बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 372, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 372
| ३६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| देवलोको न पुत्रेण नापि कर्मणा । | देवलोक प्राप्त होनेयोग्य है—पुत्रसे अथवा कर्मसे नहीं। |
| देवलोको वै लोकानां त्रयाणां श्रेष्ठः प्रशस्यतमः । तस्मात्तत्साधनत्वाद्दिद्यां प्रशंसन्ति ॥ १६ ॥ | तीनों लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ यानी सबसे अधिक प्रशंसनीय है। अतः उसका साधन होनेसे विद्याकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥ |
सम्प्रत्तिकर्म और उसका परिणाम
| एवं साध्यलोकत्रयफलभेदेन विनियुक्तानि पुत्रकर्मविद्याख्यानि त्रीणि साधनानि । जाया तु पुत्रकर्मार्थत्वान्न पृथक्साधनमिति पृथङ्नाभिहिता । वित्तं च कर्मसाधनत्वान्न पृथक्साधनम् । | इस प्रकार पुत्रकर्म और विद्यासंज्ञक तीन साधनोंका उनके साध्य लोकत्रयरूप फलके भेदसे विनियोग किया गया। स्त्री तो पुत्र और कर्मके लिये ही होनेके कारण कोई पृथक् साधन नहीं है; इसलिये उसका अलग वर्णन नहीं किया गया। वित्त भी कर्मका साधन होनेके कारण अलग साधन नहीं है। |
| विद्याकर्मणोर्लोकजयहेतुत्वं स्वात्मप्रतिलाभेनैव भवतीति प्रसिद्धम् । पुत्रस्य त्वक्रियात्मकत्वात्केन प्रकारेण लोकजयहेतुत्वमिति न ज्ञायते। अतस्तद्वक्तव्यमित्यथानन्तरमारभ्यते— | विद्या और कर्म अपने स्वरूपकी निष्पत्ति होनेसे ही लोकजयके हेतु होते हैं—यह प्रसिद्ध है। किन्तु पुत्र अक्रियात्मक है। वह किस प्रकार लोकजयका हेतु होता है—यह नहीं जाना जाता। अतः वह बतलाना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है— |
अथातः सम्प्रत्तिर्यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति स पुत्रः प्रत्याहाहं ब्रह्माहं