बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 772, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| द्यावापृथिव्योः अण्डकपालयोः, इमे च द्यावापृथिवी, यद् भूतं यच्चातीतम्, भवच्च वर्तमानं स्वव्यापारस्थम्, भविष्यच्च वर्तमानादूर्ध्वकालभावि लिङ्ग-गम्यम्—यत् सर्वमेतदाचक्षते कथयन्त्यागमतः—तत् सर्वं द्वैतजातं यस्मिन्नेकीभवतीत्यर्थः—तत् सूत्रसंज्ञं पूर्वोक्तं कस्मिन्नोतं च प्रोतं च पृथिवीधातुरिवाप्सु ॥ ३ ॥ | पृथिवी—इन अण्डकपालोंके बीचमें है; एवं स्वयं जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जो कुछ भी भूत-यानी बीत चुका है, भवत्—वर्तमान अर्थात् अपने व्यापारमें स्थित और भविष्यत्—वर्तमानके बादके समयमें होनेवाला एवं अनुमानगम्य है—ऐसा जो यह सब आगमद्वारा कहा जाता है, वह सम्पूर्ण द्वैतवर्ग जिसमें एक हो जाता है, वह पहले बतलाया हुआ सूत्रसंज्ञक तत्त्व, जलमें पृथिवीतत्त्वके समान, किसमें ओत-प्रोत है?' ॥ ३ ॥ |
याज्ञवल्क्यका उत्तर
स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ४ ॥
उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे गार्गि! जो द्युलोकसे ऊपर, पृथिवीसे नीचे और जो द्युलोक एवं पृथिवीके मध्यमें है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान एवं भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे सब आकाशमें ओतप्रोत हैं' ॥ ४ ॥
| स होवाचेतरः—हे गार्गि यत् त्वयोक्तम् ‘ऊर्ध्वं दिवः’ इत्यादि, तत् सर्वं यत् सूत्रमाचक्षते तत् सूत्रम्, आकाशे तदोतं प्रोतं च, | उस इतर याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे गार्गि! तूने जिसे द्युलोकसे ऊपर इत्यादि कहकर बतलाया वह सब, जिसे कि 'सूत्र' ऐसा कहते हैं-वह सूत्र आकाशमें ओतप्रोत है। यह |