भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 814, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 814
८०४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| रेत एव यस्यायतनम् । य एवायं पुत्रमयो विशेषायतनं रेत आयतनस्य, पुत्रमय इति च अस्थिमज्जाशुक्राणि पितुर्ज्ञातानि । तस्य का देवतेति ? प्रजापतिरिति होवाच । प्रजापतिः पितोच्यते, पितृतो हि पुत्रस्योत्पत्तिः ॥ १७ ॥ | वीर्य ही जिसका आयतन है। जो भी यह वीर्यरूप आयतनवाले पुरुषका पुत्ररूप विशेष आयतन है; पुत्रमय अर्थात् पितासे उत्पन्न हुए अस्थि, मज्जा और शुक्र। उसका देवता कौन है ? 'प्रजापति' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। 'प्रजापति' पिताको कहते हैं, क्योंकि पितासे ही पुत्रकी उत्पत्ति होती है ॥ १७ ॥ |

शाकल्यको चेतावनी

| अष्टधा देवलोकपुरुषभेदेन त्रिधा त्रिधा आत्मानं प्रविभज्यावस्थित एकैको देवः प्राणभेद एवोपासनार्थं व्यपदिष्टः । अधुना दिग्विभागेन पञ्चधा विभक्तस्य आत्मन्युपसंहारार्थमाह । तूष्णीम्भूतं शाकल्यं याज्ञवल्क्यो ग्रहेणेवावेशयन्नाह— | एक-एक देवता ही अपनेको देवलोक और पुरुषभेदसे¹ तीन-तीन भागोंमें विभक्त करके आठ प्रकारसे स्थित हुआ है; प्राणभेद अर्थात् पृथक्-पृथक् इन्द्रिय-समुदाय ही वह देवता है, उपासनाकी सुविधाके लिये यहाँ विभागपूर्वक उनका उपदेश किया गया है। अब विभिन्न दिशाओंके अनुसार पाँच भागोंमें विभक्त हुए उस प्राणभेदका आत्मामें उपसंहार करनेके लिये श्रुति कहती है। अपने प्रश्नोंका उत्तर पाकर मौन हुए शाकल्यको ग्रहाविष्ट-सा करते हुए याज्ञवल्क्यने कहा— |

शाकल्येति होवाच याज्ञवल्क्यस्त्वां स्विदिमे ब्राह्मणा अङ्गारावक्षयणमक्रता ३ इति ॥ १८ ॥


१. लोकका अर्थ है—सामान्य आकार, पुरुषका अर्थ है—विशेष-विशेष आकारमें स्थित चेतन तथा देवताका अर्थ है—इन दोनोंका कारण।