भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 333, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 333

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
विषय इत्येतस्माद्विरक्तस्य ब्रह्मविद्या आरब्धव्येति ।अविद्याका विषय है, अतः इससे विरक्त हुए पुरुषके लिये ही ब्रह्मविद्याका आरम्भ करना उचित है।
साधारणान्नविवेचनम् —<br>तत्रान्नानां विभागेन विनियोग उच्यते—‘एकमस्य साधारणम्’ इति मन्त्रपदम्, तस्य व्याख्यानम् ‘इदमेवास्य तत्साधारणमन्नम्’ इत्युक्तम् । अस्य भोक्तृसमुदायस्य, किं तत् ? यदिदमद्यते भुज्यते सर्वैः प्राणिभिरहन्यहनि, तत्साधारणं सर्वभोक्त्रर्थमकल्पयत्पिता सृष्ट्वान्नम् ।तहाँ अन्नोंका विभागपूर्वक विनियोग बतलाया जाता है। ‘एकमस्य साधारणम्’ यह मन्त्रका पद है, उसका ‘इदमेवास्य तत्साधारणमन्नम्’ यह व्याख्यान कहा गया है। ‘अस्य’ अर्थात् इस भोक्तृ समुदायका, वह साधारण अन्न है, वह कौन-सा ? यह जो प्रतिदिन समस्त प्राणियोंद्वारा अदन—भोजन किया जाता अर्थात् खाया जाता है। भाव यह कि पिताने अन्नकी रचना करके, उसे समस्त भोक्ताओंके लिये साधारण अन्न नियत कर दिया।
स य एतत्साधारणं सर्वप्राणभृत्स्थितिकरं भुज्यमानमन्नमुपास्ते तत्परो भवतीत्यर्थः—उपासनं हि नाम तात्पर्यं दृष्टं लोके ‘गुरुमुपास्ते’ ‘राजानमुपास्ते’ इत्यादौ—तस्माच्छरीरस्थित्यर्थान्नोपभोगप्रधानो नाहदृष्टार्थकर्मप्रधान इत्यर्थः; स एवंभूतो न पाप्मनोऽधर्माद्व्याव-वह जो समस्त प्राणियोंका भरण-पोषण और स्थिति करनेवाले एवं उनसे भोगे जाते हुए इस साधारण अन्नकी उपासना करता है, अर्थात् तत्पर होता है—लोकमें ‘गुरुकी उपासना करता है,’ ‘राजाकी उपासना करता है’ इत्यादि प्रसङ्गोंमें तत्परता ही उपासनारूपसे देखी गयी है—अतः जो प्रधानतया शरीरकी स्थिति करनेवाले अन्नका ही उपभोग करनेवाला है, अर्थात् अदृष्टोत्पादककर्मप्रधान नहीं है, वह इस प्रकारका पुरुष पाप यानी अधर्मसे नहीं बचता अर्थात्