बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 570, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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वह दृष्टान्त—जिस प्रकार समस्त जलोंका समुद्र एक अयन (प्रलयस्थान) है, इसी प्रकार समस्त स्पर्शोंका त्वचा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त गन्धोंका दोनों नासिकाएँ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रसोंका जिह्वा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रूपोंका चक्षु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त शब्दोंका श्रोत्र एक अयन है, इसी प्रकार समस्त संकल्पोंका मन एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विद्याओंका हृदय एक अयन है, इसी प्रकार समस्त कर्मोंका हस्त एक अयन है, इसी प्रकार समस्त आनन्दोंका उपस्थ एक अयन है और इसी प्रकार समस्त विसर्गोंका पायु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त मार्गोंका चरण एक अयन है और इसी प्रकार समस्त वेदोंका वाक् एक अयन है ॥ ११ ॥
| स इति दृष्टान्तः; यथा येन प्रकारेण, सर्वासां नदीवापीतडागादिगतानामपाम्, समुद्रोऽब्धिरेकायनम्, एकगमनमेकप्रलयोऽविभागप्राप्तिरित्यर्थः; यथायं दृष्टान्तः; एवं सर्वेषां स्पर्शानां मृदुकर्कशकठिनपिच्छिलादीनां वायोरात्मभूतानां त्वगेकायनम्, त्वगिति त्वग्विषयं स्पर्शसामान्यमात्रम्, तस्मिन्प्रविष्टाः स्पर्शविशेषाः—आप इव समुद्रम्—तद्व्यतिरेकेणाभावभूता भवन्ति; तस्यैव हि ते संस्थानमात्रा आसन् ।<br><br>तथा तदपि स्पर्शसामान्यमात्रं त्वक्शब्दवाच्यं मनःसंकल्पे मनो- | वह दृष्टान्त—जिस प्रकार सम्पूर्ण नदी, बावड़ी और तड़ागादिके जलोंका समुद्र एकायन—एक गमनस्थान—एक प्रलयस्थान अर्थात् अभेदप्राप्तिका स्थल है, जैसा कि यह दृष्टान्त है, उसी प्रकार वायुके स्वरूपभूत मृदु, कर्कश, कठोर और पिच्छिल आदि समस्त स्पर्शोंका त्वचा एक प्रलयस्थान है । त्वचासे त्वचासम्बन्धी स्पर्शसामान्यमात्र समझना चाहिये, उसीमें समुद्रमें जलके समान स्पर्शविशेष प्रविष्ट हैं, उसके बिना वे सत्ताशून्य हो जाते हैं; क्योंकि वे उसीके संस्थानमात्र (पृथक् आकारमात्र) थे ।<br><br>इसी प्रकार वह त्वक्शब्दवाच्य स्पर्शसामान्य, त्वचाके विषयमें स्पर्शविशेषोंके समान मनके विषय- |