बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 673, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ६६३
'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय यह पुरुष मरता है, उस समय इसे क्या नहीं छोड़ता ?' [ याज्ञवल्क्य- ] 'नाम नहीं छोड़ता, नाम अनन्त ही हैं, विश्वेदेव भी अनन्त ही हैं, इस आनन्त्यदर्शन- के द्वारा वह अनन्त लोकको ही जीत लेता है ॥ १२ ॥
| याज्ञवल्क्येति होवाच, यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति; आहेतरो—नामेति । सर्वं समवनीयत इत्यर्थः, नाममात्रं तु न लीयत आकृतिसम्बन्धात् । नित्यं हि नाम; अनन्तं वै नाम। नित्यत्वमेवानन्त्यं नाम्नः। तदानन्त्याधिकृता अनन्ता वै विश्वे देवाः। अनन्तमेव स तेन लोकं जयति। तन्नामानन्त्याधिकृतान् विश्वान् देवानात्मत्वेनोपेत्य तेनानन्त्यदर्शनेनानन्तमेव लोकं जयति ॥ १२ ॥ | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा 'जिस समय यह पुरुष मर जाता है, इसे क्या नहीं छोड़ता ?' याज्ञवल्क्यने 'नाम' ऐसा कहा। तात्पर्य यह है कि सब कुछ लीन हो जाता है, किन्तु आकृतिसे सम्बन्ध होनेके कारण केवल नाम ही लीन नहीं होता। नाम तो नित्य है, वह अनन्त ही है। नित्य होना ही नामका अनन्तत्व है। उस अनन्तत्वके अधिकारी विश्वेदेव भी अनन्त ही हैं। अतः इस दर्शनसे वह अनन्त लोकको ही जीत लेता है। अर्थात् नामके अनन्तत्वके अधिकारी विश्वेदेवोंको आत्मभावसे प्राप्त होकर उस आनन्त्य-दर्शनके द्वारा वह अनन्त लोकको ही जीत लेता है ॥ १२ ॥ |
इन्द्रियाभिमानी देवताओंके निवृत्त हो जानेपर अस्वतन्त्र कर्ता पुरुषकी स्थितिका विचार
| ग्रहातिग्रहरूपं बन्धनमुक्तं मृत्युरूपम्; तस्य च मृत्योर्मृत्युस- | ग्रहातिग्रहरूप जो मृत्युरूप बन्धन है, उसका वर्णन किया गया। उस मृत्युके मृत्युकी भी सत्ता होनेके |