भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 275

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २६९


संस्कृतहिन्दी
ष्या विद्युः” ( १ । ४ । १० ) इति हि वक्ष्यति । “यथा ह वै स्वाय लोकायारिष्टमिच्छेदेवँ हैवंविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति” ( १ । ४ । १६ ) इति च ।कि मनुष्य इस आत्मतत्त्वको जानें”। तथा आगे चलकर यह भी कहेगी कि “जिस प्रकार पुरुष अपने शरीरका अविनाश चाहते हैं उसी प्रकार जो ऐसा (देवताओंसे उऋण होनेके लिये अपना कर्त्तव्य) जानता है उसका देवादि समस्त भूत अविनाश चाहते हैं”।
ब्रह्मवित्त्वे परार्थ्यनिवृत्तेर्न स्वलोकत्वं पशुत्वञ्चेत्यप्रियारिष्टवचनाभ्यामवगम्यते । तस्माद्ब्रह्मविदो ब्रह्मविद्याफलप्राप्तिं प्रति कुर्युुरेव विघ्नं देवाः, प्रभाववन्तश्च हि ते ।किंतु ब्रह्मज्ञान हो जानेपर परार्थ्य (अन्यका उपभोग होना) निवृत्त हो जानेसे उसके देहात्मत्व और देवपशुत्व नहीं रहते—यह अभिप्राय उपर्युक्त अप्रिय और अरिष्टवाक्योंसे विदित होता है। अतः ब्रह्मवेत्ताको ब्रह्मविद्याका फल प्राप्त होनेमें देवगण विघ्न करेंगे ही और वे हैं भी प्रभावशाली।
नन्वेवं सत्यन्यास्वपि कर्मफलप्राप्तिषु देवानां विघ्नकरणं पेयपानसमम् 1। हन्त तर्हि विस्रम्भोऽभ्युदयनिःश्रेयससाधनानुष्ठानेषु । तथेश्वरस्याचिन्त्यशक्तित्वाद्दिघ्नकरणे प्रभुत्वम् । तथा कालकर्ममन्त्रौषधितपसाम् ।**शङ्का—**ऐसी बात है तो अन्य कर्मफलोंकी प्राप्तिमें विघ्न करना भी देवताओंके लिये जल पीनेके समान [सुलभ] है। तब तो अभ्युदय (भोग) और निःश्रेयस (मोक्ष) के साधनोंके अनुष्ठानमें विश्वास नहीं हो सकता। इसी प्रकार अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न होनेके कारण ईश्वर भी विघ्न करनेमें समर्थ हैं ही। तथा काल, कर्म, मन्त्र, ओषधि और तपका भी बहुत बड़ा प्रभाव है। शास्त्र एवं

Footnotes

  1. पार्श्व-टिप्पणी: विघ्नभयाच्छास्त्रार्थसम्पादनाविस्त्रम्भ इत्याशङ्कयते