बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 416, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| यज्ञे, तमेकीकृत्यैतमेवाहं ब्रह्मोपासे।<br><br>यथोक्तगुणं य उपास्ते तस्याहरहः<br><br>सुतः सोमोऽभिषुतो भवति यज्ञे,<br><br>प्रसुतः प्रकृष्टं सुतरां सुतो भवति<br><br>विकारे, उभयविधयज्ञानुष्ठानसा-<br><br>मर्थ्यं भवतीत्यर्थः। अन्नं चास्य<br><br>न क्षीयतेऽन्नात्मकोपासकस्य॥३॥ | उपासनाके द्वारा अपना स्वरूप मानकर ] इस विशेषणविशिष्ट ब्रह्मकी ही मैं उपासना करता हूँ। जो पुरुष उपर्युक्त गुणोंवाले ब्रह्मकी उपासना करता है, उसके लिये नित्यप्रति सुत होता है अर्थात् प्रकृतियज्ञमें सोमरस प्रस्तुत रहता है तथा प्रसुत होता है अर्थात् विकृतियज्ञमें अधिकतासे निरन्तर सोमरस प्रस्तुत रहता है यानी उसे प्रकृति-विकृतिरूप दोनों प्रकारके यज्ञानुष्ठानमें सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है। तथा इस अन्नात्मक ब्रह्मोपासकका अन्न भी क्षीण नहीं होता ॥ ३॥ |
गार्ग्यद्वारा विद्युदभिमानी पुरुषका ब्रह्मरूपसे उपदेश तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान
स होवाच गार्ग्यो य एवासौ विद्युति पुरुष एत-
मेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मि-
न्संवदिष्ठास्तेजस्वीति वा अहमेतमुपास इति स य
एतमेवमुपास्ते तेजस्वी ह भवति तेजस्विनी हास्य
प्रजा भवति ॥ ४ ॥
वह गार्ग्य बोला, 'यह जो विद्युत्में पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसकी चर्चा मत करो; इसकी तो मैं तेजस्वीरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह तेजस्वी होता है तथा उसकी प्रजा भी तेजस्विनी होती है' ॥ ४ ॥