भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 498, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 498
४९२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
चेतसो विषयेषु प्रवर्तयितुं शक्तम्;<br><br>किन्तु शास्त्रादेतावदेव भवति—इदमिष्टसाधनमिदमनिष्टसाधनमिति साध्यसाधनसम्बन्धविशेषाभिव्यक्तिः—प्रदीपादिवत्तमसि रूपादिज्ञानम्। न तु शास्त्रं भृत्यानिव बलान्निवर्तयति नियोजयति वा;<br><br>दृश्यन्ते हि पुरुषा रागादिगौरवाच्छास्त्रमप्यतिक्रामन्तः। तस्मात् पुरुषमतिवैचित्र्यमपेक्ष्य साध्यसाधनसम्बन्धविशेषाननेकधोपदिशति।<br><br>तत्र पुरुषाः स्वयमेव यथारुचि साधनविशेषेषु प्रवर्तन्ते, शास्त्रं तु सवितृप्रदीपादिवदुदास्त एव। तथा कस्यचित्परोऽपि पुरुषार्थोऽपुरुषार्थवदवभासते; यस्य यथावभासः; स तथारूपं पुरुषार्थं पश्यति; तदनुरूपाणि साधनान्युपादित्सते। तथा चार्थवादोऽपि—<br><br>“त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुः” (बृ०उ०विषयोंमें प्रवृत्त करनेमें भी शास्त्र समर्थ नहीं है। किंतु शास्त्रसे तो इतना ही होता है कि यह इष्टसाधन है और यह अनिष्टसाधन—इस प्रकार केवल साध्यसाधनके सम्बन्धविशेषकी अभिव्यक्ति ही होती है, जिस प्रकार कि अन्धकारमें दीपकादिसे रूपका ज्ञान होता है। शास्त्र अपने सेवकोंके समान किसीको बलात्कारसे प्रवृत्त या निवृत्त नहीं करता;<br><br>क्योंकि रागादिकी अधिकता होनेपर लोग शास्त्रका उल्लङ्घन करते भी देखे जाते हैं; अतः पुरुषोंकी बुद्धिकी विचित्रताको दृष्टिमें रखकर शास्त्र अनेक प्रकारसे साध्य-साधनरूप सम्बन्धविशेषोंका उपदेश करता है।<br><br>तहाँ अपनी-अपनी रुचिके अनुसार पुरुष स्वयं ही साधनविशेषोंमें प्रवृत्त होते हैं। शास्त्र तो सूर्य और दीपकादिके समान उदासीन ही रहता है। इस प्रकार किसीको परम पुरुषार्थ भी अपुरुषार्थके समान भासता है; जिसको जैसा भासता है वह तदनुरूप ही पुरुषार्थ देखता है, और उसके अनुसार ही साधन ग्रहण करना चाहता है। इस विषयमें<br><br>“प्रजापतिके तीन पुत्रोंने अपने पिता प्रजापतिके यहाँ ब्रह्मचर्य वास किया’