बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 823, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१३
| कामिनो हि हृदयाद्रेतोऽधि-<br>स्कन्दति । तस्मादपि प्रतिरूप-<br>मनुरूपं पुत्रं जातमाहुर्लौकिकाः—<br>अस्य पितुर्हृदयादिवायं पुत्रः<br>स्रुतो निःसृतः, हृदयादिव<br>निर्मितो यथा सुवर्णेन निर्मितः<br>कुण्डलः। तस्मात् हृदये ह्येव रेतः<br>प्रतिष्ठितं भवतीति । एवमेवैतत्<br>याज्ञवल्क्य ॥ २२ ॥ | क्योंकि कामीके हृदयसे ही वीर्य<br>स्खलित होता है । इसीसे पिताके<br>प्रतिरूप-अनुरूप उत्पन्न हुए पुत्रके<br>विषयमें लौकिक पुरुष ऐसा कहते<br>हैं कि यह पुत्र मानो अपने पिताके<br>हृदयसे ही स्रुत-विशेषरूपसे निःसृत<br>हुआ है, स्वर्णसे बने हुए कुण्डलके<br>समान मानो यह उसके हृदयसे ही<br>बना है, अतः हृदयमें ही वीर्य<br>प्रतिष्ठित है ।' 'याज्ञवल्क्य ! यह<br>बात ऐसी ही है' ॥ २२ ॥ |
देवता और प्रतिष्ठाके सहित उत्तर दिशाका वर्णन
किन्देवतोऽस्यामुदीच्यां दिश्यसीति सोमदेवत<br> इति स सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति दीक्षायामिति<br> कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति तस्मादपि<br> दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति<br> कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति हृदय इति होवाच<br> हृदयेन हि सत्यं जानाति हृदये ह्येव सत्यं प्रति-<br> ष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २३ ॥
'इस उत्तर दिशामें तुम किस देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य— ]<br> सोमदेवतावाला हूँ ।' [ शाकल्य— ] 'वह सोम किसमें प्रतिष्ठित है ?'<br> [ याज्ञवल्क्य— ] 'दीक्षामें ।' [ शाकल्य— ] 'दीक्षा किसमें प्रतिष्ठित है ?'<br> [ याज्ञवल्क्य— ] 'सत्यमें, इसीसे दीक्षित पुरुषसे कहते हैं कि सत्य बोलो,<br> क्योंकि सत्यमें ही दीक्षा प्रतिष्ठित है ।' [ शाकल्य— ] 'सत्य किसमें<br> प्रतिष्ठित है ?' 'हृदयमें ।' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, क्योंकि पुरुष हृदयसे ही<br> सत्यको जानता है, अतः हृदयमें ही सत्य प्रतिष्ठित है । [ शाकल्य— ]<br> 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २३ ॥