भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 89

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
एष ह वा अश्वमेधं क्रतुं वेद य एनमेवं वेद, यः कश्चिदेनमश्वमग्निरूपमर्कं च यथोक्तमेवं वक्ष्यमाणेन समासेन प्रदर्श्यमानेन विशेषणेन विशिष्टं वेद, स एषोऽश्वमेधं वेद नान्यः। तस्मादेवं वेदितव्य इत्यर्थः।जो इसे इस प्रकार जानता है, निश्चय वही अश्वमेधको जानता है। जो कोई भी इस अश्वको और ऊपर बतलाये हुए अग्निरूप अर्कको आगे कहे जानेवाले संक्षेपरूपसे प्रदर्शित विशेषणसे विशिष्ट जानता है वही अश्वमेधको जानता है, कोई दूसरा नहीं। अतः तात्पर्य यह है कि इसे इसी प्रकार जानना चाहिये।
कथम्? तत्र पशुविषयमेव तावद्दर्शनमाह। तत्र प्रजापतिर्भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति कामयित्वा आत्मानमेव पशुं मेध्यं कल्पयित्वा तं पशुमनवरुध्यैवोत्सृष्टं पशुमवरोधमकृत्वैव मुक्तप्रग्रहममन्यताचिन्तयत्। तं संवत्सरस्य पूर्णस्य परस्तादूर्ध्वमात्मने आत्मार्थमालभत—प्रजापतिदेवताकत्वेनेत्येतत्—आलभतालम्भं कृतवान्। पशूनन्यान ग्राम्यानारण्यांश्च देवताभ्यो यथादैवतं प्रत्यौहत्प्रतिगमितवान्।किस प्रकार जानना चाहिये? सो इस विषयमें पहले श्रुति पशुविषयक दृष्टिका ही निरूपण करती है। प्रजापतिने ऐसी इच्छा करके कि मैं पुनः बड़े भारी यज्ञसे यजन करूँ अपनेहीको यज्ञिय पशु कल्पना कर उस पशुका अनवरोध कर उसे छूटा हुआ माना अर्थात् उसकी रोक-टोक न करते हुए उसे बन्धनहीन चिन्तन किया। फिर पूरे एक संवत्सरके पीछे उसे अपने ही लिये आलभन किया अर्थात् प्रजापति देवता-सम्बन्धी पशुरूपसे उसका आलभन किया; तथा अन्य देवताओंको भी तत्तद्देवसम्बन्धी अन्यान्य ग्राम्य एवं वन्य पशु प्राप्त कराये।
यस्माच्चैवं प्रजापतिरमन्यत तस्मादेवमन्योऽप्युक्तेन विधिनात्मानं पशुमश्वं मेध्यं कल्पयित्वाक्योंकि प्रजापतिने ऐसा माना था, इसलिये दूसरे यज्ञकर्ताको भी उपर्युक्त विधिसे ही अपनेको यज्ञिय