बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 357, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३५१
जो कुछ अविज्ञात है, वह प्राणका रूप है। प्राण ही अविज्ञात है। प्राण अविज्ञात होकर इसकी रक्षा करता है ॥ १० ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| यत्किञ्चाविज्ञातं विज्ञानागोचरं न च सन्दिह्यमानम्, प्राणस्य तद्रूपम्, प्राणो ह्यविज्ञातोऽविज्ञातरूपो हि यस्मात्प्राणोऽनिरुक्तश्रुतेः । विज्ञातविजिज्ञास्याविज्ञातभेदेन वाङ्मनःप्राणविभागे स्थिते त्रयो लोका इत्यादयो वाचनिका एव । सर्वत्र विज्ञातादिरूपदर्शनाद्वचनादेव नियमः स्मर्त्तव्यः ।<br><br>प्राण एनं तद्भूत्वा अवति—अविज्ञातरूपेणैवास्य प्राणोऽन्नं भवतीत्यर्थः । शिष्यपुत्रादिभिःसन्दिह्यमानावज्ञातोपकारा अप्याचार्यपित्रादयो दृश्यन्ते; तथा मनःप्राणयोरपि सन्दिह्यमानावज्ञातयोरन्नत्वोपपत्तिः ॥ १० ॥ | जो कुछ अविज्ञात यानी विज्ञानका अविषय है—केवल सन्देहयोग्य ही नहीं है—वह प्राणका रूप है; प्राण ही अविज्ञात है, क्योंकि अनिरुक्त-श्रुतिसे प्राण अविज्ञातरूप ही है। इस प्रकार विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञातभेदसे वाक्, मन और प्राणका विभाग निश्चित हो जानेपर 'त्रयो लोकाः' इत्यादि निर्देश केवल वाचनिक (वचनसे प्राप्त) ही है। सर्वत्र विज्ञातादिका ही रूप देखा जाता है, अतः इनका नियम श्रुतिवचनसे ही माना जाता है।<br><br>प्राण तद्रूप होकर इसकी रक्षा करता है; अर्थात् प्राण अविज्ञातरूपसे ही इसका अन्न होता है। १ जिनके उपकारके विषयमें शिष्य एवं पुत्रादिको सन्देह और अज्ञान रहता है, ऐसे गुरु और पिता आदि [लोकमें] देखे जाते हैं। इसी प्रकार सन्दिह्यमान और अविज्ञात मन एवं प्राणका भी अन्न होना सम्भव है ॥ १० ॥ |
१. यदि कहो कि अविज्ञात रहते हुए प्राण किस प्रकार उपकारक हो सकता है ? तो इसके लिये आगे लिखी बातपर ध्यान देना चाहिये ।