भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 643, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 643

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३३

| श्रुत्यन्तरे चन्द्ररूपेण दृष्टिर्मुक्ति-<br>रतिमुक्तिश्च। इह तु काण्वानां<br>साधनद्वयस्य तत्कारणरूपेण<br>वाय्वात्मना दृष्टिर्मुक्तिरतिमुक्ति-<br>श्चेति न श्रुत्योर्विरोधः ॥ ५ ॥ | शाखा ) में जो चन्द्ररूपसे दृष्टि है,<br>वह मुक्ति और अतिमुक्ति है। परंतु<br>यहाँ काण्वशाखावालोंके मतमें<br>अहोरात्र और तिथि आदि दोनों<br>ही साधनोंके कारणभूत वायुभावसे<br>जो दृष्टि है, वह मुक्ति और अति-<br>मुक्ति है-इसलिये इन श्रुतियोंमें<br>विरोध नहीं है ॥ ५ ॥ |


परिच्छेदके विषयभूत मृत्युको पार करनेके आश्रयका वर्णन

| मृत्योः कालादातिमुक्तिर्व्या-<br>ख्याता यजमानस्य। सोऽति-<br>मुच्यमानः केनावष्टम्भेन परिच्छेद-<br>विषयं मृत्युमतीत्य फलं प्राप्नोति-<br>अतिमुच्यत इत्युच्यते— | यजमानकी मृत्युरूप कालसे<br>अतिमुक्ति होनेकी व्याख्या की<br>गयी। वह अतिमुक्त होता हुआ<br>किस आश्रयसे परिच्छेदके विषय-<br>भूत मृत्युको पार करके फल प्राप्त<br>करता—अतिमुक्त होता है-सो<br>बतलाया जाता है- |

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदमन्तरिक्षमनारम्ब-<br>णमिव केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति<br>ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चन्द्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा<br>तद्यदिदं मनः सोऽसौ चन्द्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः<br>सातिमुक्तिरित्यतिमोक्षा अथ सम्पदः ॥ ६ ॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो अन्तरिक्ष है, वह निरालम्ब-सा है। अतः यजमान किस आलम्बनसे स्वर्गलोकमें चढ़ता है।' [इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'ब्रह्मा ऋत्विजके द्वारा और मनरूप चन्द्रमासे