बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 491, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८५
| प्रामाण्यमेवोपनिषदाम्; अन्यार्थता वाऽस्तु; न त्वेव ब्रह्मैकत्वप्रतिपत्त्यर्थता। | अतः उपनिषदें अप्रामाणिक ही हैं, अथवा उनका कोई अन्य प्रयोजन हो सकता है, वे ब्रह्मका एकत्व प्रतिपादन करनेके लिये ही नहीं हो सकतीं। |
| न; उक्तोत्तरत्वात्। प्रमाणस्य हि प्रमाणत्वमप्रमाणत्वं वा प्रमोत्पादनानुत्पादननिमित्तम्, अन्यथा चेत्स्तम्भादीनां प्रामाण्यप्रसङ्गाच्छब्दादौ प्रमेये। | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि इसका उत्तर ऊपर दिया जा चुका है। प्रमाणकी प्रमाणता अथवा अप्रमाणता प्रमाकी उत्पत्ति करने या न करनेके कारण ही होती है, यदि ऐसा न माना जायगा तो शब्दादि प्रमेयमें स्तम्भादिकी भी प्रमाणताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा¹। |
| किञ्चातः ? | पूर्व०-सो, इससे क्या हुआ ? |
| यदि तावदुपनिषदो ब्रह्मैकत्वप्रतिपत्तिप्रमां कुर्वन्ति, कथमप्रमाणं भवेयुः ? | सिद्धान्ती-यदि उपनिषदें ब्रह्मज्ञानरूप प्रमा उत्पन्न करती हैं, तो वे किस प्रकार अप्रामाणिक होंगी ? |
| न कुर्वन्त्येवेति चेद्यथाग्निः शीतमिति ? | पूर्व०-किंतु 'अग्नि शीतल होता है, इस वाक्यके समान यदि वे प्रमा उत्पन्न करती ही न हों तो ? |
| स भवानेवं वदन्वक्तव्यः-उपनिषत्प्रामाण्यप्रतिषेधार्थं भवतो वाक्यमुपनिषत्प्रामाण्यप्रतिषेधं किं | सिद्धान्ती-इस प्रकार बोलनेवाले आपसे हमें यह कहना है कि उपनिषद्के प्रामाण्यका प्रतिषेध करनेके लिये प्रवृत्त हुआ आपका वाक्य उपनिषद्के प्रामाण्यका निषेध क्या |
१. स्तम्भादिसे शब्दादिकी प्रमा नहीं होती; किंतु यदि प्रमाणके लिये प्रमाको उत्पन्न करना आवश्यक न मानें तो उन्हें भी प्रमाण क्यों न माना जाय ?