बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 681, कुल 1402 में से
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| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६७१ |
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| भवति, तद्विपरीतेन विपरीतो भवति पापः पापेन—इत्येवं याज्ञवल्क्येन प्रश्नेषु निर्णीतेषु, ततोऽशक्यप्रकम्पत्वाद् याज्ञवल्क्यस्य, ह जारत्कारव आर्तभाग उपराम ॥ १३ ॥ | होता है और उससे विपरीत पापकर्मसे पापयोनियुक्त होता है—इस प्रकार याज्ञवल्क्यद्वारा प्रश्नोंका निर्णय हो जानेपर याज्ञवल्क्यको वादके द्वारा स्वसिद्धान्तसे विचलित करना अशक्य समझकर जारत्कारव आर्तभाग चुप हो गया ॥ १३ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये
द्वितीयमार्तभागब्राह्मणम् ॥ २ ॥
तृतीय ब्राह्मण
याज्ञवल्क्य-भुज्यु-संवाद
</div>| [पूर्ववृत्तानुवादः] | |
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| अथ हैनँ भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ । ग्रहातिग्रहलक्षणं बन्धनमुक्तम्; यस्यात् सप्रयोजकान्मुक्तो मुच्यते, येन वा बद्धः संसरति, स मृत्युः। तस्माच्च मोक्षः उपपद्यते, यस्मान्मृत्योर्मृत्युरस्ति मुक्तस्य च न गतिः क्वचित्, सर्वोत्सादो नाममात्रावशेषः प्रदीपनिर्वाणवत्—इति चावधृतम् । | 'अथ हैनँ भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ' । ग्रहातिग्रहरूप बन्धनका वर्णन किया गया। जिस सप्रयोजक बन्धनसे मुक्त हुआ पुरुष मुक्त हो जाता है और जिससे बँधा होनेपर वह संसारको प्राप्त होता है, वही मृत्यु है। उससे मुक्त होना सम्भव है, क्योंकि उस मृत्युका मृत्यु भी है। और जो मुक्त है, उसका कहीं गमन नहीं होता; क्योंकि वह तो प्रदीपनिर्वाणके समान सबका उच्छेद होकर केवल नाममात्र अवशिष्ट रह जाता है—ऐसा निश्चय किया जा चुका है। |