भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 791, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 791

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७८१


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
प्रश्नौ चेन्मह्यं वक्ष्यति, न जेता भवितेति पूर्वमेव मया प्रतिज्ञातम्; अद्यापि ममायमेव निश्चयः—ब्रह्मोद्यं प्रत्येतेत्तुल्यो न कश्चिद् विद्यत इति। ततो ह वाचक्नव्युपरराम।मैं पहले ही प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ कि यदि ये मेरे दो प्रश्नोंका उत्तर दे देंगे तो आपमेंसे कोई भी विजयी नहीं होगा। आज भी मेरा यही निश्चय है कि ब्रह्मसम्बन्धी वादमें इनके समान कोई नहीं है।' तदनन्तर वचक्नुकी पुत्री गार्गी चुप हो गयी।
अत्र अन्तर्यामिब्राह्मणे एतद् प्रकरणार्थ-परामर्श उक्तम्—यं पृथिवी न वेद, यं सर्वाणि भूतानि न विदुरिति च। यमन्तर्यामिणं न विदुर्यं च न विदुर्यच्च तदक्षरं दर्शनादिक्रियाकर्तृत्वेन सर्वेषां चेतनाधातुरित्युक्तम्—कस्त्वेषां विशेषः, किं वा सामान्यमिति।यहाँ अन्तर्यामिब्राह्मणमें यह कहा गया था कि जिसे पृथिवी नहीं जानती तथा जिसे सम्पूर्ण भूत नहीं जानते इत्यादि। इस प्रकार जिस अन्तर्यामीको नहीं जानते, जो नहीं जानते और जो वह अक्षर है, जिसे समस्त विषयोंकी दर्शनादिक्रियाओंके कर्तारूपसे सबकी चेतनाका धातु कहा गया है-इन सबमें क्या अन्तर है और क्या समानता है?
तत्र केचिदाचक्षते—परस्य महासमुद्रस्थानीयस्य ब्रह्मणोऽक्षरस्य अप्रचलितस्वरूपस्येषत्प्रचलितावस्थान्तर्यामी; अत्यन्तप्रचलितावस्था क्षेत्रज्ञः, यस्तं न वेदान्तर्यामिणम्; तथान्याः पञ्चावस्थाः परिकल्पयन्ति; तथा अष्टावस्था ब्रह्मणो भवन्तीति वदन्ति।यहाँ कोई-कोई कहते हैं-महासमुद्रस्थानीय अविचलरूप अक्षर परब्रह्मकी किञ्चिद् विचलित अवस्थाका नाम अन्तर्यामी है और उसकी अत्यन्त विचलित अवस्था क्षेत्रज्ञ है, जो कि उस अन्तर्यामीको नहीं जानता; इनके सिवा वे उसकी [ पिण्ड, जाति, विराट्, सूत्र और दैव-इन ] अन्य पाँच अवस्थाओंकी भी कल्पना करते हैं; इस प्रकार वे कहते हैं कि ब्रह्मकी कुल आठ अवस्थाएँ हैं।