बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 268, कुल 1402 में से
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| २६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| स्यात् । द्रष्टुस्तु नित्या दृष्टिः “न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते”—इति श्रुतेः । अनुमानाच्च—अन्धस्यापि घटाद्याभासविषया स्वप्ने दृष्टिरुपलभ्यते, सा तर्हीतरदृष्टिनाशे न नश्यति, सा द्रष्टुर्द्दृष्टिः । तयाविपरिलुप्तया नित्यया दृष्ट्या स्वरूपभूतया स्वयञ्ज्योतिःसमाख्ययेतरामनित्यां दृष्टिं स्वप्नबुद्धान्तयोर्वासनाप्रत्ययरूपां नित्यमेव पश्यन्दृष्टेर्द्रष्टा भवति । एवञ्च सति दृष्टिरेव स्वरूपमस्याग्न्युष्ण्यवत् , न काणादानामिव दृष्टिव्यतिरिक्तोऽन्यश्चेतनो द्रष्टा । | किन्तु “द्रष्टाकी दृष्टिका कभी लोप नहीं होता” इस श्रुतिके अनुसार द्रष्टाकी दृष्टि तो नित्य है। यह बात अनुमानसे भी सिद्ध होती है। अन्धे पुरुषकी भी स्वप्नमें घटाभासादिविषयिणी दृष्टि देखी जाती है। वह दृष्टि अन्य (नेत्र-सम्बन्धिनी) दृष्टिका नाश हो जानेपर भी नष्ट नहीं होती। वह द्रष्टाकी दृष्टि है। उस कभी लुप्त न होनेवाली स्वयंज्योतिःसंज्ञिका स्वरूपभूता नित्यदृष्टिसे स्वप्न और जाग्रत् अवस्थाओंमें रहनेवाली वासना-प्रत्ययरूपा दृष्टिको नित्य ही देखते रहनेके कारण वह दृष्टिका द्रष्टा होता है। ऐसा होनेके कारण अग्निकी उष्णताके समान दृष्टि ही आत्माका स्वरूप है। कणादमतावलम्बियोंकी मान्यताके समान दृष्टिसे भिन्न कोई अन्य चेतन द्रष्टा नहीं है। |
| तद्ब्रह्म आत्मानमेव नित्यदृग्रूपमध्यारोपितानित्यदृष्ट्यादिवर्जितमेवावेदविदितवत् । | उस ब्रह्मने जो अन्य आरोपित अनित्य दृष्टि आदिसे रहित है, उस नित्यदृग्रूप आत्माको ही अवेत्—जाना। |
| ननु विप्रतिषिद्धं “न विज्ञाते- | पूर्वं०—किन्तु “विज्ञानशक्तिके |