बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 266, कुल 1402 में से
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२६० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
[आत्मस्वरूप-विवेचनम्]
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| विकः, यमात्मानं विदितवद्ब्रह्म। | भाविक आत्मा कौन है? जिसे ब्रह्मने जाना। |
| ननु न स्मरस्यात्मानम्, दर्शितो ह्यसौ, य इह प्रविश्य प्राणित्यपानिति व्यानित्युदानिति समानितीति। | **सिद्धान्ती—**क्या तुम्हें आत्माका स्मरण नहीं रहा; उसे 'जो यह शरीरमें प्रवेश करके प्राण, अपान, व्यान, उदान और समानकी क्रियाएँ करता है वह आत्मा है' इस प्रकार प्रदर्शित किया था। |
| ननु 'असौ गौः, असावश्वः' इत्येवमसौ व्यपदिश्यते भवता नात्मानं प्रत्यक्षं दर्शयसि। | **पूर्व०—**किंतु 'वह गौ है, वह घोड़ा है' इत्यादिरूपसे तुम उसका नामनिर्देश तो करते हो, परंतु आत्माको प्रत्यक्ष नहीं दिखाते। |
| एवं तर्हि द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता, स आत्मेति। | **सिद्धान्ती—**तो फिर ऐसा समझो कि जो द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता है, वह आत्मा है। |
| नन्वत्रापि दर्शनादिक्रियाकर्तुः स्वरूपं न प्रत्यक्षं दर्शयसि। न हि गमिरेव गन्तुः स्वरूपं छिदिर्वा छेत्तुः। | **पूर्व०—**किंतु यहाँ भी तुम दर्शनादि क्रिया करनेवालेका स्वरूप प्रत्यक्ष नहीं दिखाते। जाना ही जानेवालेका और छेदन ही छेदन करनेवालेका स्वरूप नहीं है। |
| एवं तर्हि दृष्टेर्द्रष्टा श्रुतेः श्रोता मतेर्मन्ता विज्ञातेर्विज्ञाता, स आत्मेति। | **सिद्धान्ती—**तो फिर जो दृष्टिका द्रष्टा, श्रुतिका श्रोता, मतिका मन्ता और विज्ञातिका विज्ञाता है, वही आत्मा है—ऐसा समझो। |
| नन्वत्र को विशेषो द्रष्टरि? यदि दृष्टेर्द्रष्टा, यदि वा घटस्य | **पूर्व०—**किंतु इससे द्रष्टामें क्या विशेषता हुई? चाहे दृष्टिका द्रष्टा हो चाहे घटका द्रष्टा, वह तो सब |