भारतकोश
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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

३६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३६६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
देवलोको न पुत्रेण नापि कर्मणा ।देवलोक प्राप्त होनेयोग्य है—पुत्रसे अथवा कर्मसे नहीं।
देवलोको वै लोकानां त्रयाणां श्रेष्ठः प्रशस्यतमः । तस्मात्तत्साधनत्वाद्दिद्यां प्रशंसन्ति ॥ १६ ॥तीनों लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ यानी सबसे अधिक प्रशंसनीय है। अतः उसका साधन होनेसे विद्याकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥

सम्प्रत्तिकर्म और उसका परिणाम

एवं साध्यलोकत्रयफलभेदेन विनियुक्तानि पुत्रकर्मविद्याख्यानि त्रीणि साधनानि । जाया तु पुत्रकर्मार्थत्वान्न पृथक्साधनमिति पृथङ्नाभिहिता । वित्तं च कर्मसाधनत्वान्न पृथक्साधनम् ।इस प्रकार पुत्रकर्म और विद्यासंज्ञक तीन साधनोंका उनके साध्य लोकत्रयरूप फलके भेदसे विनियोग किया गया। स्त्री तो पुत्र और कर्मके लिये ही होनेके कारण कोई पृथक् साधन नहीं है; इसलिये उसका अलग वर्णन नहीं किया गया। वित्त भी कर्मका साधन होनेके कारण अलग साधन नहीं है।
विद्याकर्मणोर्लोकजयहेतुत्वं स्वात्मप्रतिलाभेनैव भवतीति प्रसिद्धम् । पुत्रस्य त्वक्रियात्मकत्वात्केन प्रकारेण लोकजयहेतुत्वमिति न ज्ञायते। अतस्तद्वक्तव्यमित्यथानन्तरमारभ्यते—विद्या और कर्म अपने स्वरूपकी निष्पत्ति होनेसे ही लोकजयके हेतु होते हैं—यह प्रसिद्ध है। किन्तु पुत्र अक्रियात्मक है। वह किस प्रकार लोकजयका हेतु होता है—यह नहीं जाना जाता। अतः वह बतलाना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है—

अथातः सम्प्रत्तिर्यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति स पुत्रः प्रत्याहाहं ब्रह्माहं

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६७

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६७


यज्ञोऽहं लोक इति यद्वै किञ्चानूक्तं तस्य सर्वस्य ब्रह्मेत्येकता । ये वै के च यज्ञास्तेषाँ सर्वेषां यज्ञ इत्येकता ये वै के च लोकास्तेषाँ सर्वेषां लोक इत्येकतैतावद्वा इदँसर्वमेतन्मा सर्वँ सन्नयमितोऽभुनजदिति तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं लोक्यमाहुस्तस्मादेनमनुशासति स यदैवंविदस्माल्लोकात्प्रैत्यथैभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति । स यद्यनेन किञ्चिदक्ष्णयाऽकृतं भवति तस्मादेनँ सर्वस्मात्पुत्रो मुञ्चति तस्मात्पुत्रो नाम स पुत्रेणैवास्मिँल्लोके प्रतितिष्ठत्यथैनमेते दैवाः प्राणा अमृता आविशन्ति ॥ १७ ॥

अब सम्प्रत्ति [ कही जाती है— ] जब पिता यह समझता है कि मैं मरनेवाला हूँ तो वह पुत्रसे कहता है—'तू ब्रह्म है, तू यज्ञ है, तू लोक है।' वह पुत्र बदलेमें कहता है—'मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ।' जो कुछ भी स्वाध्याय है, उस सबकी 'ब्रह्म' यह एकता है। जो कुछ भी यज्ञ हैं, उनकी 'यज्ञ' यह एकता है। और जो कुछ भी लोक हैं, उनकी 'लोक' यह एकता है। यह इतना ही गृहस्थ पुरुषका सारा कर्त्तव्य है। [ फिर पिता यह मानने लगता है कि ] यह मेरे इस भारको लेकर इस लोकसे जानेपर मेरा पालन करेगा। अतः इस प्रकार अनुशासन किये हुए पुत्रको 'लोक्य' ( लोकप्राप्तिमें हितकर ) कहते हैं। इसीसे पिता उसका अनुशासन करता है। इस प्रकार जाननेवाला वह पिता जब इस लोकसे जाता है तो अपने उन्हीं प्राणोंके सहित पुत्रमें व्याप्त हो जाता है। यदि किसी कोणच्छिद्र ( प्रमाद ) से उस ( पिता ) के द्वारा कोई कर्त्तव्य नहीं किया होता है तो उस सबसे पुत्र उसे मुक्त कर देता है। इसीसे उसका नाम 'पुत्र' है। वह पिता पुत्रके द्वारा ही इस लोकमें प्रतिष्ठित होता है। फिर उसमें ये हिरण्यगर्भसम्बन्धी अमृतप्राण प्रवेश करते हैं ॥ १७ ॥

३६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३६८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
सम्प्रत्तिः सम्प्रदानम्; सम्प्रत्तिरिति वक्ष्यमाणस्य कर्मणो नामधेयम्। पुत्रे हि स्वात्मव्यापारसम्प्रदानं करोत्यनेन प्रकारेण पिता, तेन सम्प्रत्तिसंज्ञकमिदं कर्म। तत्कस्मिन्काले कर्तव्यम् ? इत्याह—स पिता यदा यस्मिन् काले प्रैष्यन् मरिष्यन् मरिष्यामीत्यरिष्टादिदर्शनेन मन्यते, अथ तदा पुत्रमाहूयाह—त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति। स एवमुक्तः पुत्रः प्रत्याह; स तु पूर्वमेवानुशिष्टो जानाति मयैतत्कर्तव्यमिति, तेनाह—अहं ब्रह्माहं यज्ञोऽहं लोक इति। एतद्वाक्यत्रयम्।‘सम्प्रत्ति’ सम्प्रदानको कहते हैं। ‘सम्प्रत्ति’ यह आगे कहे जानेवाले कर्मका नाम है। पिता पुत्रमें अपने व्यापारका इस प्रकारसे सम्प्रदान करता है, इसलिये यह कर्म ‘सम्प्रत्ति’ नामवाला है। उसे किस समय करना चाहिये ? इसपर श्रुति कहती है—वह पिता जिस समय करनेको होता है अर्थात् अरिष्ट (मरणके पूर्वचिह्न) आदि देखकर यह समझता है कि ‘अब मैं मरूँगा’, उस समय पुत्रको बुलाकर इस प्रकार कहता है—‘तू ब्रह्म है, तू यज्ञ है, तू लोक है।’ इस प्रकार कहे जानेपर वह पुत्र उत्तरमें कहता है। वह शिक्षित होनेके कारण पहलेसे ही जानता है कि मुझे यह करना चाहिये, इसलिये कहता है—‘मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ।’ ये तीन पृथक्-पृथक् वाक्य हैं।
एतस्यार्थस्तिरोहित इति मन्वाना श्रुतिर्व्याख्यानाय प्रवर्तते—यद्वै किञ्च यत्किञ्चावशिष्टमनूक्तमधीतमनधीतं च, तस्य सर्वस्यैव ब्रह्मेत्येतस्मिन्पदे एकता एकत्वम्, योऽध्ययनव्यापारो मम कर्तव्य आसीदेतावन्तं कालंइन वाक्योंका अर्थ गूढ है—ऐसा समझकर श्रुति इसकी व्याख्या करनेके लिये प्रवृत्त होती है—जो कुछ भी अवशिष्ट—अनूक्त अर्थात् अध्ययन किया हुआ और अध्ययन नहीं किया हुआ है, उस सभीकी ‘ब्रह्म’ इस पदमें एकता है। तात्पर्य यह है कि जो वेदविषयक स्वाध्याय-कार्य इतने समयतक मेरे लिये कर्तव्य

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६९

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
वेदविषयः, स इत ऊर्ध्वं त्वं ब्रह्म त्वत्कर्तृकोऽस्त्वित्यर्थः ।था, वह आजके बादसे 'त्वं ब्रह्म'—त्वत्कर्तृक हो अर्थात् अब तू उसका करनेवाला हो ।
तथा ये वै के च यज्ञा अनुष्ठेयाः सन्तो मया अनुष्ठिताश्चाननुष्ठिताश्च, तेषां सर्वेषां यज्ञ इत्येतस्मिन्पदे एकतैकत्वम्, मत्कर्तृका यज्ञा य आसन्, ते इत ऊर्ध्वं त्वं यज्ञः—त्वत्कर्तृका भवन्त्वित्यर्थः । ये वै के च लोका मया जेतव्याः सन्तो जिता अजिताश्च, तेषां सर्वेषां लोक इत्येतस्मिन्पदे एकता । इत ऊर्ध्वं त्वं लोकस्त्वया जेतव्यास्ते । इत ऊर्ध्वं मयाध्ययनयज्ञलोकजयकर्तव्यक्रतुस्त्वयि समर्पितः, अहं तु मुक्तोऽस्मि कर्तव्यताबन्धनविषयात्क्रतोः । स च सर्वं तथैव प्रतिपन्नवान्पुत्रोऽनुशिष्टत्वात् ।तथा मेरेद्वारा अनुष्ठेय (करनेयोग्य) जो कुछ भी अनुष्ठित (कृत) और अननुष्ठित (अकृत) यज्ञ थे, उन सब यज्ञोंकी ['त्वं यज्ञः' (तू यज्ञ है) इस वाक्यके] 'यज्ञः' पदमें एकता है । अर्थात् जो यज्ञ अबतक मेरेद्वारा किये जानेवाले थे वे अब तेरेद्वारा किये जानेवाले हों । तथा जो कोई भी लोक मेरेद्वारा जीते जानेयोग्य होकर जीते गये अथवा नहीं जीते गये उन सब लोकोंकी ['त्वं लोकः' इस वाक्यके] 'लोकः' पदमें एकता है । अबसे आगे 'त्वं लोकः' (तू लोक है) अर्थात् वे लोक तेरेद्वारा जीते जानेयोग्य हों । आजसे आगेके लिये अध्ययन, यज्ञ और लोकजयसम्बन्धी कर्त्तव्यका संकल्प तुझे सौंप दिया, अब मैं इनकी कर्तव्यताके बन्धनविषयक संकल्पसे मुक्त हो गया । शिक्षित होनेके कारण उस पुत्रने भी सब उसी प्रकार समझ लिया ।
तत्रेमं पितुरभिप्रायं मन्वाना आचष्टे श्रुतिः—एतावदेतत्परिमाणंयहाँ श्रुतिने यह बात पिताका ऐसा अभिप्राय मानकर कही है कि गृहस्थ पुरुषके लिये जो कर्तव्य है,

बृ० उ० २४—

३७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

३७०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| वै इदं सर्वं यद्गृहिणा कर्तव्यम्, यदुत वेदा अध्येतव्याः, यज्ञा यष्टव्याः, लोकाश्च जेतव्याः, । एतन्मा सर्वं सन्नयम्--सर्वं हीमं भारं मदधीनं मत्तोऽपच्छिद्य आत्मनि निधाय, इतोऽस्माल्लोकान्मा माम् अभुनजत्पालयिष्यतीति । लुट्‌र्थे लङ्, छन्दसि कालनियमाभावात् । | वह इतना ही है कि वेदोंका अध्ययन करना चाहिये, यज्ञोंका यजन करना चाहिये और लोकोंपर जय प्राप्त करनी चाहिये । 'एतन्मा सर्वं सन्नयम्'—इत्यादिका अभिप्राय यों है कि यह ( पुत्र ) स्वयं ये सब कुछ होकर अर्थात् मेरे अधीन रहनेवाले इस सारे भारको मुझसे लेकर अपने ऊपर रखकर इस लोकसे जानेपर 'माम् अभुनजत्'—मेरा पालन करेगा। यहाँ लृट्के अर्थमें लङ् लकारका प्रयोग हुआ है; क्योंकि वेदमें कालका नियम नहीं है। १ |


१. 'अभुनजत्'—यह 'भुज' धातुकी लङ् लकारकी क्रिया है। लङ् लकार अनद्यतन भूतकालमें प्रयुक्त होता है; इसका पर्याय 'अपालयत्' और अर्थ 'पालन किया' ऐसा होना चाहिये। किंतु भाष्यकार उक्त क्रियाका पर्याय 'पालयिष्यति' लिखते हैं; 'पालयिष्यति' सामान्य भविष्य-वाची 'लृट्' लकारकी क्रिया है, इसके अनुसार 'अभुनजत्' का अर्थ 'पालन करेगा'—ऐसा होता है। प्रकरणके अनुसार ऐसा ही अर्थ होना सुसंगत भी है। परंतु भूतकालिक क्रियाका भविष्यकालिक अर्थ हो कैसे सकता है?—यह प्रश्न सामने आता है। इसका ही उत्तर देते हुए भाष्यकार कहते हैं—'यहाँ 'लृट्' के अर्थमें 'लङ्' का प्रयोग समझना चाहिये; क्योंकि वेदमें कालका नियम नहीं होता।

परंतु इसका भाव यह नहीं समझना चाहिये कि 'वास्तवमें वेदमें कालका कोई निश्चित नियम ही नहीं है, सभी जगह विपरीत ही रूप मिलते हैं।' भाष्यकारके उस कथनका यह अभिप्राय जान पड़ता है कि वेदमें भूत, वर्तमान और भविष्यका निश्चित स्वरूप होते हुए भी कहीं-कहीं इसमें व्यत्यय (वैपरीत्य) भी देखा जाता है; इसलिये यहाँ कालका व्यत्यय समझना चाहिये अर्थात् भविष्यकालके ही अर्थमें भूतकालकी क्रियाका यहाँ प्रयोग हुआ है—ऐसा मानना चाहिये। सूत्रकार महर्षि पाणिनिने 'व्यत्ययो बहुलम्' (पा० सू० ३।१।८५) इस सूत्रके द्वारा ऐसे स्थलोंका निर्देश किया है। व्यत्यय केवल कालका

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७१

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७१


| यस्मादेवं सम्पन्नः पुत्रः पितरम् अस्माल्लोकात्कर्तव्यताबन्धनतो मोचयिष्यति, तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं लोक्यं लोकहितं पितुराहुर्ब्राह्मणाः । अत एव ह्येनं पुत्रमनुशासति, लोक्योऽयं नः स्यादिति, पितरः । <br><br> स पिता यदा यस्मिन्काले एवंवित्पुत्रसमर्पितकर्तव्यताक्रतुः, अस्माल्लोकात्प्रैति म्रियते, अथ तदैभिरेव प्रकृतैर्वाङ्मनःप्राणैः पुत्रमाविशति पुत्रं व्याप्नोति । अध्यात्मपरिच्छेदहेत्वपगमात् पितुर्वाङ्मनःप्राणाःस्वेन आधिदैविकेन रूपेण पृथिव्यग्न्याद्यात्मना भिन्नघटप्रदीपप्रकाशवत्सर्वमाविशन्ति । | क्योंकि इस प्रकार सम्पन्न (कर्तव्यभारसे युक्त) हुआ पुत्र पिताको इस लोकसे कर्तव्यताके बन्धनसे मुक्त करा देगा, इसलिये ब्राह्मणगण इस प्रकार अनुशिष्ट—सुशिक्षित किये गये पुत्रको लोक्य--पिताके लिये लोकमें हितकर बतलाते हैं। इसीलिये इस आशयसे कि 'यह हमारे लिये लोक्य हो' पितृगण इस पुत्रका अनुशासन करते हैं। <br><br> इस प्रकार जाननेवाले पुत्रको जिसने अपनी कर्तव्यताका संकल्प सौंप दिया है वह पिता जिस समय इस लोकसे जाता है यानी मरता है तब वह इन प्रकृत वाक्, मन और प्राणोंसे ही पुत्रमें आविष्ट अर्थात् व्याप्त हो जाता है। अध्यात्मपरिच्छेदरूप हेतुकी निवृत्ति हो जानेके कारण पिताके वाक्, मन और प्राण अपने पृथिवी एवं अग्नि आदि आधिदैविक रूपसे फूटे हुए घड़ेके अन्तर्वर्ती दीपकके प्रकाशके समान सबमें व्याप्त |


ही नहीं होता, विकरण, सुप्, तिङ्, पद, लिङ्ग और पुरुष आदिका भी होता है, जैसा कि निम्नाङ्कित कारिकासे सिद्ध होता है—'सुप्तिङुपग्रहलिङ्गनराणां कालहलच्स्वरकर्तृयङां च। व्यत्ययमिच्छति शास्त्रकृदेषां सोऽपि च सिद्ध्यति बाहुलकेन ।।' उपर्युक्त 'अभुनजत्' क्रियामें विकरणका भी व्यत्यय हुआ है, अन्यथा 'अभुनक्' रूप ही होना उचित है। यहाँ 'श्नम्' और 'शप्' दो विकरणोंके होनेसे 'अभुनजत्' रूप बना है।

३७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| तैः प्राणैः सह पिताप्याविशति, वाङ्मनःप्राणात्मभावित्वात्पितुः। अहमस्म्यनन्ता वाङ्मनःप्राणा अध्यात्मादिभेदविस्तारा इत्येवंभावितो हि पिता। तस्मात्तत्प्राणानुवृत्तित्वं पितुर्भवतीति युक्तमुक्तम्—एभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशतीति; सर्वेषां ह्यसावात्मा भवति पुत्रस्य च। | हो जाते हैं। उन प्राणोंके साथ पिता भी सबमें व्याप्त हो जाता है, क्योंकि वह तो वाक्, मन और प्राणका स्वरूपभूत ही है। पिताकी ऐसी भावना रही है कि 'मैं ही अध्यात्मादि भेद-विस्तारवाले अनन्त वाक्, मन और प्राण हूँ।' अतः पिताकी उन प्राणोंमें अनुवृत्ति होती है, इसलिये यह ठीक ही कहा है कि 'इन प्राणोंके साथ ही वह पुत्रमें व्याप्त होता है', क्योंकि वह सभीका और पुत्रका, भी आत्मा हो जाता है। | | एतदुक्तं भवति—यस्य पितुरेवमनुशिष्टः पुत्रो भवति सोऽस्मिन्नेव लोके वर्तते पुत्ररूपेण, नैव मृतो मन्तव्य इत्यर्थः। तथा च श्रुत्यन्तरे—"सोऽस्यायमितर आत्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते" (ऐ० उ० ४ । ४) इति। | इससे यह प्रतिपादित होता है कि जिस पिताका इस प्रकार अनुशासन किया हुआ पुत्र होता है, वह पुत्ररूपसे इसी लोकमें विद्यमान रहता है, अर्थात् उसे मरा हुआ नहीं मानना चाहिये। ऐसा ही इस अन्य श्रुतिमें भी कहा है—"उसका यह दूसरा आत्मा पुण्य-कर्मोंके लिये प्रतिनिधि बना दिया जाता है" इत्यादि। | | अथेदानीं पुत्रनिर्वचनमाह—<br>स पुत्रो यदि कदाचिदनेन पित्रा अक्ष्णया कोणच्छिद्रतोऽन्तरा अकृतं भवति कर्तव्यम्, तस्मात्, | अब श्रुति पुत्रका निर्वचन (व्युत्पत्ति) बतलाती है—वह पुत्र, यदि कभी उसके इस पिताद्वारा 'अक्ष्णा'—'कोणच्छिद्र' (असावधानी) से बीचमें कोई कर्तव्य बिना किये |


१. ऐतरेय उपनिषद्में इस मन्त्रका पाठ इस प्रकार है—सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयतेऽथास्यायमितर आत्मा...।

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३७३

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३७३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
कर्तव्यतारूपात्पित्रा अकृतात् सर्वस्माल्लोकप्राप्तिप्रतिबन्धरूपात्पुत्रो मुञ्चति मोचयति तत्सर्वं स्वयमनुतिष्ठन्पूरयित्वा । तस्मात्पूरणेन त्रायते स पितरं यस्मात्तस्मात्पुत्रो नाम । इदं तत्पुत्रस्य पुत्रत्वं यत्पितुश्छिद्रं पूरयित्वा त्रायते।(अपूर्ण) ही रह जाता है तो वह पिताद्वारा नहीं किये हुए लोकप्राप्ति-के प्रतिबन्धरूप उस समस्त कर्तव्यतारूप [बन्धन] से उस सबका स्वयं अनुष्ठान करते हुए उसकी पूर्ति करके पिताको मुक्त करा देता है। अतः वह पुत्र, चूँकि पूर्तिके द्वारा पिताका त्राण करता है, इसलिये 'पुत्र' कहलाता है। पुत्रका पुत्रत्व यही है कि वह पिताके छिद्रकी पूर्ति करके उसका त्राण करता है।
स पितैवंविधेन पुत्रेण मृतोऽपि सन्नमृतोऽस्मिन्नेव लोके प्रतितिष्ठति, एवमसौ पिता पुत्रेणेमं मनुष्यलोकं जयति । न तथा विद्याकर्मभ्यां देवलोकपितृलोकौ स्वरूपलाभसत्तामात्रेण; न हि विद्याकर्मणी स्वरूपलाभव्यतिरेकेण पुत्रवद्व्यापारान्तरापेक्षया लोकजयहेतुत्वं प्रतिपद्येते । अथ कृतसम्प्रत्तिकं पितरमेनमेते वागादयः प्राणा दैवा हैरण्यगर्भा अमृता अमरणधर्माण आविशन्ति ॥ १७ ॥इस प्रकारके पुत्रके कारण वह पिता मरकर भी अमृत रहता है; अर्थात् इसी लोकमें विद्यमान रहता है। इस प्रकार पुत्रके द्वारा पिता इस मनुष्यलोकपर जय प्राप्त करता है। विद्या और कर्मके द्वारा जिस प्रकार वह देवलोक और पितृलोकपर उनके स्वरूपलाभकी सत्तामात्रसे विजय प्राप्त करता है, उस प्रकार इसे नहीं करता। विद्या और कर्म [देव और पितृलोकके] स्वरूपलाभके सिवा पुत्रके समान किसी व्यापारान्तरकी अपेक्षासे लोकजयके हेतु नहीं होते। फिर, जिसने सम्प्रत्ति-कर्म किया है ऐसे उस पितामें ये वागादि दैव—हिरण्यगर्भसम्बन्धी अमृत—अमरण-धर्मा प्राण आविष्ट होते हैं ॥ १७ ॥

३७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

३७४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

सम्प्रत्तिकर्मकर्तामें वागादि प्राणोंके आवेशका प्रकार

| पाङ्क्तकर्मणो मोक्षार्थत्वनिरासः<br>कथमिति वक्ष्यति पृथिव्यै चैनमित्यादि । एवं पुत्रकर्मापरविद्यानां मनुष्यलोकपितृलोकदेवलोकसाध्यार्थता प्रदर्शिता श्रुत्या स्वयमेव । अत्र केचिद्भावदूकाः श्रुत्युक्तविशेषार्थानभिज्ञाः सन्तः पुत्रादिसाधनानां मोक्षार्थतां वदन्ति । तेषां मुखापिधानं श्रुत्येदं कृतम्—जाया मे स्यादित्यादि पाङ्क्तं काम्यं कर्मेत्युपक्रमेण, पुत्रादीनां च साध्यविशेषविनियोगोपसंहारेण च । तस्मादृणश्रुतिरविद्वद्विषया न परमात्मविद्विषयेति सिद्धम् । वक्ष्यति च—"किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः" ( ४ । ४ । २२) इति । | किस प्रकार आविष्ट होते हैं, सो 'पृथिव्यै चैनम्' इत्यादि श्रुति बतलावेगी । इस प्रकार श्रुतिने स्वयं ही पुत्र, कर्म और अपरा विद्याको मनुष्यलोक, पितृलोक एवं देवलोककी प्राप्तिके साधनरूपसे दिखलाया । यहाँ कुछ वाचाललोग श्रुतिप्रतिपादित विशेष अर्थको न समझकर पुत्रादि साधनोंकी मोक्षार्थता बतलाते हैं। परंतु श्रुतिने—'मेरे स्त्री हो' इत्यादि पाङ्क्त काम्य कर्म है—इस उपक्रमसे तथा पुत्रादिका [ मनुष्यलोकादि ] साध्यविशेषमें विनियोग करनारूप उपसंहारसे उनका मुख बंद कर दिया है। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि ऋणत्रयका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका अधिकारी अज्ञानी है, परमात्मवेत्ता नहीं। आगे श्रुति कहेगी भी कि "हम, जिनका यह आत्मा ही लोक है, प्रजासे क्या करेंगे ?" इत्यादि। | | समुच्चयवाद-निराकरणम्<br>केचित्तु पितृलोकदेवलोकजयोऽपि पितृलोकदेवलोकाभ्यां व्यावृतिरेव; तस्मात्पुत्रकर्मापरविद्याभिः समुच्चितानुष्ठिताभिस्त्रिभ्य एते- | किन्हीं-किन्हींका मत है कि पितृलोक और देवलोकको जीतना भी पितृलोक और देवलोकसे निवृत्त होना ही है। अतः समुच्चयपूर्वक [अर्थात् एक साथ ] अनुष्ठान किये हुए पुत्र, कर्म और अपराविद्याद्वारा |

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ३७५ |

ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थे३७५
संस्कृतहिन्दी
ख्यो लोकेभ्यो व्यावृत्तः परमात्मविज्ञानेन मोक्षमधिगच्छतीति परम्परया मोक्षार्थान्येव पुत्रादिसाधनानीच्छन्ति। तेषामपि मुखापिधानायेयमेव श्रुतिरुत्तरा कृतसम्प्रत्तिकस्य पुत्रिणः कर्मिणः त्र्यन्नात्मविद्याविदः फलप्रदर्शनाय प्रवृत्ता।इन तीनों लोकोंसे निवृत्त हुआ पुरुष परमात्मज्ञानके द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है; इस प्रकार उनका मत है कि पुत्रादि साधन भी परम्परासे मोक्षके ही लिये हैं। उनका भी मुख बंद करनेके लिये यह आगेकी श्रुति, जिसने सम्प्रत्ति-कर्म किया है, उस पुत्रवान्, कर्मठ एवं त्र्यन्नात्मविद्याके ज्ञाताको मिलनेवाला फल बतलानेके लिये प्रवृत्त होती है।
न चेदमेव फलं मोक्षफलमिति- <br><br> शक्यं वक्तुम्, त्र्यन्नसम्बन्धात्, मेधातपःकार्यत्वाच्चान्नानाम्, ‘पुनः पुनर्ज॑नयते’ इति दर्शनात्; ‘यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयेत ह’ इति च क्षयश्रवणात्। शरीरं ज्योतीरूपमिति च कार्यकरणत्वोपपत्तेः। ‘त्रयं वा इदम्’ इति च नामरूपकर्मात्मकत्वेनोपसंहारात्।और यह कहा नहीं जा सकता कि यह फल ही मोक्षफल है; क्योंकि इसका अन्नत्रयसे सम्बन्ध है और अन्न मेधा एवं तपके कार्य हैं, कारण 'वह इन्हें पुनः-पुनः उत्पन्न करता है' ऐसा श्रुतिका वचन देखा जाता है तथा 'यदि वह इन्हें उत्पन्न न करे तो ये क्षीण हो जायँ' इस प्रकार इनका क्षय भी सुना गया है। एवं शरीर और ज्योतीरूप बतलाकर इनके कार्यत्व और करणत्वकी भी उपपत्ति दिखायी गयी है और 'त्रयं वा इदम्' ऐसा कहकर नाम-रूप-कर्मात्मक रूपसे इनका उपसंहार किया है।
न चेदमेव साधनत्रयं संहतं सत्कस्यचिन्मोक्षार्थं कस्यचित्इस एक ही वाक्यसे ऐसा भी नहीं जाना जा सकता कि ये तीनों साधन मिलकर किसीके मोक्षके लिये

३७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

३७६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
त्र्यन्नात्मफलमित्यस्मादेव वाक्यादवगन्तुं शक्यम्, पुत्रादिसाधनानां त्र्यन्नात्मफलदर्शनेनैवोपक्षीणत्वाद् वाक्यस्य।होते हैं और किसीके लिये त्र्यन्नात्मरूप फलवाले होते हैं, क्योंकि पुत्रादि साधनोंका त्र्यन्नात्मफल दिखाते हुए ही यह वाक्य समाप्त होता है।

पृथिव्यै चैनमग्नेश्च दैवी वागाविशति सा वै दैवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तद्भवति ॥ १८ ॥

पृथिवी और अग्निसे इसमें दैवी वाक्‌का आवेश होता है। दैवी वाक् वही है, जिससे पुरुष जो-जो भी बोलता है, वही-वही हो जाता है ॥ १८ ॥

पृथिव्यै पृथिव्याः च एनम् अग्नेश्च <br><br> दैवी अधिदैवात्मिका वागेनं कृतसम्प्रत्तिकमाविशति। सर्वेषां हि वाच उपादानभूता दैवी वाक्पृथिव्यग्निलक्षणा, सा ह्याध्यात्मिकासङ्गादिदोषैर्निरुद्धा। विदुषस्तदोषापगमे आवरणभङ्ग इवोदकप्रदीपप्रकाशवच्च व्याप्नोति। तदेतदुच्यते—पृथिव्या अग्नेश्चैनं दैवी वागाविशतीति। <br><br> सा च दैवी वागनृतादिदोषरहिता शुद्धा, यया वाचा दैव्या यद्यदेव आत्मने परस्मै वा वदतिपृथिवी और अग्निसे इस सम्प्रत्तिकर्म करनेवालेमें दैवी—आधिदैविक वाक्‌का आवेश होता है। पृथिवी और अग्निरूपा दैवी वाक् सभीकी वाणीकी उपादानभूता है, निश्चय ही वह आध्यात्मिक (दैहिक) आसक्ति आदि दोषोंसे आवृत्त है, किंतु आवरण (व्यवधान) के निवृत्त होनेपर जैसे जल और प्रकाश फैल जाते हैं उसी प्रकार विद्वान्‌के उस (आध्यात्मिक आसक्तिरूप) दोषके निवृत्त हो जानेपर वह उसमें आविष्ट हो जाती है। इसीसे यह कहा है कि उसमें पृथिवी और अग्निसे दैवी वाक्‌का आवेश होता है। <br><br> वह दैवी वाक् अनृतादि दोषसे रहित और शुद्ध होती है, जिस दैवी वाणीसे वह अपने या दूसरेके लिये जो-

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७७

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७७


| तत्तद् भवति, अमोघा अप्रतिबद्धा अस्य वाग्भवतीत्यर्थः ॥ १८ ॥ | जो कहता है वही-वही हो जाता है। अर्थात् इसकी वाणी अमोघ—प्रतिबन्धरहित हो जाती है ॥ १८ ॥ |

| तथा— | तथा— |

दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद्वै दैवं मनो येनानन्द्येव भवत्यथो न शोचति ॥ १६ ॥

द्युलोक और आदित्यसे इसमें दैव मनका आवेश हो जाता है। दैव मन वही है, जिससे यह आनन्दी ही होता है, कभी शोक नहीं करता ॥ १६ ॥

| दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति—तच्च दैवं मनः; स्वभावनिर्मलत्वात्; येन मनसा असौ आनन्द्येव भवति सुख्येव भवति; अथो अपि न शोचति, शोकादिनिमित्तासंयोगात् ॥ १९ ॥ | द्युलोक और आदित्यसे इसमें दैव मन आविष्ट हो जाता है। स्वभावसे ही निर्मल होनेके कारण दैव मन वही है, जिस मनसे यह आनन्दी—सुखी ही होता है और शोकादिके कारणोंका संयोग न होनेसे कभी शोक नहीं करता ॥ १६ ॥ |


| तथा— | तथा— |

अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै देवः प्राणो यः सञ्चरँश्चासञ्चरँश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति। स एवंवित्सर्वेषां भूतानामात्मा भवति, यथैषा देवतैवँ स यथैतां देवताँ सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवँ हैवंविदँ सर्वाणि भूतान्यवन्ति। यदु किञ्चेमाः प्रजाः

३७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३७८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

शोचन्त्यमेवासां तद्भवति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान्पापं गच्छति ॥ २० ॥

जल और चन्द्रमासे इसमें दैव प्राणका आवेश हो जाता है। दैव प्राण वही है जो सञ्चार करते और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न नष्ट ही होता है। वह इस प्रकार जानने-वाला समस्त भूतोंका आत्मा हो जाता है जैसा यह देवता (हिरण्यगर्भ) है, वैसा ही वह हो जाता है। जिस प्रकार समस्त प्राणी इस देवताका पालन करते हैं, उसी प्रकार ऐसी उपासना करनेवालेका समस्त भूत पालन करते हैं। जो कुछ ये प्रजाएँ शोक करती हैं, वह (शोकादिजनित दुःख) उन्हींके साथ रहता है। इसे तो पुण्य ही प्राप्त होता है, क्योंकि देवताओंके पास पाप नहीं जाता ॥ २० ॥

| अद्भ्यश्चैनं चन्द्रममश्च दैवः प्राण आविशति। स वै दैवः प्राणः किंलक्षणः? इत्युच्यते—यः सञ्चरन् प्राणिभेदेषु सञ्चरन्समष्टिव्यष्टि-रूपेण—अथवा सञ्चरन् जङ्गमेषु असञ्चरन्स्थावरेषु, न व्यथते न दुःखनिमित्तेन भयेन युज्यते। अथो अपि न रिष्यति न विनश्यति न हिंसामापद्यते।<br><br>सः—यो यथोक्तमेवं वेत्ति त्र्यन्नात्मदर्शनं सः—सर्वेषां भूतानामात्मा भवति, सर्वेषां भूतानां प्राणो भवति, सर्वेषां भूतानां मनो | जल और चन्द्रमासे इसमें दैव प्राण आविष्ट हो जाता है। वह दैव प्राण किन लक्षणोंवाला है? सो बतलाया जाता है—जो समष्टि और व्यष्टिरूपसे प्राणियोंमें सञ्चार करता हुआ और सञ्चार न करता हुआ अथवा जङ्गमोमें सञ्चार करता हुआ और स्थावरोंमें सञ्चार न करता हुआ, व्यथित यानी दुःख-निमित्तक भयसे युक्त नहीं होता और न रिष—विनाश अर्थात् हिंसाको ही प्राप्त होता है।<br><br>जो इस उपर्युक्त त्र्यन्नात्मदर्शनको जानता है, वह समस्त भूतोंका आत्मा हो जाता है, समस्त भूतोंका प्राण हो जाता है, समस्त भूतोंका मन हो |

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७९

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७९

संस्कृत भाष्यार्थहिन्दी अनुवाद
भवति, सर्वेषां भूतानां वाग्भवति—इत्येवं सर्वभूतात्मतया सर्वज्ञो भवतीत्यर्थः; सर्वकृच्च। यथैषा पूर्वसिद्धा हिरण्यगर्भदेवता एवमेव नास्य सर्वज्ञत्वे सर्वकृत्त्वे वा क्वचित्प्रतिघातः। स इति दाष्ट्रान्तिकनिर्देशः। किञ्च यथैतां हिरण्यगर्भदेवतामिज्यादिभिः सर्वाणि भूतान्यवन्ति पालयन्ति पूजयन्ति, एवं ह एवंविदं सर्वाणि भूतान्यवन्ति—इज्यादिलक्षणां पूजां सततं प्रयुञ्जत इत्यर्थः।जाता है और समस्त भूतोंकी वाक् हो जाता है। तात्पर्य यह है कि इस प्रकार सर्वभूतात्मरूपसे वह सर्वज्ञ हो जाता है तथा सर्वकर्ता भी हो जाता है। जैसा कि यह पूर्वसिद्ध हिरण्यगर्भ देवता है, उसी प्रकार इसके सर्वज्ञत्व और सर्वकर्तृत्त्वमें भी कभी प्रतिघात नहीं होता। ‘सः’ इस शब्दसे दाष्ट्रान्तिकका निर्देश किया गया है। तथा जिस प्रकार इस हिरण्यगर्भ-देवताका समस्त प्राणी यज्ञादिसे पालन—पूजन करते हैं, उसी प्रकार ऐसी उपासना करने वालेका समस्त प्राणी पालन करते हैं अर्थात् उसके लिये निरन्तर यज्ञादि पूजाका प्रयोग करते हैं।
अथेद्माशङ्क्यते—सर्वप्राणिनामात्मा भवतीत्युक्तम्, तस्य च सर्वप्राणिकार्यकरणात्मत्वे सर्वप्राणिसुखदुःखैः सम्बन्ध्येतेति।यहाँ यह शङ्का की जाती है—ऊपर यह बतलाया गया है कि वह समस्त प्राणियोंका आत्मा हो जाता है। इस प्रकार समस्त प्राणियोंके देह और इन्द्रियरूप हो जानेसे तो उसका सब प्राणियोंके सुख-दुःखसे भी सम्बन्ध होगा ही।
तन्न, अपरिच्छिन्नबुद्धित्वात्किन्तु ऐसी बात नहीं है, क्यों-
परिच्छिन्नात्मबुद्धीनां ह्याक्रोशादौ दुःखसम्बन्धो दृष्टः—अनेनाहमा-कि वह अपरिच्छिन्न बुद्धिवाला हो जाता है। जिनकी परिच्छिन्नात्मबुद्धि होती है, उन्हींको गाली आदि देनेपर यह सोचकर कि इसने मुझे गाली दी है, दुःखका सम्बन्ध होता देखा गया है।

३८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

३८०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
क्रुष्ट इति। अस्य तु सर्वात्मनो य आक्रुश्यते यश्चाक्रोशति तयोरात्मत्वबुद्धिविशेषाभावान्न तन्निमित्तं दुःखमुपपद्यते। मरणदुःखवच्च निमित्ताभावात् यथा हि कस्मिंश्चिन्मृते कस्यचिद् दुःखमुत्पद्यते—ममासौ पुत्रो भ्राता चेति, पुत्रादिनिमित्तम्; तन्निमित्ताभावे तन्मरणदर्शिनोऽपि नैव दुःखमुपजायते, तथेश्वरस्याप्यपरिच्छिन्नात्मनो ममत्वतादिदुःखनिमित्तमिथ्याज्ञानादिदोषाभावान्नैव दुःखमुपजायते।इस सर्वात्माको तो, जिसे गाली दी जाती है और जो गाली देता है, उन दोनोंके प्रति आत्मत्वबुद्धिमें कोई भेद न होनेके कारण उसे तज्जनित दुःख होना सम्भव ही नहीं है। जिस प्रकार कि कोई निमित्त न होनेसे मरण-दुःख भी नहीं होता। जैसे [लोकमें] किसीके मर जानेसे किसीको 'यह मेरा पुत्र है, यह मेरा भाई है' ऐसा सोचकर पुत्रादिके कारण दुःख उत्पन्न होता है तथा वैसा निमित्त न होनेपर उसकी मृत्युको देखनेवालेको भी दुःख नहीं होता उसी प्रकार मेरे-तेरेपन आदि दुःखके निमित्त और मिथ्या ज्ञानादि दोषका अभाव होनेके कारण अपरिच्छिन्नरूप ईश्वरको भी दुःख नहीं होता।
तदेतदुच्यते—यदु किञ्च यत् किञ्च इमाः प्रजाः शोचन्त्यमैव सहैव प्रजाभिस्तच्छोकादिनिमित्तं दुःखं संयुक्तं भवत्यासां प्रजानां परिच्छिन्नबुद्धिजनितत्वात्। सर्वात्मनस्तु केन सह किं संयुक्तं भवेद्वियुक्तं वा? अमुं तु प्राजापत्ये पदे वर्तमानं पुण्यमेव शुभमेव—इसीसे यह कहा जाता है—जो कुछ भी ये प्रजाएँ शोक करती हैं, वह शोकादिजनित दुःख उन प्रजाओंके साथ ही संयुक्त रहता है, क्योंकि वह इन प्रजाओंकी परिच्छिन्न बुद्धिसे पैदा होता है। किंतु जो सर्वात्मा है, उसके लिये वह किसके साथ संयुक्त या वियुक्त होगा? इस प्राजापत्यपदपर वर्तमान विद्वान्‌को तो पुण्य ही प्राप्त होता है। यहाँ शुभ

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८१

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८१

फलमभिप्रेतं पुण्यमिति—निरतिशयं हि तेन पुण्यं कृतम्; तेन तत्फलमेव गच्छति । न ह वै देवान्पापं गच्छति, पापफलस्यावसस्राभावात्—पापफलं दुःखं न गच्छतीत्यर्थः ॥ २० ॥कर्मका फल ही पुण्यरूपसे अभिप्रेत है । उसने अत्यन्त पुण्य किया होता है, इसलिये उसे उसीका फल प्राप्त होता है । पापफलका अवसर न होनेके कारण देवताओंके पास पाप नहीं जाता अर्थात् उन्हें पापका फल-रूप दुःख प्राप्त नहीं होता ॥ २० ॥

व्रतमीमांसा ॰ ॰ ॰ अध्यात्मप्राणदर्शन

‘त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः’ इत्यविशेषेण वाङ्मनःप्राणानामुपासनमुक्तम्, नान्यतमगतो विशेष उक्तः । किमेवमेव प्रतिपत्तव्यम् ? किं वा विचार्यमाणे कश्चिद्विशेषो व्रतमुपासनं प्रति प्रतिपत्तुं शक्यते? इत्युच्यते—‘वे ये सभी समान हैं और सभी अनन्त हैं’ इस मन्त्रमें वाक्, मन और प्राणकी उपासना सामान्यरूपसे बतायी गयी है । उनमेंसे एक-एककी कोई विशेषता नहीं बतलायी गयी । सो क्या ऐसा ही समझना चाहिये ? अथवा विचार करनेपर व्रत—उपासनाके विषयमें उनमें परस्पर कोई विशेषता जानी जा सकती है ? यही अब बतलाया जाता है—

अथातो व्रतमीमाꣳसा प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे तानि सृष्टान्यन्योन्येनास्पर्धन्त वदिष्याम्येवाहमिति वाग्दध्रे द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रमेवमन्यानि कर्माणि यथाकर्म तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे तान्याप्नोत्तान्याप्त्वा मृत्युरवारुन्ध तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक्छ्राम्यति चक्षुः श्राम्यति श्रोत्रमथेममेव नाप्नो-

३८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

द्योऽयं मध्यमः प्राणस्तानि ज्ञातुं दधिरे । अयं वै नःश्रेष्ठो यः सञ्चरँश्चासञ्चरँश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति हन्तास्यैव सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवँस्तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा इति तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन्कुले भवति य एवं वेद य उ हैवंविदा स्पर्धतेऽनुशुष्यत्यनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् ॥ २१ ॥

अब यहाँसे व्रतका विचार किया जाता है। प्रजापतिने कर्मों (कर्मके साधनभूत वागादि करणों) की रचना की। रचे जानेपर वे एक दूसरेसे स्पर्धा करने लगे। वाक्ने व्रत किया कि 'मैं बोलती ही रहूँगी' तथा 'मैं देखता ही रहूँगा' ऐसा नेत्रने और 'मैं सुनता ही रहूँगा' ऐसा श्रोत्रने व्रत किया। इसी प्रकार अपने-अपने कर्मके अनुसार अन्य इन्द्रियोंने भी व्रत किया तब मृत्युने श्रम होकर उनसे सम्बन्ध किया और उनमें व्याप्त हो गया। उनमें व्याप्त होकर मृत्युने उनका अवरोध किया, इसीसे वाक् श्रमित होती ही है, नेत्र श्रमित होता ही है, श्रोत्र श्रमित होता ही है। किंतु यह जो मध्यम प्राण है, इसीमें वह व्याप्त न हो सका। तब उन इन्द्रियोंने उसे जाननेका निश्चय किया। निश्चय यही हममें श्रेष्ठ है, जो सञ्चार करते और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न क्षीण ही होता है। अच्छा, हम सब भी इसीके रूप हो जायँ—ऐसा निश्चय कर वे सब इसीके रूप हो गयीं। अतः वे इसीके नामसे 'प्राण' इस प्रकार कही जाती हैं, इसीसे जो ऐसा जानता है, वह जिस कुलमें होता है, वह कुल उसीके नामसे बोला जाता है तथा जो ऐसे विद्वान्से स्पर्धा करता है, वह सूख जाता है और सूखकर अन्तमें मर जाता है। यह अध्यात्मप्राणदर्शन है ॥ २१ ॥

अथातोऽनन्तरं व्रतमीमांसा उपासनकर्मविचारणेत्यर्थः। एषां प्राणानां कस्य कर्म व्रतत्वेनअब यहाँसे आगे व्रतमीमांसा अर्थात् उपासना-कर्मका विचार किया जाता है। यानी इन प्राणोंमेंसे किस

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३८३

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३८३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
धारयितव्यमिति मीमांसा प्रवर्तते। तत्र प्रजापतिर्ह–हशब्दः किलार्थे–प्रजापतिः किल प्रजाः सृष्ट्वा कर्माणि करणानि वागादीनि–कर्मार्थानि हि तानीति कर्माणीत्युच्यन्ते–ससृजे सृष्टवान्वागादीनि करणानीत्यर्थः।प्राणके कर्मको व्रतरूपसे धारण करना चाहिये? इस बातका विचार आरम्भ होता है। वहाँ प्रजापतिने प्रजाकी रचना कर कर्मोंकी अर्थात् वागादि करणोंकी रचना की—यह प्रसिद्ध है। यहाँ ‘ह’ शब्द ‘किल’ यानी प्रसिद्धिके अर्थमें है। कर्मके साधन होनेके कारण उन्हें (वागादि-करणोंको) ‘कर्म’ कहा गया है।
तानि पुनः सृष्टान्यन्योन्येन इतरेतरमस्पर्धन्त स्पर्धां संघर्षं चक्रुः। कथम्? वदिष्याम्येव स्वव्यापाराद्वदनादनुपरतैवाहं स्यामिति वाग्व्रतं दध्रे धृतवती–यद्यन्योऽपि मत्समोऽस्ति स्वव्यापारादनुपरन्तुं शक्तः, सोऽपि दर्शयत्वात्मनो वीर्यमिति। तथा द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः, श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रम्; एवमन्यानि कर्माणि करणानि यथाकर्म–यद्यस्य कर्म यथाकर्म।उन रची हुई इन्द्रियोंने एक दूसरीसे स्पर्धा की—परस्पर संघर्ष किया। किस प्रकार स्पर्धा की? ‘मैं बोलती ही रहूँगी अर्थात् अपने भाषणरूप व्यापारसे निवृत्त होऊँगी ही नहीं’ ऐसा व्रत वाक्ने धारण किया; इससे उसका यह अभिप्राय था कि यदि मेरे समान कोई और भी अपने व्यापारसे अलग न रहनेमें समर्थ हो तो वह भी अपना पुरुषार्थ दिखलावे। तथा ‘मैं देखता ही रहूँगा’ ऐसा चक्षुने और ‘मैं सुनता ही रहूँगा’ ऐसा श्रोत्रने निश्चय किया। इसी प्रकार अन्य इन्द्रियोंने भी यथाकर्म—जिनका जो कर्म था उसके अनुसार व्रत धारण किया।
तानि करणानि मृत्युर्मारकः श्रमः श्रमरूपी भूत्वा उपयेमे सञ्जग्राह। कथम्? तानि कर-उन इन्द्रियोंको मृत्यु यानी मारकने श्रम—श्रमरूपी होकर पकड़ा। किस प्रकार पकड़ा? उसने अपने-

३८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३८४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
णानि स्वव्यापारे प्रवृत्तान्याप्नोत्, श्रमरूपेणात्मानं दर्शितवान्। आप्त्वा च तान्यवारुन्ध अवरोधं कृतवान्मृत्युः—स्वकर्मभ्यः प्रच्यावितवानित्यर्थः। तस्मादद्यत्वेऽपि वदने स्वकर्मणि प्रवृत्ता वाक् श्राम्यत्येव श्रमरूपिणा मृत्युना संयुक्ता स्वकर्मतः प्रच्यवते। तथा श्राम्यति चक्षुः, श्राम्यति श्रोत्रम्।अपने व्यापारमें लगी हुई उन इन्द्रियोंको व्याप्त किया; अर्थात् श्रम (थकावट) रूपसे अपनेको दिखलाया। तथा उन्हें व्याप्त करके मृत्युने उनका अवरोध किया—अपने-अपने कर्मोंसे च्युत कर दिया। इसलिये आजकल भी अपने व्यापार—भाषणमें प्रवृत्त हुई वाक् श्रमित होती ही है—श्रमरूप मृत्युसे संयुक्त होनेके कारण वह अपने कर्मसे च्युत हो जाती है। इसी प्रकार नेत्रेन्द्रिय भी श्रमित होती है तथा श्रोत्रेन्द्रिय भी श्रमित होती है।
अथेममेव मुख्यं प्राणं नाप्नोन्न प्राप्तवान्मृत्युः श्रमरुपी, योऽयं मध्यमः प्राणस्तम्। तेनाद्यत्वेऽप्यश्रान्त एव स्वकर्मणि प्रवर्तते। तानीतराणि करणानि तं ज्ञातुं दधिरे धृतवन्ति मनः।किंतु इस मुख्य प्राणको—जो यह मध्यम प्राण है, उसको ही श्रमरूपी मृत्युने व्याप्त नहीं किया, वह उसके पासतक नहीं पहुँचा। इसलिये इस समय भी वह श्रमरहित होकर ही अपने कर्ममें प्रवृत्त रहता है। उन अन्य इन्द्रियोंने उसे जाननेके लिये मनमें निश्चय किया।
अयं वै नोऽस्माकं मध्ये श्रेष्ठः प्रशस्यतमोऽभ्यधिकः, यस्माद्यः सञ्चरंश्चासञ्चरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति—हन्तेदानीमस्यैव प्राणस्य सर्वे वयं रूपमसाम प्राणमात्मत्वेन प्रतिपद्येमहि—एवं'निश्चय हम सबमें यही श्रेष्ठ अर्थात् सबसे अधिक प्रशंसनीय है, क्योंकि यह सञ्चार करते हुए और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न हिंसित ही होता है। अच्छा, अब हम सब भी इस प्राणके ही रूप हो जायँ अर्थात् प्राणको आत्मभावसे प्राप्त हो जायँ'—ऐसा

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३८५

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३८५


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
विनिश्चित्य ते एतस्यैव रूपमभवन्; प्राणरूपमेवात्मत्वेन प्रतिपन्नाः, प्राणव्रतमेव दधिरे—अस्मद्व्रतानि न मृत्योर्वारणाय पर्याप्तानीति ।निश्चय कर वे सब इस प्राणका ही स्वरूप हो गयीं—आत्मभावसे प्राणरूपको ही प्राप्त हो गयीं अर्थात् यह सोचकर कि हमारे व्रत मृत्युको हटानेमें समर्थ नहीं हैं, उन्होंने प्राणका ही व्रत धारण कर लिया ।
यस्मात्प्राणेन रूपेण रूपवन्तीतराणि करणानि चलनात्मना स्वेन च प्रकाशात्मना; न हि प्राणादन्यत्र चलनात्मकत्वोपपत्तिः; चलनव्यापारपूर्वकाण्येव हि सर्वदा स्वव्यापारेषु लक्ष्यन्ते; तस्मादेते वागादय एतेन प्राणाभिधानेन आख्यायन्तेऽभिधीयन्ते प्राणा इत्येवम् ।क्योंकि अन्य इन्द्रियाँ प्राणके चलनात्मक रूपसे और अपने प्रकाशात्मक रूपसे ही रूपवती हैं; कारण प्राणके सिवा किसी अन्य इन्द्रियमें चलनात्मकत्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती और ये सर्वदा चलनव्यापारपूर्वक ही अपने व्यापारोंमें प्रवृत्त होती दिखायी देती हैं; इसलिये ये वागादि इन्द्रियाँ इस प्राणके नामसे ही ‘प्राण’ इस प्रकार कहकर पुकारी जाती हैं।
य एवं प्राणात्मतां सर्वकरणानां वेत्ति प्राणशब्दाभिधेयत्वं च, तेन ह वाव तेनैव विदुषा तत्कुलमाचक्षते लौकिकाः। यस्मिन्कुले स विद्वाञ्जातो भवति तत्कुलं विद्वन्नाम्नैव प्रथितं भवत्यमुष्येदं कुलमिति, यथा ताप्त्य इति ।जो इस प्रकार समस्त इन्द्रियोंकी प्राणरूपता और ‘प्राण’ शब्दद्वारा पुकारा जाना जानता है, उसीसे अर्थात् उस विद्वान्‌के द्वारा ही लौकिक पुरुष उसके कुलको पुकारते हैं। अर्थात् वह विद्वान् जिस कुलमें उत्पन्न होता है वह कुल उस विद्वान्‌के नामसे ही प्रसिद्ध होता है कि यह कुल अमुकका है, जैसे तांप्त्य । जो इस प्रकार

१. तपती सूर्यदेवकी कन्या थी; वह चन्द्रवंशी राजा संवरणको विवाही गयी थी । उसका वंश उसके नामानुसार ‘ताप्त्य’ कहलाया ।

बृ० उ० २५—