बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 800, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें७९० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३
आदित्य कौन हैं ?
कतम आदित्या इति द्वादश वै मासाः संवत्सरस्यैत आदित्या एते हीदँ सर्वमाददाना यन्ति ते यदिदँ सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥५॥
[ शाकल्य—] ‘आदित्य कौन हैं ?’ [ याज्ञवल्क्य— ] ‘संवत्सरके अवयवभूत ये बारह मास ही आदित्य हैं; क्योंकि ये इस सबका आदान ( ग्रहण ) करते हुए चलते हैं, इसलिये आदित्य हैं’ ॥ ५ ॥
| कतम आदित्या इति । द्वादश वै मासाः संवत्सरस्य कालस्यावयवाः प्रसिद्धाः, एते आदित्याः; कथम् ? एते हि यस्मात् पुनः पुनः परिवर्तमानाः प्राणिनामायूंषि कर्मफलं च आददाना गृह्णन्त उपाददतो यन्ति गच्छन्ति—ते यद् यस्मादेवमिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥ ५ ॥ | ‘आदित्य कौन हैं ?’ [ याज्ञवल्क्य—] ‘बारह महीने संवत्सररूप कालके अवयव प्रसिद्ध हैं—वे ही आदित्य हैं। सो किस प्रकार ? क्योंकि ये ही पुनः-पुनः परिवर्तित होते हुए प्राणियोंकी आयु और कर्मफलका आदान—ग्रहण यानी उपादान करते हुए चलते हैं। वे चूँकि इस प्रकार इस सबका आदान करते हुए चलते हैं, इसलिये ‘आददाना यन्ति’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार आदित्य कहलाते हैं’ ॥ ५ ॥ |
इन्द्र और प्रजापति कौन हैं ?
कतम इन्द्रः कतमः प्रजापतिरिति स्तनयित्नुरेवेन्द्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति ॥ ६ ॥
[ शाकल्य—] ‘इन्द्र कौन है और प्रजापति कौन है ?’ [ याज्ञवल्क्य—] स्तनयित्नु ( विद्युत् ) ही इन्द्र है और यज्ञ प्रजापति है।’ [ शाकल्य—]