भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 342
३३६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| याजुष्मतीरिष्टका अभिसम्पद्यमानाः संवत्सरस्य चाहोरात्राणि, संवत्सरमग्निं प्रजापतिमाप्नुवन्ति; एवं कृत्वा संवत्सरं जुह्वदपजयति पुनर्मृत्युम्, इतः प्रेत्य देवेषु सम्भूतः पुनर्न म्रियत इत्यर्थः। <br><br> इत्येवं ब्राह्मणवादा आहुः, न तथा विद्यान्न तथा द्रष्टव्यम्; यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपजयति, न संवत्सराभ्यासमपेक्षते। एवं विद्वान्सन्, यदुक्तम्— पयसि हीदं सर्वं प्रतिष्ठितं पयआहुतिविपरिणामात्मकत्वात्सर्वस्येति, तदेकेनैवाह्ना जगदात्मत्वं प्रतिपद्यते; तदुच्यते— अपजयति पुनर्मृत्युं पुनर्मरणम्, | यजुर्वेदोक्त इष्टकारूप होकर संवत्सररूप अग्नि प्रजापतिको प्राप्त करते हैं;¹ ऐसी भावना करके एक वर्षतक हवन करनेवाला पुनर्मृत्युको जीत लेता है, अर्थात् यहाँसे मरकर देवताओंमें जन्म लेकर फिर नहीं मरता। <br><br> —ऐसा ब्राह्मणवाद कहते हैं, किंतु ऐसा नहीं समझना चाहिये, ऐसी दृष्टि नहीं रखनी चाहिये; क्योंकि पुरुष जिस दिन भी [दुग्धसे] हवन करता है, उसी दिन पुनर्मृत्युको परास्त कर देता है, इसके लिये एक वर्षतक अभ्यास करनेकी अपेक्षा नहीं रखता। अतः इस प्रकार जानकर अर्थात् ऊपर जो कहा है कि सब दुग्धकी आहुतियोंका परिणामरूप होनेके कारण यह सब दुग्धमें ही प्रतिष्ठित है, वह वैसा ही है—ऐसा जाननेवाला पुरुष एक ही दिन आहुतिप्रदान करनेसे जगत्के आत्मत्वको प्राप्त हो जाता है। यही बात श्रुति कहती है कि वह पुनर्मृत्यु यानी दूसरी बार मरनेको |


१. अर्थात् जो साधक उन आहुतियोंमें यजुर्वेदोक्त इष्टका-दृष्टि कर उन्हें संवत्सरके अवयवभूत अहोरात्र मानकर दुग्धसे हवन करता है, उसे संवत्सरात्मक प्रजापतिकी प्राप्ति होती है। याजुषी इष्टकाओंकी संख्या भी तीन सौ साठ ही है, अतः उनकी आहुतियों और अहोरात्रसे संख्यामें समानता है।