बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 538, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 538
| ५३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| अथ पुनरन्यो विज्ञानमयः, अन्यः 'नेति नेति' इति व्यपदिश्यते—तदान्यददो ब्रह्मान्योऽहमस्मीति विपर्ययो गृहीतः स्यात् न आत्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि' (१।४।९) इति। तस्मात् 'तस्य हैतस्य' इति लिङ्गपुरुषस्यैवैतानि रूपाणि। | और यदि विज्ञानमय कोई अन्य हो तथा 'नेति नेति' इस वाक्यसे किसी अन्यका निर्देश किया गया हो तो उस अवस्थामें 'यह ब्रह्म अन्य है तथा मैं अन्य हूँ' ऐसा विपरीत ग्रहण किया जायगा; 'अपनेको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा ग्रहण नहीं होगा। अतः 'तस्य हैतस्य' इत्यादि मन्त्रसे बतलाये हुए ये रूप लिङ्गपुरुषके ही हैं। |
| (लिङ्गात्मस्वरूप-निरूपणम्)<br> सत्यस्य च सत्ये परमात्म-स्वरूपे वक्तव्ये निरवशेषं सत्यं वक्तव्यम्; सत्यस्य च विशेषरूपाणि वासनाः; तासामिमानि रूपाण्युच्यन्ते, एतस्य पुरुषस्य प्रकृतस्य लिङ्गात्मन एतानि रूपाणि; कानि तानि ? इत्युच्यन्ते— | सत्यके सत्य परमात्माका स्वरूप बतलाना है, अतः यहाँ सम्पूर्ण सत्य बतलाना आवश्यक है। सत्यके ही विशेषरूप वासनाएँ हैं, उनके ये रूप बतलाये जाते हैं, ये इस प्रकृत लिङ्गात्मा पुरुषके रूप हैं; वे रूप कौन-से हैं ? सो बतलाये जाते हैं— |
| यथा लोके, महारजनं हरिद्रा तया रक्तं माहारजनं यथा वासो लोके, एवं स्त्र्यादिविषयसंयोगे तादृशं वासनारूपं रञ्जनाकारमुत्पद्यते चित्तस्य, येनासौ पुरुषो रक्त इत्युच्यते वस्त्रादिवत्। | लोकमें जिस प्रकार माहारजन वस्त्र-महारजन हल्दीको कहते हैं, उससे रँगा हुआ जो वस्त्र होता है, वही माहारजन है, उसी प्रकार स्त्री आदि विषयका संयोग होनेपर चित्तका वैसा ही रञ्जनाकार वासनामय रूप उत्पन्न हो जाता है, जिसके कारण यह पुरुष वस्त्रादिके समान रक्त (रँगा हुआ या अनुरक्त) कहा जाता है। |