी ब्रह्मसम्पत्ति विवक्षित होती तो उसे ब्रह्मत्वकी प्राप्ति नहीं हो सकती थी, क्योंकि एक वस्तुका अन्यभाव हो जाना सम्भव नहीं है। |
| वचनात् सम्पत्तेरपि तद्भावा- | पूर्व०—श्रुतिका १ वचन होनेके कारण ब्रह्मसम्पत्तिसे भी ब्रह्मभावकी |
१. 'तं यथा यथोपासते तदेव भवति'—उसे जिस-जिस प्रकार उपासना करता है तद्रूप ही हो जाता है—यही श्रुतिका वचन है।