बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 886, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| हे याज्ञवल्क्येत्येवं सम्बोध्याभिमुखीकरणाय, किं ज्योतिरयं पुरुष इति—किमस्य पुरुषस्य ज्योतिर्येन ज्योतिषा व्यवहरति, सोऽयं किं ज्योतिः ? अयं प्राकृतः कार्यकारणसंघातरूपः शिरःपाण्यादिमान् पुरुषः पृच्छयते । किमयं स्वावयवसंघातबाह्येन ज्योतिरन्तरेण व्यवहरति, आहो स्वित् स्वावयवसंघातमध्यपातिना ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यमयं पुरुषो निर्वर्तयति, इत्येतदभिप्रेत्य पृच्छति । | 'हे याज्ञवल्क्य' इस प्रकार अपने अभिमुख करनेके लिये सम्बोधन करके जनक पूछता है—यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ? अर्थात् इस पुरुषकी ज्योति क्या है, जिस ज्योतिसे कि यह व्यवहार करता है ? (इसी अभिप्रायसे पूछता है—) सो यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ? यहाँ इस प्राकृत देहेन्द्रियसंघातरूप शिर और हाथ आदि अवयवोंवाले पुरुषके विषयमें प्रश्न किया जाता है। क्या यह अपने अवयवोंसे बाहर रहनेवाली किसी अन्य ज्योतिसे व्यवहार करता है, अथवा अपने अवयवोंके संघातमें रहनेवाली ज्योतिसे यह पुरुष ज्योतिका कार्य पूरा करता है—इस अभिप्रायसे ही जनक पूछता है। | | किं चातः, यदि व्यतिरिक्तेन यदि वाऽव्यतिरिक्तेन ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यं निर्वर्तयति । शृणु यत्र कारणम्—यदि व्यतिरिक्तेनैव ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यनिर्वर्तकत्वम् अस्य स्वभावो निर्धारितो भवति, ततोऽदृष्टज्योतिष्कार्यविषयेऽप्यनुमास्यामहे व्यतिरिक्तज्योतिर्निमित्तमेवेदं कार्यमिति; | किंतु देहादि संघातसे व्यतिरिक्त अथवा अव्यतिरिक्त किसी भी प्रकारकी ज्योतिसे यह ज्योतिका कार्य पूर्ण करता हो—इससे क्या हुआ ? इसमें जो कारण है, सो सुनो—यदि इसका स्वभाव किसी व्यतिरिक्त ज्योतिसे ही ज्योतिका कार्य पूरा करनेका निश्चय किया जाय तो जहाँ ज्योति नहीं देखी गयी है, उस कार्यके विषयमें भी हम ऐसा अनुमान करेंगे कि यह कार्य किसी व्यतिरिक्त ज्योतिके कारण ही हुआ है; और यदि |