बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 486, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| संसारित्वकल्पनायां पर एव संसारीति कल्पितं भवेत् । अथ परोपाधिकृत एकदेशः परस्य, घटकरकाद्याकाशवत्; न तदा तत्र विवेकिनां परमात्मैकदेशः पृथक्संव्यवहारभागिति बुद्धिरुत्पद्यते । | एकदेशमें संसारित्वकी कल्पना करनेमें 'परमात्मा ही संसारी है' ऐसी कल्पना हो जायगी और यदि ऐसा माना जाय कि घटाकाश और करकाकाशादिके समान किसी अन्य उपाधिके कारण विज्ञानात्मा परमात्माका एकदेश है तो उसमें विवेकी पुरुषोंको ऐसी बुद्धि उत्पन्न नहीं हो सकती कि परमात्माका एकदेश पृथक् व्यवहार करनेमें समर्थ है। | | अविवेकिनां विवेकिनां चोपचरिता बुद्धिर्दृष्टेति चेत् ? | पूर्व०-किंतु [मैं कर्ता हूँ] ऐसी गौणी¹ बुद्धि तो अविवेकियों और विवेकियोंको भी होती देखी गयी है ? | | न; अविवेकिनां मिथ्याबुद्धित्वात्, विवेकिनां च संव्यवहारमात्रालम्बनार्थत्वात्-यथा कृष्णो रक्तश्चाकाश इति विवेकिनामपि कदाचित्कृष्णता रक्तता च आकाशस्य संव्यवहारमात्रालम्बनार्थत्वं प्रतिपद्यत इति, न परमार्थतः कृष्णो रक्तो वा आकाशो भवितुमर्हति । अतो न पण्डितै- | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि अविवेकियोंकी तो वह बुद्धि मिथ्या होती है और विवेकियोंकी सम्यक् प्रकारसे व्यवहारको आलम्बन करनेके लिये; जिस प्रकार कि [अविवेकियोंके समान] विवेकियोंकी दृष्टिमें भी कभी-कभी 'आकाश काला अथवा लाल है' इस प्रकार आकाशकी कृष्णता अथवा लाली व्यवहारमात्रके आलम्बनार्थत्वको प्राप्त हो जाती है, किंतु वस्तुतः आकाश काला या लाल नहीं हो सकता। अतः विद्वानों- |
१. वस्तुतः जीव अपरिच्छिन्न ब्रह्ममात्र है, इसलिये इस परिच्छिन्न बुद्धिको गौणी बतलाया गया है।