बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 669, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण २] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६५९ |
|---|
| स्यात् सा देवता, यस्या देवताया मृत्युरपि अन्नं भवेत् "मृत्युर्यस्योपसेचनम्" (क० उ० १ । २ । २५) इति श्रुत्यन्तरात् ।<br><br>अयमभिप्रायः प्रष्टुः—यदि मृत्योर्मृत्युं वक्ष्यति, अनवस्था स्यात् । अथ न वक्ष्यति, अस्माद् ग्रहातिग्रहलक्षणान्मृत्योः मोक्षो नोपपद्यते; ग्रहातिग्रहमृत्युविनाशे हि मोक्षः स्यात्; स यदि मृत्योरपि मृत्युः स्याद् भवेद् ग्रहातिग्रहलक्षणस्य मृत्योर्विनाशः, अतो दुर्वचनं प्रश्नं मन्वानः पृच्छति 'का स्वित् सा देवता' इति ।<br><br>अस्ति तावन्मृत्योर्मृत्युः ।<br><br>नन्वनवस्था स्यात् तस्याप्यन्यो मृत्युरिति ।<br><br>नानवस्था; सर्वमृत्योर्मृत्युत्वन्तरानुपपत्तेः ।<br><br>कथं पुनरवगम्यतेऽस्ति मृत्योर्मृत्युुरिति ।<br><br>दृष्टत्वात्; अग्निस्तावत् सर्वस्य | देवता कौन है जिसका मृत्यु भी खाद्य है, जैसा कि "मृत्यु जिसके लिये साग है" इस अन्य श्रुतिसे कहा गया है ।<br><br>यहाँ प्रश्नकर्ताका यह अभिप्राय है—यदि याज्ञवल्क्यने कोई मृत्युका मृत्यु बता दिया, तब तो अनवस्था-दोष होगा और यदि न बतलाया तो इस ग्रहातिग्रहरूप मृत्युसे छुटकारा नहीं हो सकेगा; क्योंकि मोक्ष तो ग्रहातिग्रहरूप मृत्युका नाश होनेपर ही होगा, अतः यदि कोई मृत्युका भी मृत्यु होगा, तभी ग्रहातिग्रहरूप मृत्युका विनाश होगा, इसलिये इस प्रश्नका उत्तर देना कठिन समझकर पूछता है कि 'वह कौन देवता है ?'<br><br>सिद्धान्ती–मृत्युका मृत्यु तो है ।<br><br>पूर्व०—तब तो अनवस्था-दोष होगा; क्योंकि फिर उसका भी कोई अन्य मृत्यु हो सकता है ।<br><br>सिद्धान्ती–अनवस्था-दोष नहीं होगा; क्योंकि जो सबका मृत्यु है, उसके लिये किसी दूसरे मृत्युका होना सम्भव नहीं है ।<br><br>पूर्व०–किंतु यह कैसे जाना जाता है कि मृत्युका मृत्यु भी है ।<br><br>सिद्धान्ती–क्योंकि ऐसा देखा गया है; सबका नाश करनेवाला |