बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 472, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| दुःखेन बाह्यः” (क० उ० २ । २ । ११) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः, स्मृतेश्च “अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते” (गीता १० । ८) इति—परोऽस्त्यसंसारी श्रुतिस्मृतिन्यायेभ्यश्च; स च कारणं जगतः। | क्योंकि उससे बाहर है—” इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंसे तथा “मैं सबका उत्पत्तिस्थान हूँ और मुझसे ही सब उत्पन्न होता है” इत्यादि स्मृतियोंसे जीवसे भिन्न असंसारी परमात्मा सिद्ध होता है और श्रुति-स्मृति एवं युक्तिसे वही जगत्का कारण है। | | ननु “एवमेवास्मादात्मनः” (२ । १ । २०) इति संसारिण एवोत्पत्तिं दर्शयतीत्युक्तम्। | पूर्व०—किंतु “इसी प्रकार इस आत्मासे” इत्यादि श्रुति तो संसारी जीवसे ही जगत्की उत्पत्ति दिखलाती है—ऐसा ऊपर कहा जा चुका है। | | न; “य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः” (२ । १ । १७) इति परस्य प्रकृतत्वात् “अस्मादात्मनः” इति युक्तः परस्यैव परामर्शः। “क्वैष तदाभूत्” (२ । १ । १६) इत्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनत्वेन आकाशशब्दवाच्यः पर आत्मोक्तो “य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते” (२ । १ । १७) इति। “सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति” (छा० उ० ६ । ८ । १) “अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति” (छा० उ० ८ । ३ । २) “प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः” (बृ० उ० ४ । ३ । २१) “पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते” (प्र० उ० | सिद्धान्ती—नहीं; “जो यह हृदयान्तर्गत आकाश है” इस प्रकार यहाँ परब्रह्मका ही प्रकरण होनेके कारण “इस आत्मासे” इत्यादि श्रुतिद्वारा परब्रह्मका ही परामर्श मानना उचित है। “उस समय यह कहाँ था?” इस प्रकार इस प्रश्नके उत्तररूपसे “यह जो हृदयके अन्तर्गत आकाश है, उसमें यह शयन करता है” इस वाक्यद्वारा आकाशशब्दवाच्य आत्मा ही कहा गया है। “हे सोम्य ! उस समय यह सत्से सम्पन्न रहता है” “प्रतिदिन वहाँ जाती हुई इस ब्रह्मलोकको नहीं प्राप्त करती है”, प्राज्ञात्मासे आलिङ्गित”, “पर आत्मामें सम्यक् प्रकारसे स्थित होती है” |