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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८३

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
एष ह वा अश्वमेधं क्रतुं वेद य एनमेवं वेद, यः कश्चिदेनमश्वमग्निरूपमर्कं च यथोक्तमेवं वक्ष्यमाणेन समासेन प्रदर्श्यमानेन विशेषणेन विशिष्टं वेद, स एषोऽश्वमेधं वेद नान्यः। तस्मादेवं वेदितव्य इत्यर्थः।जो इसे इस प्रकार जानता है, निश्चय वही अश्वमेधको जानता है। जो कोई भी इस अश्वको और ऊपर बतलाये हुए अग्निरूप अर्कको आगे कहे जानेवाले संक्षेपरूपसे प्रदर्शित विशेषणसे विशिष्ट जानता है वही अश्वमेधको जानता है, कोई दूसरा नहीं। अतः तात्पर्य यह है कि इसे इसी प्रकार जानना चाहिये।
कथम्? तत्र पशुविषयमेव तावद्दर्शनमाह। तत्र प्रजापतिर्भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति कामयित्वा आत्मानमेव पशुं मेध्यं कल्पयित्वा तं पशुमनवरुध्यैवोत्सृष्टं पशुमवरोधमकृत्वैव मुक्तप्रग्रहममन्यताचिन्तयत्। तं संवत्सरस्य पूर्णस्य परस्तादूर्ध्वमात्मने आत्मार्थमालभत—प्रजापतिदेवताकत्वेनेत्येतत्—आलभतालम्भं कृतवान्। पशूनन्यान ग्राम्यानारण्यांश्च देवताभ्यो यथादैवतं प्रत्यौहत्प्रतिगमितवान्।किस प्रकार जानना चाहिये? सो इस विषयमें पहले श्रुति पशुविषयक दृष्टिका ही निरूपण करती है। प्रजापतिने ऐसी इच्छा करके कि मैं पुनः बड़े भारी यज्ञसे यजन करूँ अपनेहीको यज्ञिय पशु कल्पना कर उस पशुका अनवरोध कर उसे छूटा हुआ माना अर्थात् उसकी रोक-टोक न करते हुए उसे बन्धनहीन चिन्तन किया। फिर पूरे एक संवत्सरके पीछे उसे अपने ही लिये आलभन किया अर्थात् प्रजापति देवता-सम्बन्धी पशुरूपसे उसका आलभन किया; तथा अन्य देवताओंको भी तत्तद्देवसम्बन्धी अन्यान्य ग्राम्य एवं वन्य पशु प्राप्त कराये।
यस्माच्चैवं प्रजापतिरमन्यत तस्मादेवमन्योऽप्युक्तेन विधिनात्मानं पशुमश्वं मेध्यं कल्पयित्वाक्योंकि प्रजापतिने ऐसा माना था, इसलिये दूसरे यज्ञकर्ताको भी उपर्युक्त विधिसे ही अपनेको यज्ञिय

८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

८४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| —सर्वदेवत्योऽहं प्रोक्ष्यमाण आलभ्यमानस्त्वहं मदेवत्य एव स्याम्, अन्य इतरे पशवो ग्राम्यारण्या यथादैवतमन्याभ्यो देवताभ्य आलभ्यन्ते मदवयवभूताभ्य एव—इति विद्यात्। अत एवेदानीं सर्वदेवत्यं प्रोक्षितं प्राजापत्यमालभन्ते याज्ञिकाः। | अश्व मानकर 'मैं वेदमन्त्रोंद्वारा अभिषिक्त होकर सर्वदेवसम्बन्धी होता हूँ, किंतु आलभन किये जानेपर केवल अपने ही देवताके लिये होऊँ; तथा दूसरे ग्राम्य और वन्य पशु, अन्यान्य देवताओंके अनुसार मेरे ही अवयवभूत विभिन्न देवोंके लिये आलभन किये जाते हैं—ऐसा जाने। इसीलिये आजकल याज्ञिकलोग समस्त देवताओंके लिये [ मन्त्रोंद्वारा ] अभिषिक्त किये हुए प्रजापतिसम्बन्धी पशुका आलभन करते हैं। | | 'एवमेष ह वा अश्वमेधो य एष तपति'—यस्त्वेवं पशुसाधनकः क्रतुः स एष साक्षात्फलभूतो निर्दिश्यत एष ह वा अश्वमेधः। कोऽसौ ? य एष सविता तपति जगदवभासयति तेजसा। तस्यास्य क्रतुफलात्मनः संवत्सरः कालविशेषः, आत्मा शरीरं तन्निर्वर्त्यत्वात्संवत्सरस्य । | 'एवमेष ह वा अश्वमेधो य एष तपति' इसकी व्याख्या की जाती है—इस प्रकार यह जो पशुद्वारा साध्य क्रतु है वही 'एष ह वा अश्वमेधः' इस वाक्यसे साक्षात् फलरूपसे बतलाया जाता है। वह कौन-सा है ? जो कि सूर्य तपता अर्थात् अपने तेजसे जगत्‌को प्रकाशित करता है। उस इस यज्ञफलरूप सूर्यका संवत्सर—काल-विशेष आत्मा यानी शरीर है, क्योंकि उसीके द्वारा संवत्सर निष्पन्न होता है।^१ | | तस्यैव क्रत्वात्मनः, अग्नि- | उस यज्ञात्माका साधनभूत यह |


१ क्योंकि सूर्यके उदयास्तसे दिन-रातके द्वारा संवत्सर होता है। यहाँतक अश्वमेधकी सूर्यरूपता बतलाकर अब उसके साधनभूत अग्निका सूर्यत्व बतलाया जाता है।

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ८५

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ८५


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
साध्यत्वाच्च फलस्य क्रतुत्वरूपेणैव निर्देशः, अयं पार्थिवोऽग्निरर्कः साधनभूतः। तस्य चार्कस्य क्रतौ चित्यस्येमे लोकास्त्रयोऽप्यात्मानः शरीरावयवाः। तथा च व्याख्यातं 'तस्य प्राची दिक्' इत्यादिना। तावग्न्यादित्यावेतौ यथाविशेषितावर्काश्वमेधौ क्रतुफले। अर्को यः पार्थिवोऽग्निः स साक्षात्क्रतुरूपः क्रियात्मकः। क्रतोरग्निसाध्यत्वात्तद्रूपेणैव निर्देशः। क्रतुसाध्यत्वाच्च फलस्य क्रतुरूपेणैव निर्देश आदित्योऽश्वमेध इति।पार्थिव अग्नि अर्क है; यज्ञफल अग्निसाध्य है, इसलिये उसका यज्ञरूपसे निर्देश किया गया है। यज्ञमें चयन किये जानेवाले उस अर्कके तीनों लोक आत्मा-शरीरके अवयव हैं। इसीसे 'उसका पूर्वदिशा शिर है' इत्यादि वाक्यसे उसकी व्याख्या की गयी है। वे ये अग्नि और आदित्य ऊपर दिये हुए विशेषणके अनुसार अर्क और अश्वमेध क्रमशः यज्ञ और फल हैं। अर्क जो पार्थिव अग्नि है वह साक्षात् क्रियात्मक यज्ञरूप है। यज्ञ अग्निसाध्य है, इसलिये अग्निरूपसे ही उसका निर्देश किया जाता है। तथा फल यज्ञसाध्य है इसलिये 'आदित्य अश्वमेध है' इस प्रकार यज्ञरूपसे ही उसका निर्देश किया जाता है।
तौ साध्यसाधनौ क्रतुफलभूतावग्न्यादित्यौ, सा उ पुनर्भूय एकैव देवता भवति। का सा? मृत्युरेव। पूर्वमप्येकैवासीत्क्रियासाधनफलभेदाय विभक्ता। तथा चोक्तम् "स त्रेधात्मानं व्यकुरुत" (बृ० उ० १।२।३) इति। सा पुनरपि क्रियानिर्वृत्त्युत्तरकाल-वे यज्ञ एवं फलभूत अग्नि और आदित्य साध्य और साधन हैं। वे भी आपसमें मिलकर पुनः-फिर भी एक ही देवता हैं। यह एक देव कौन है? वह मृत्यु है। पहले भी वह (मृत्युदेवता) एक ही था, क्रियाके साधन और फलभेदके लिये उसका विभाग हो गया। ऐसा ही कहा भी है—"उसने अपनेको तीन प्रकारसे विभक्त किया" इत्यादि। वह फिर भी अर्थात् क्रियानिष्पत्तिके

८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

८६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| मेकैव देवता भवति मृत्युरेव फलरूपः।<br><br>यः पुनरेवमेनमश्वमेधं मृत्युमेकां देवतां वेद। अहमेव मृत्युरस्म्यश्वमेध एका देवता मद्रूपा अश्वाग्निसाधनसाध्येति सोऽपजयति पुनर्मृत्युं पुनर्मरणं सकृन्मृत्वा पुनर्मरणाय न जायत इत्यर्थः। अपजितोऽपि मृत्युरेनं पुनराप्नुयादित्याशङ्क्याह—नैनं मृत्युराप्नोति। कस्मात्? मृत्युरस्य एवंविद आत्मा भवति। किञ्च मृत्युरेव फलरूपः सन्ने-तासां देवतानामेको भवति। तस्यैतत् फलम् ॥ ७ ॥ | उत्तरकालमें भी एक ही देवता अर्थात् फलरूप मृत्यु ही हो जाता है।<br><br>जो इस प्रकार इस अश्वमेधको मृत्युरूप एक देवता जानता है; अर्थात् मैं ही अश्वमेधरूप मृत्यु हूँ—अग्नि और अश्वरूप साधनसे सिद्ध होनेवाली एक देवता मेरा ही रूप है—ऐसी जो उपासना करता है वह पुनर्मृत्युको जीत लेता है। तात्पर्य यह है कि एक बार मरकर वह पुनः मरनेके लिये उत्पन्न नहीं होता। इस प्रकार परास्त हो जानेपर भी मृत्यु इसे पुनः प्राप्त कर लेगा—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है—इसे मृत्यु पुनः प्राप्त नहीं कर सकता। क्यों? क्योंकि इस प्रकार जाननेवालेका मृत्यु आत्मा हो जाता है। बल्कि मृत्यु ही फलरूप होकर इन देवताओंमेंसे कोई एक हो जाता है। उस उपासकको यही फल प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये
द्वितीयमग्निब्राह्मणम् ॥ २ ॥


तृतीय ब्राह्मण

तृतीय ब्राह्मण

संस्कृत मूल / भाष्यहिन्दी अनुवाद
द्वया हेत्याद्यस्य कः सम्बन्धः ?<br><br>प्रकरण-सम्बन्धः — कर्मणां ज्ञानसहितानां परा गतिरुक्ता मृत्यात्मभावोऽश्वमेधगत्युक्त्या । अथेदानीं मृत्यात्मभावसाधनभूतयोः कर्मज्ञानयोर्यत उद्भवस्तत्प्रकाशनार्थमुद्गीथब्राह्मणमारभ्यते ।'द्वया ह' इत्यादि वाक्यसे आरम्भ होनेवाले इस ब्राह्मणका पूर्वब्राह्मणसे क्या सम्बन्ध है ?—<br><br>यहाँतक अश्वमेधकी गति (फल) बतानेके द्वारा ज्ञानसहित कर्मोंकी मृत्युस्वरूपताकी प्राप्तिरूप परागति बतलायी गयी है। अब आगे मृत्युस्वरूपताके साधनभूत कर्म और ज्ञानका जिससे उदय होता है उसका प्रकाशन करनेके लिये उद्गीथ ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है।
ननु मृत्यात्मभावः पूर्वत्र ज्ञानकर्मणोः फलमुक्तम्। उद्गीथज्ञानकर्मणोस्तु मृत्यात्मभावातिक्रमणं फलं वक्ष्यति अतो भिन्नविषयत्वात्फलस्य न पूर्वकर्मज्ञानोद्भवप्रकाशनार्थमिति चेत् ।**शङ्का—**पहले तो ज्ञान और कर्मका फल मृत्युस्वरूपताकी प्राप्ति बतलाया गया है; किंतु उद्गीथज्ञान और कर्मका फल मृत्युस्वरूपताका अतिक्रमण बतलाया जायगा। अतः इसके फलका विषय भिन्न होनेसे यह पूर्वोक्त कर्म और ज्ञानके उद्गम-स्थानको प्रकाशित करनेके लिये नहीं हो सकता।
नायं दोषः; अग्न्यादित्यात्मभावत्वादुद्गीथफलस्य । पूर्वत्राप्येतदेव फलमुक्तम् 'एतासां देवतानामेको भवति' इति । ननु 'मृत्युमतिक्रान्तः' इत्यादि**समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उद्गीथका फल अग्नि एवं आदित्यस्वरूपताकी प्राप्ति है। पहले भी 'इनमेंसे कोई एक देवता हो जाता है' इस वाक्यसे यही फल बतलाया गया है। यदि कहो कि 'मृत्युसे अतिक्रान्त हो जाता है' इतना कथन तो पहलेकी अपेक्षा

८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

८८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| विरुद्धम्; न स्वाभाविकपाप्मा-<br>सङ्गविषयत्वादतिक्रमणस्य ।<br>कोऽसौ स्वाभाविकः पाप्मा-<br>सङ्गो मृत्युः ? कुतो वा<br>तस्योद्भवः ? केन वा तस्याति-<br>क्रमणम् ? कथं वा ? इत्ये-<br>तस्यार्थस्य प्रकाशनायाख्यायि-<br>कारभ्यते । कथम्— | विरुद्ध है ही—तो यह बात भी नहीं है, क्योंकि इस अतिक्रमणका विषय स्वाभाविक पापका सङ्ग होना है।<br>यह स्वाभाविक पापका सङ्गरूप मृत्यु क्या है ? कहाँसे उसकी उत्पत्ति होती है ? किसके द्वारा उसका अतिक्रमण हो सकता है ? और किस प्रकार हो सकता है ? इन सब बातोंको प्रकाशित करनेके लिये यह आख्यायिका आरम्भ की जाती है। सो किस प्रकार-- |

देव और असुरोंकी स्पर्धा, देवताओंका उद्गीथ-सम्बन्धी विचार

द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च। ततः कनीयसा एव देवा ज्यायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान्यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १॥

प्रजापतिके दो प्रकारके पुत्र थे--देव और असुर। उनमें देव थोड़े ही थे और असुर अधिक थे। इन लोकोंमें वे परस्पर स्पर्धा (डाह) करने लगे। उनमेंसे देवताओंने कहा, 'हम यज्ञमें उद्गीथके द्वारा असुरोंका अतिक्रमण करें' ॥ १॥

| द्वया द्विप्रकाराः । हेति पूर्व-<br>वृत्तावद्योतको निपातः। वर्तमान-<br>प्रजापतेः पूर्वजन्मनि यद् वृत्तं<br>तदवद्योतयति हशब्देन । प्राजा- | द्वयाः—दो प्रकारके। 'ह' यह पूर्ववृत्तान्तका द्योतक निपात है। वर्तमान प्रजापतिके पूर्वजन्ममें जो कुछ हुआ था उसे ही श्रुति 'ह' शब्दसे द्योतित करती है। 'प्राजापत्याः'—जिस जन्ममें पूर्ववृत्त |

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [८९

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [८९


संस्कृतहिन्दी
पत्याः प्रजापतेर्वृत्तजन्मावस्थस्यापत्यानि प्राजापत्याः। के ते? देवाश्चासुराश्च। तस्यैव प्रजापतेः प्राणा वागादयः।घटित हुआ था उसमें होनेवाले प्रजापतिके पुत्र प्राजापत्य कहे गये हैं। वे कौन थे? देवता और असुर; अर्थात् उसी प्रजापतिके वागादि प्राण [इन्द्र-विरोचनादि नहीं]।
कथं पुनस्तेषां देवासुरत्वम् ?<br><br>(प्राणानां देवासुरत्व-निर्वचनम्)<br>उच्यते—शास्त्रजनितज्ञानकर्मभाविता द्योतनाद्देवा भवन्ति। त एव स्वाभाविकप्रत्यक्षानुमानजनितदृष्टप्रयोजनकर्मज्ञानभाविता असुराः। स्वेष्वेवासुषु रमणात् सुरेभ्यो वा देवेभ्योऽन्यत्वात्।किंतु उनका देवासुरत्व कैसे माना जाता है? सो बतलाया जाता है। शास्त्र-जनित ज्ञान और कर्मसे भावित जो प्राण हैं, वे द्योतनशील (प्रकाशमय) होनेके कारण देव हैं; तथा वे (प्राण) ही स्वाभाविक प्रत्यक्ष एवं अनुमानजनित दृष्ट प्रयोजनवाले कर्म और ज्ञानसे भावित होनेपर असुर हैं। अपने ही असुओं (प्राणों) में रमण करनेके कारण अथवा सुर यानी देवोंसे भिन्न होनेके कारण वे असुर कहलाते हैं।
यस्माच्च दृष्टप्रयोजनज्ञानकर्मभाविता असुराः, ततस्तस्मात्कानीयसाः, कनीयांस एव कानीयसाः, स्वार्थेऽणि वृद्धिः। कनीयांसोऽल्पा एव देवाः। ज्यायसाक्योंकि असुरगण दृष्ट प्रयोजन-वाले ज्ञान और कर्मकी भावनासे युक्त हैं, इसलिये देवगण कानीयस हैं। कनीयान् ही कानीयस हैं। यहाँ [कनीयस् शब्दसे] स्वार्थमें 'अण्' प्रत्यय होनेपर आदि स्वरकी वृद्धि हुई है, जिससे 'कानीयस' शब्द सिद्ध हुआ है। तात्पर्य यह कि देवगण कनीयान् अर्थात् थोड़े

९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

९०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
असुरा ज्यायान्सोऽसुराः। स्वाभाविकी हि कर्मज्ञानप्रवृत्तिर्महत्तरा प्राणानां शास्त्रजनितायाः कर्मज्ञानप्रवृत्तेर्दृष्टप्रयोजनत्वात् । अत एव कनीयस्त्वं देवानां शास्त्रजनितप्रवृत्तेरल्पत्वात् । अत्यन्तयत्नसाध्या हि सा ।हो हैं। तथा असुरगण ज्यायस—ज्यायान् यानी अधिक हैं, क्योंकि दृष्ट प्रयोजनवाली होनेसे प्राणोंकी शास्त्रजनित कर्म-ज्ञानप्रवृत्तिकी अपेक्षा स्वाभाविक कर्म-ज्ञानप्रवृत्ति ही अधिकतर होती है। इसीसे शास्त्रजनित प्रवृत्तिकी अल्पताके कारण देवताओंकी भी अल्पता है, क्योंकि वह अत्यन्त यत्न करनेपर सिद्ध होनेवाली है।
ते देवाश्चासुराश्च प्रजापतिशरीरस्था एषु लोकेषु निमित्तभूतेषु स्वाभाविकेतरकर्मज्ञानसाध्येष्बु अस्पर्धन्त स्पर्धां कृतवन्तः। देवानां चासुराणां च वृत्त्युद्भवाभिभवौ स्पर्धा । कदाचिच्छास्त्रजनितकर्मज्ञानभावनारूपा वृत्तिः प्राणानामुद्भवति । यदा चोद्भवति तदा दृष्टप्रयोजना प्रत्यक्षानुमानजनितकर्मज्ञानभावनारूपा तेषामेव प्राणानां वृत्तिरासुर्यभिभूयते । स देवानां जयोऽसुराणां पराजयः। कदाचित्तद्विपर्ययेण देवानां वृत्तिरभिभूयत आसुर्या उद्भवः । सो-प्रजापतिके शरीरमें रहनेवाले वे देव और असुर स्वाभाविक एवं अस्वाभाविक (शास्त्रजनित) कर्म और ज्ञानसे साध्य लोकोंके निमित्त स्पर्धा (डाह) करने लगे। दैवी और आसुरी वृत्तियोंका उठना और दबना ही देवता और असुरोंकी स्पर्धा है। कभी तो प्राणोंकी शास्त्रजनित कर्मज्ञानभावनारूपा वृत्ति उठती है, और जिस समय वह उठती है उस समय उन्हीं प्राणोंकी दृष्ट प्रयोजनवाली प्रत्यक्ष एवं अनुमानजनित कर्मज्ञानभावनारूपा आसुरी वृत्ति दब जाती है। यही देवताओंका जय और असुरोंका पराजय है। तथा कभी इसके विपरीत देवताओंकी वृत्ति दब जाता है और आसुरी वृत्तिका उत्थान

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९१

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९१


संस्कृत शाङ्करभाष्यहिन्दी अनुवाद
ऽसुराणां जयो देवानां पराजयः। एवं देवानां जये धर्मभूयस्त्वादुत्कर्ष आ प्रजापतित्वप्राप्तेः। असुरजयेऽधर्मभूयस्त्वादपकर्ष आ स्थावरत्वप्राप्तेः । उभयसाम्ये मनुष्यत्वप्राप्तिः ।होता है । वह असुरोंका विजय और देवोंका पराजय है। इस प्रकार देवताओंका विजय होनेपर धर्मकी अधिकता होनेके कारण प्रजापतिपदकी प्राप्तिपर्यन्त उत्कर्ष (ऊर्ध्वगमन) होता है तथा असुरोंका विजय होनेपर अधर्मकी अधिकता होनेके कारण स्थावरत्वप्राप्तिपर्यन्त अधोगति होती है और दोनोंकी समानता होनेपर मनुष्यत्वकी प्राप्ति होती है ।
त एवं कनीयस्त्वादभिभूयमाना असुरैर्देवा बाहुल्यादसुराणां किं कृतवन्तः? इत्युच्यते—ते देवा असुरैरभिभूयमाना ह किलोचुरूक्तवन्तः । कथम्? हन्तेदानीम् अस्मिन्यज्ञे ज्योतिष्टोमे, उद्गीथेन उद्गीथकर्मपदार्थकर्तृस्वरूपाश्रयणेन अत्ययामातिगच्छामः। असुरानभिभूय स्वं देवभावं शास्त्रप्रकाशितं प्रतिपद्यामह इत्युक्तवन्तोऽन्योन्यम् । उद्गीथकर्मपदार्थकर्तृस्वरूपाश्रयणं च ज्ञानकर्मभ्याम् ।इस प्रकार असुरोंकी अपेक्षा स्वयं अल्पसंख्य होनेसे तथा असुरोंकी अधिकता होनेके कारण उनके द्वारा दबे हुए उन देवताओंने क्या किया ? सो बतलाया जाता है । कहते हैं, असुरोंसे अभिभूत होते हुए उन देवताओंने कहा । क्या कहा ?—'अहो ! अब इस ज्योतिष्टोम यज्ञमें उद्गीथके द्वारा—उद्गीथनामक जो कर्मका अङ्गभूत पदार्थ है उसे करनेवाले प्राणके स्वरूपका आश्रय करके हम असुरोंका अतिक्रमण करेंगे; अर्थात् असुरोंका पराभव कर अपने शास्त्रप्रकाशित देवभावको प्राप्त करेंगे'—इस प्रकार उन्होंने आपसमें कहा । उद्गीथ कर्मरूप पदार्थके कर्ताके स्वरूपका आश्रय ज्ञान और कर्मके-

९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

९२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| कर्म वक्ष्यमाणं मन्त्रजपलक्षणं विधित्स्यमानं “तदेतानि जपेत्” इति। ज्ञानं त्विदमेव निरूप्यमाणम्। | द्वारा किया जा सकता है। उनमें कर्म तो “तदेतानि जपेत्” इस वाक्यद्वारा जिसका विधान करना इष्ट है वह आगे कहा जानेवाला मन्त्रजपरूप है और ज्ञान तो वही है जिसका निरूपण किया जा रहा है। | | नन्विदंमभ्यारोहजपविशेषोऽर्थवादो न ज्ञाननिरूपणपरम्। | शङ्का—किंतु यह तो अभ्यारोह¹ मन्त्रजपकी विधिको शेषभूत अर्थवाद है, ज्ञाननिरूपण-परक नहीं है। | | न; ‘य एवं वेद’ इति वचनात्। | समाधान—यह बात नहीं है, क्योंकि यहाँ ‘जो ऐसा जानता है’ ऐसा वचन है। | | (प्राणोपासनवाक्यस्य अन्यशेषत्व-निरासः)<br>उद्गीथप्रस्तावे पुराकल्पश्रवणादुद्गीथविधिपरमिति चेन्न, अप्रकरणात्। | यदि कहो कि उद्गीथके प्रकरणमें [‘द्वया ह’ इत्यादि] पूर्वकल्पसम्बन्धी श्रुति होनेसे यह उद्गीथ-विधिपरक है²—तो यह बात भी नहीं है, क्योंकि यह उद्गीथका प्रकरण ही नहीं है। | | उद्गीथस्य चान्यत्र विहितत्वात्। | उद्गीथका विधान तो अन्यत्र (कर्मकाण्डमें) किया गया है। | | विद्याप्रकरणत्वाच्चास्य। | यह तो विद्या (उपासना) का प्रकरण है। | | अभ्यारोहजपस्य चानित्यत्वात्, एवंवित्प्रयोज्यत्वात्; | इसके सिवा अभ्यारोहजप अनित्य होता है, क्योंकि प्राणवेत्ताद्वारा ही वह अनुष्ठान करनेयोग्य है और | | विज्ञानस्य च नित्यवच्छ्रवणात्। “तद्धैतल्लोक- | प्राणविज्ञान नित्यवत् सुना गया है।³ तथा “यह प्राणविज्ञान |


१. जिसके जपसे देवभावकी सम्मुखतासे प्राप्ति हो उस मन्त्रजपका नाम अभ्यारोह मन्त्रजप है।
२. अर्थात् उद्गीथविधिको शेषभूत अर्थवाद है।
३. तात्पर्य यह है कि अभ्यारोहजपका अधिकार प्राणवेत्ताको ही होनेके कारण,

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९३

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९३


जिदेव'' (छा० उ० १ । ३ । २८) इति च श्रुतेः; प्राणस्य वागादीनां च शुद्धयशुद्धिवचनात् । न ह्यनुपास्यत्वे प्राणस्य शुद्धिवचनं वागादीनां च सहोपन्यस्तानाम्‌अशुद्धिवचनम् । वागादिनिन्दया मुख्यप्राणस्तुतिश्चाभिप्रेता उपपद्यते । 'मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते' इत्यादि फलवचनं च । प्राणस्वरूपापत्तेर्हि फलं तद्यद्वागाद्यग्न्यादिभावः ।लोकोंकी प्राप्ति करानेवाला ही है” इस श्रुतिसे और प्राण तथा वागादिकी शुद्धि और अशुद्धि बतलायी जानेसे भी यह विज्ञानका ही प्रकरण सिद्ध होता है। प्राणकी उपास्यता बतलाना अभीष्ट न होनेपर प्राणकी शुद्धिका प्रतिपादन करना और उसीके साथ जिनका उल्लेख किया गया है उन वागादिको अशुद्ध कहना सम्भव नहीं है। इससे वागादिकी निन्दाद्वारा मुख्य प्राणकी स्तुति अभिमत एवं युक्तियुक्त जान पड़ती है। 'मृत्युको पार करके प्रकाशित होता है' ऐसा इसका फलवचन भी है। वागादिको जो अग्न्यादिभावकी प्राप्ति है वह उनकी प्राणस्वरूपताकी प्राप्तिका ही फल है।
भवतु नाम प्राणस्योपासनम्,**शङ्का—**यहाँ प्राणकी उपासना भले ही हो, परंतु उसका विशुद्धि आदि गुणोंसे युक्त होना तो सम्भव नहीं है।
न तु विशुद्ध्यादिगुणवत्तेति ।यदि कहो कि श्रुतिप्रतिपादित होनेके कारण ऐसा हो सकता है, तो ऐसा होना सम्भव नहीं है, क्योंकि श्रुति
ननु स्याच्छ्रुतत्वात्; न स्यात्;

प्राणविज्ञानसे पूर्व उसका अनुष्ठान नहीं हो सकता; इसलिये वह अनित्य है। किंतु प्राणविज्ञान उसकी अपेक्षा नित्य है। क्योंकि 'य एवं विद्वान् पौर्णमासीं यजते' इस नित्य पौर्णमासयागके समान 'य एवं वेद' (जो इस प्रकार जानता है) इस प्रकार नित्यवत् विज्ञान (उपासना) का श्रवण होता है। यहाँ प्रयाज आदि पौर्णमासीके प्रयोजक नहीं हैं, अपितु पौर्णमासी ही प्रयाज आदिकी प्रयोजिका है, उसी प्रकार प्राणवित्प्रयोज्य जप प्राणविज्ञानका प्रयोजक नहीं है, बल्कि प्राण-विज्ञान ही जपका प्रयोजक है। अतः वह जपसे पूर्वसिद्ध है।

६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
उपास्यत्वे स्तुत्यर्थत्वोपपत्तेः।तो, उपास्य होनेके कारण, उसकी स्तुतिके लिये भी हो सकती है।
न; अविपरीतार्थप्रतिपत्तेः श्रेयःप्राप्त्युपपत्तेर्लोकवत्। यो ह्यविपरीतमर्थं प्रतिपद्यते लोके स इष्टं प्राप्नोत्यनिष्टाद्वा निवर्तते, न विपरीतार्थप्रतिपत्त्या। तथेहापि श्रौतशब्दजनितार्थप्रतिपत्तौ श्रेयः-प्राप्तिरुपपन्ना न विपर्यये। न चोपासनार्थश्रुतशब्दोत्थविज्ञान-विषयस्य अयथार्थत्वे प्रमाणमस्ति। न च तद्विज्ञानस्यापवादः श्रूयते। ततः श्रेयःप्राप्तिदर्शनाद्यथार्थतां प्रतिपद्यामहे; विपर्यये चानर्थ-प्राप्तिदर्शनात्। यो हि विपर्यये-णार्थं प्रतिपद्यते लोके, पुरुषं स्थाणुरित्यमित्रं मित्रमिति वा, सोऽनर्थं प्राप्नुवन्दृश्यते। आत्म-समाधान— ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि अविरुद्ध अर्थके ज्ञानसे ही श्रेयःप्राप्ति होनी सम्भव है; ऐसा ही लोकमें भी देखा जाता है। लोकमें जो पुरुष अविरुद्ध अर्थका ज्ञान रखता है वही अभीष्ट प्राप्त करता है और अनिष्टसे बचता है। विपरीत अर्थके ज्ञानसे ऐसा नहीं होता। इसी प्रकार यहाँ भी श्रुतिके शब्दसे निकलनेवाले अर्थके ज्ञानसे ही श्रेयःप्राप्ति होनी सम्भव है, विपरीत अवस्थामें नहीं। इसके सिवा उपासनाका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिके शब्दसे होनेवाले विज्ञानके विषयके मिथ्या होनेमें कोई प्रमाण भी नहीं है। श्रुति उस विज्ञानका कहीं अपवाद भी नहीं करती। अतः उससे श्रेयःप्राप्ति दिखायी देनेसे हम उसकी यथार्थता मानते ही हैं, क्योंकि इससे विपरीत माननेमें अनर्थकी प्राप्ति देखी जाती है। लोकमें जो पुरुष वस्तुको विपरीत-भावसे ग्रहण करता है, जैसे पुरुष-को स्थाणु अथवा शत्रुको मित्र समझता है, वह अनर्थको प्राप्त होता देखा जाता है। यदि श्रुतिसे

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९५ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९५

| श्‍वरदेवतादीनामपि अयथार्थानामेव चेद् ग्रहणं श्रुतितः, अनर्थप्राप्त्यर्थं शास्त्रमिति ध्रुवं प्राप्नुयाल्लोकवदेव, न चैतदिष्टम्; तस्माद्यथाभूतानेव आत्मेश्वरदेवतादीन् ग्राहयत्युपासनार्थं शास्त्रम् । | आत्मा, ईश्वर और देवतादिका भी अयथार्थरूपसे ही ग्रहण होता तब तो लोककी तरह शास्त्र भी अनर्थप्राप्तिके ही लिये है—ऐसी आपत्ति अवश्य हो सकती थी। परंतु यह इष्ट नहीं है; अतः शास्त्र उपासनाके लिये यथार्थ आत्मा, ईश्वर और देवतादिको ही ग्रहण कराता है। | | नामादौ ब्रह्मदृष्टिदर्शनादयुक्तमिति चेत्स्फुटं नामादेरब्रह्मत्वम्, तत्र ब्रह्मदृष्टिं स्थाण्वादाविव पुरुषदृष्टिं विपरीतां ग्राहयच्छास्त्रं दृश्यते । तस्माद्यथार्थमेव शास्त्रतः प्रतिपत्तेः श्रेयः इत्ययुक्तमिति चेत् ? | शङ्का—नामादिमें ब्रह्मदृष्टि देखी जानेके कारण तुम्हारा कथन ठीक नहीं है। नामादिका अब्रह्मत्व स्पष्ट ही है। उनमें स्थाणु आदिमें पुरुषदृष्टिके समान शास्त्र विपरीत ब्रह्मदृष्टिका ग्रहण कराता देखा जाता है। अतः शास्त्रसे यथार्थ ज्ञान होनेके कारण ही श्रेयकी प्राप्ति होती है—ऐसा कहना ठीक नहीं। | | न, प्रतिमावद्भेदप्रतिपत्तेः। नामादावब्रह्मणि ब्रह्मदृष्टिं विपरीतां ग्राहयति शास्त्रं स्थाण्वादाविव पुरुषदृष्टिम्, इति नैतत् साध्ववोचः। कस्मात् ? भेदेन हि ब्रह्मणो नामादिवस्तुप्रतिपन्नस्य नामादौ विधीयते ब्रह्मदृष्टिः प्रतिमादाविव विष्णुदृष्टिः । आलम्बनत्वेन हि | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रतिमाके समान उनका ब्रह्मसे भेदज्ञान रहता है। स्थाणु आदिमें पुरुषदृष्टिके समान शास्त्र नामादि अब्रह्ममें विपरीत ब्रह्मदृष्टिका ग्रहण करता है—यह तुमने ठीक नहीं कहा। क्यों ? क्योंकि जिसे ब्रह्मसे नामादि वस्तुका भेदरूपसे ज्ञान है उसीके लिये प्रतिमादिमें विष्णुदृष्टिके समान नामादिमें ब्रह्म- |

९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

९६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
नामादिप्रतिपत्तिःप्रतिमादिवदेव, न तु नामाद्येव ब्रह्मेति । यथा स्थाणावनिर्ज्ञाते न स्थाणुरिति, पुरुष एवायमिति प्रतिपद्यते विपरीतम्, न तु तथा नामादौ ब्रह्मदृष्टिर्विपरीता ।दृष्टिका विधान किया जाता है। प्रतिमादिके समान नामादिका ज्ञान भी ब्रह्मके आलम्बन रूपसे ही होता है, नामादि ही ब्रह्म है, ऐसा ज्ञान नहीं होता। जिस प्रकार स्थाणुका ज्ञान न होनेपर 'यह स्थाणु नहीं है, पुरुष ही है' ऐसा विपरीत ज्ञान होता है, नामादिमें वैसी विपरीत ब्रह्मदृष्टि नहीं होती।
ब्रह्मदृष्टिरेव केवला नास्ति ब्रह्मेति चेत् । एतेन प्रतिमाब्राह्मणादिषु विष्ण्वादिदेवपित्रादिदृष्टीनां तुल्यता ।पूर्वपक्षी—किंतु इससे 'केवल ब्रह्मदृष्टि ही होती है, वस्तुतः ब्रह्म है नहीं' यही बात सिद्ध होती है। प्रतिमा और ब्राह्मणादिमें विष्णु आदि देव और पितृ आदि दृष्टियाँ भी इसीके समान हैं।
न; ऋगादिषु पृथिव्यादिदृष्टिदर्शनात् । विद्यमानपृथिव्यादिवस्तुदृष्टीनामेव ऋगादिविषये क्षेपदर्शनात् । तस्मात्तत्सामान्यान्नामादिषु ब्रह्मादिदृष्टीनां विद्यमानब्रह्मादिविषयत्वसिद्धिः ।सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ऋगादिमें पृथिवी आदि दृष्टि देखी जाती है अर्थात् ऋगादि विषयोंमें पृथिवी आदि विद्यमान वस्तुविषयक दृष्टियोंका ही आरोप देखा गया है। अतः उनसे समानता होनेके कारण नामादिमें जो ब्रह्मादिदृष्टि हैं उनकी विद्यमान ब्रह्मादिविषयता सिद्ध होती है।
एतेन प्रतिमाब्राह्मणादिषु विष्ण्वादिदेवपित्रादिबुद्धीनां च सत्यवस्तुविषयत्वसिद्धिः । मुख्यापेक्षत्वाच्च गौणत्वस्य । पञ्चाग्न्या-इससे प्रतिमा और ब्राह्मणादिमें विष्णु आदि देवदृष्टि और पित्रादि दृष्टियोंका भी सत्यवस्तुविषयक होना सिद्ध होता है, क्योंकि गौणता तो मुख्यकी अपेक्षासे होती है। जिस

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९७

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९७


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
दिषु चाग्नित्वादेर्गौणत्वान्मुख्याग्न्यादिसद्भाववन्नामादिषु ब्रह्मत्वस्य गौणत्वान्मुख्यब्रह्मसद्भावोपपत्तिः ।प्रकार पञ्चाग्नि आदिमें अग्नित्वकी गौणता होनेसे मुख्याग्नि आदिका सद्भाव सिद्ध होता है उसी प्रकार नामादिमें ब्रह्मत्वकी गौणता होनेसे मुख्य ब्रह्मकी सत्ता सिद्ध होती है।
क्रियार्थैश्चाविशेषाद्विद्यार्थानाम्इसके सिवा ज्ञानसम्बन्धी वाक्योंकी कर्मपरक वाक्योंसे समानता होनेके कारण भी [ यही सिद्ध होता है ]।
(बुद्धयुत्पादकत्वे ज्ञानवाक्यानां क्रियार्थवाक्यैः सामान्यम्)<br><br>यथा च दर्शपूर्णमासादिक्रियेदम्फला विशिष्टेतिकर्त्तव्यताका एवंक्रमप्रयुक्ताङ्गा च इत्येतदलौकिकं वस्तु प्रत्यक्षाद्यविषयं तथाभूतं च वेदवाक्यैरेव ज्ञाप्यते। तथा, परमात्मेश्वरदेवतादिवस्तु अस्थूलादिधर्मकमशनायाद्यतीतं चेत्येवमादिविशिष्टमिति वेदवाक्यैरेव ज्ञाप्यते, इत्यलौकिकत्वात्तथाभूतमेव भवितुमर्हतीति।जिस प्रकार दर्शपूर्णमासादि क्रिया इस फलवाली है, [ अमुक-अमुक प्रकारसे ] विशिष्ट इतिकर्तव्यता¹ वाली है और इस प्रकारके क्रमसे उसके अङ्गोंका प्रयोग होना चाहिये—ये सब अलौकिक बातें, जो प्रत्यक्षादि प्रमाणकी विषय नहीं हैं किंतु यथार्थ हैं, वेदवाक्योंसे ही जनायी जाती हैं, उसी प्रकार परमात्मा, ईश्वर एवं देवतादि पदार्थ स्थूलत्वादि धर्मोंसे रहित एवं क्षुधादिसे अतीत हैं तथा इस प्रकारके गुणोंसे विशिष्ट हैं—ये बातें वेदवाक्योंसे ही जानी जा सकती हैं। अतः अलौकिक होनेके कारण वे सत्य ही होनी चाहिये।
न च क्रियार्थैर्वाक्यैर्ज्ञानवाक्यानां बुद्धयुत्पादकत्वे विशेषोऽस्ति ।इसके सिवा क्रियार्थवाक्योंसे ज्ञानसम्बन्धी वाक्योंका बुद्धि उत्पन्न करनेमें कोई भेद भी नहीं

१. करणके सहायकरूपसे अपेक्षित कार्य 'इतिकर्तव्यता' कहलाते हैं, जैसे 'यवैर्यजेत्' इस यव-यागमें करणभूत 'यव' का प्रोक्षण आदि कार्य 'इतिकर्तव्यता' है।

बृ० उ० ७—

९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

९८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| न चानिश्चिता विपर्य्यस्ता वा परमात्मादिवस्तुविषया बुद्धिरुत्पद्यते । | है। उनसे परमात्मादि वस्तुविषयक अनिश्चित या विपरीत बुद्धि उत्पन्न नहीं होती। | | अनुष्ठेयाभावादयुक्तमिति चेत्<br><br>(ज्ञानवाक्यानां क्रियार्थवाक्यै-रसमानत्व-शङ्कनम्)<br>क्रियार्थैर्वाक्यैस्त्र्यंशा भावनानुष्ठेया ज्ञाप्यतेऽलौकिक्यपि ।<br>न तथा परमात्मेश्वरादिविज्ञानेऽनुष्ठेयं किञ्चिदस्ति । अतः क्रियार्थैः साधर्म्यमित्ययुक्तमिति चेत् ? | पूर्व०—ज्ञानपरक वाक्योंद्वारा कोई अनुष्ठेयकर्म नहीं होता, इसलिये उन्हें क्रियार्थवाक्योंके समान कहना अनुचित है। क्रियार्थवाक्योंसे अलौकिक होनेपर भी [ फल, साधन तथा इतिकर्तव्यतारूपसे ] तीन¹ अंशोंवाली भावना अनुष्ठेयरूपसे बतलायी जाती है। परमात्मा एवं ईश्वरादि-विज्ञानमें वैसा कोई अनुष्ठेय कर्म नहीं होता। अतः विज्ञानवाक्योंकी जो क्रियार्थवाक्योंसे सधर्मता बतलायी गयी है वह ठीक नहीं है। | | न, ज्ञानस्य तथाभूतार्थविषयत्वात् ।<br><br>(तस्य परिहारः)<br>न ह्यनुष्ठेयस्य त्र्यंशस्य भावनाख्यस्यानुष्ठेयत्वात्तथात्वम्, किं तर्हि ? प्रमाणसमधिगतत्वात् । न च तद्विषयाया बुद्धेरनुष्ठेयविषयत्वात्तथार्थत्वम्, किं तर्हि ? वेदवाक्य- | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ज्ञान यथार्थ वस्तुविषयक होता है। त्र्यंश (तीन अंशवाली) भावनासंज्ञक अनुष्ठेय कर्मकी, अनुष्ठेय होनेके कारण, यथार्थता नहीं है, तो फिर किस कारणसे है ? श्रुतिप्रमाणद्वारा ज्ञात होनेके कारण। इसी प्रकार परमात्मविषयक बुद्धिकी यथार्थता भी अनुष्ठेयवस्तुविषयक होनेसे नहीं है, तो फिर किस कारणसे है ? |


१. उन तीन अंशोंका स्वरूप यह है— (१) क्या भावना करे ? (२) किसके द्वारा भावना करे ? (३) किस प्रकार भावना करे ?

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
जनितत्वादेव । वेदवाक्याधिगतस्य वस्तुनस्तथात्वे सत्यनुष्ठेयत्वविशिष्टं चेदनुतिष्ठति । नो चेदनुष्ठेयत्वविशिष्टं नानुतिष्ठति ।वेदवाक्यजनित होनेसे ही उसकी यथार्थता है । वेदवाक्यद्वारा ज्ञात वस्तुके यथार्थ सिद्ध होनेपर यदि वह अनुष्ठेयत्वविशिष्ट होती है तो पुरुष उसका अनुष्ठान करता है और यदि अनुष्ठेयत्वविशिष्ट नहीं होती तो उसका अनुष्ठान नहीं करता ।
अननुष्ठेयत्वे वाक्यप्रमाणत्वानुपपत्तिरिति चेत् ।<br><br>(अननुष्ठेयत्वा-ज्ञानवाक्या-नामानर्थक्या-शङ्कनम्)<br><br>न ह्यनुष्ठेयेऽसति पदानां संहतिरूपपद्यते । अनुष्ठेयत्वे तु सति तादर्थ्येन पदानि संहन्यन्ते । तत्रानुष्ठेयनिष्ठं वाक्यं प्रमाणं भवति इदमनेनैवं कर्तव्यमिति । न त्विदमनेनैवमित्येवं प्रकाराणां पदशतानामपि वाक्यत्वमस्ति 'कुर्यात्क्रियेत कर्तव्यं भवेत्स्यादिति पञ्चमम्' इत्येवमादीनामन्यतमेऽसति । अतः परमात्मेश्वरादीनामवाक्यप्रमाणत्वम्, पदार्थत्वे च प्रमाणान्तरविषयत्वम् । अतोऽसदेतदिति चेत् ?**पूर्व—**किंतु अनुष्ठेयत्व न होनेपर तो वह वाक्यप्रमाणका विषय ही नहीं हो सकता । अनुष्ठेय न होनेपर पदोंका संहत होना ही सम्भव नहीं है । अनुष्ठेयत्व होनेपर ही उसे प्रकाशित करनेके लिये पदोंका मेल होता है । 'इसे यह इस प्रकार करना चाहिये' इस प्रकार अनुष्ठेयपरक वाक्य ही प्रमाण होता है । 'कुर्यात्, क्रियेत, कर्तव्यम्, भवेत्, स्यात्' ये पाँच विधि-बोधक क्रियापद हैं। ऐसे क्रियापदोंमेंसे किसीके भी न होनेपर तो 'इसे यह इस प्रकार' ऐसे सैकड़ों पदोंके मिलनेपर भी उनमें वाक्यत्व नहीं आ सकता । अतः परमात्मा एवं ईश्वरादि वाक्यप्रमाणके विषय नहीं हो सकते । यदि वे पदार्थ हैं तो किसी अन्य प्रमाणके विषय होंगे । अतः [ वे शास्त्रप्रमाणजनित हैं ] यह मानना ठीक नहीं ।
न, 'अस्ति मेरुर्वर्णचतुष्टयोपेतः'**सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है,

१०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१००बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृतहिन्दी
(तस्य परिहारः)<br>इत्येवमाद्यननुष्ठेयेऽपिवाक्यदर्शनात् ।<br>न च 'मेरुर्वर्णचतुष्टयोपेतः' इत्येवमादिवाक्यश्रवणे मेर्वादावनुष्ठेयत्वबुद्धिरुत्पद्यते । तथा अस्तिपदसहितानां परमात्मेश्वरादिप्रतिपादकवाक्यपदानां विशेषणविशेष्यभावेन संहतिः केन वार्यते ।क्योंकि 'मेरु चार वर्णोंसे युक्त है' इत्यादिमें अनुष्ठेय न होनेपर भी वाक्य देखा जाता है। 'मेरु चार वर्णोंसे युक्त है' इत्यादि वाक्य सुननेसे मेरु आदिमें अनुष्ठेयत्वबुद्धि भी उत्पन्न नहीं होती। इसी प्रकार परमात्मा और ईश्वरका प्रतिपादन करनेवाले 'अस्ति' पदयुक्त वाक्योंके पदोंकी विशेष्यविशेषणभावसे होनेवाली संहतिको भी कौन रोक सकता है ?
मेर्वादिज्ञानवत्परमात्मज्ञाने प्रयोजनाभावादयुक्तमिति चेत् ?पूर्व०—किंतु मेरु आदिके ज्ञानके समान परमात्माके ज्ञानसे तो कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता, इसलिये ऐसा मानना व्यर्थ है।
(ज्ञानवाक्यानां निष्प्रयोजनत्व-परिहारः)<br>न, "ब्रह्मविदाप्नोति परम्" (तै० उ० २ । १ । १)<br>"भिद्यते हृदयग्रन्थिः" (मु० उ० २ । २ । ८) इति फलश्रवणात्, संसारबीजाविद्यादिदोषनिवृत्तिदर्शनाच्च । अनन्यशेषत्वाच्च तज्ज्ञान-सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि परमात्मज्ञानका तो "ब्रह्मवेत्ता परम पद प्राप्त कर लेता है" "उसकी हृदयग्रन्थि टूट जाती है" इत्यादि फल सुना गया है तथा उससे संसारके बीजभूत अविद्यादि दोषकी निवृत्ति भी होती देखी गयी है। परमात्माका ज्ञान किसी अन्य कर्मका शेष भी नहीं है; इसलिये [पर्णमयीत्वाधिकरणकी ] 'जुहू'के

१. क्योंकि जिस प्रकार 'जुहू' को अन्य कर्मका शेषत्व प्राप्त करानेवाला 'यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्लोकं शृणोति' इत्यादि प्रमाण मिलता है, वैसा ब्रह्मज्ञानको 'यह किसी अनुष्ठानका अङ्ग है'—इस प्रकार अन्यशेषत्व प्राप्त करानेवाला कोई प्रमाण नहीं है, अतः उपर्युक्त श्रुतिको अर्थवाद नहीं कहा जा सकता।

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०१ |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०१ | | :--- | :--- | | स्य, जुह्वामिव फलश्रुतेरर्थवादत्वा-<br>नुपपत्तिः। <br><br> प्रतिषिद्धानिष्टफलसम्बन्धश्च वेदादेव विज्ञायते। न चानुष्ठेयः सः। न च प्रतिषिद्धविषये प्रवृत्तक्रियस्य अकरणादन्यदनुष्ठेयमस्ति। अकर्तव्यताज्ञाननिष्ठतैव हि परमार्थतः प्रतिषेधविधीनां स्यात्। <br><br> क्षुधार्तस्य प्रतिषेधज्ञानसंस्कृतस्य अभक्ष्येऽभोज्ये वा प्रत्युपस्थिते कलञ्जाभिशस्तान्नादौ 'इदं भक्ष्यमदो भोज्यम्' इति वा ज्ञानमुत्पन्नम्, तद्विषयया प्रतिषेधज्ञानस्मृत्या बाध्यते। मृगतृष्णिकायामिव पेयज्ञानं तद्विषययाथात्म्यविज्ञानेन। तस्मिन्बाधिते स्वाभाविकविपरीतज्ञानेऽनर्थकरी तल्लक्षणभोजनप्रवृत्तिर्न भवति। विपरीत- | विषयमें जिस प्रकार फलश्रुति अर्थवाद है उस प्रकार उसके अर्थवाद होनेकी भी सम्भावना नहीं है। <br><br> इसके सिवा प्रतिषिद्ध कर्मानुष्ठानसे अनिष्ट फलका सम्बन्ध होना भी वेदसे ही जाना जाता है और वह (प्रतिषिद्ध कर्म) अनुष्ठेय भी नहीं होता; तथा जो पुरुष क्रियामें प्रवृत्त है उसके लिये प्रतिषिद्ध विषयके न करनेसे ही दूसरे प्रकारका कर्म अनुष्ठेय नहीं हो जाता; क्योंकि वस्तुतः प्रतिषिद्धसम्बन्धी विधियोंका तात्पर्य उनकी अकर्त्तव्यताका ज्ञान करानेमें ही है। यदि प्रतिषेधज्ञानके संस्कारसे युक्त किसी क्षुधार्त्त पुरुषके सामने अभक्ष्य और अभोज्य कलञ्ज¹ या ²अभिशस्त अन्न उपस्थित हो तो उसे जो 'यह भक्ष्य है, यह भोज्य है' ऐसा ज्ञान उत्पन्न होगा। वह उसकी भोजनसम्बन्धिनी प्रतिषेधज्ञानस्मृतिसे बाधित हो जायगा, जिस प्रकार कि मृगतृष्णाके स्वरूपका ज्ञान होनेपर उसमें पेयबुद्धि नहीं रहती। उस स्वाभाविक विपरीत ज्ञानके बाधित हो जानेपर उसके भक्षण या भोजनमें अनर्थकारिणी प्रवृत्ति नहीं होती, क्योंकि वह प्रवृत्ति तो विपरीतज्ञानजनित थी |


१. मांस। २. ब्रह्महत्यादि पापसे दूषित पुरुषका अन्न।

१०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१०२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| ज्ञाननिमित्तायाः प्रवृत्तेर्निवृत्तिरेव, न पुनर्यत्नः कार्यस्तदभावे । तस्मात्प्रतिषेधविधीनां वस्तुयाथात्म्यज्ञाननिष्ठतैव, न पुरुषव्यापारनिष्ठतागन्धोऽप्यस्ति । | अतः उसकी निवृत्ति ही हो जाती है, उसके अभावके लिये उसे फिर कोई यत्न नहीं करना पड़ता । अतः प्रतिषेधविधियोंका वस्तुके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान करानेमें ही तात्पर्य है, उनमें पुरुषकी व्यापारनिष्ठताकी गन्ध भी नहीं है । | | तथेहापि परमात्मादियाथात्म्यज्ञानविधीनां तावन्मात्रपर्यवसानतैव स्यात् । तथा तद्विज्ञानसंस्कृतस्य तद्विपरीतार्थज्ञाननिमित्तानां प्रवृत्तीनामनर्थार्थत्वेन ज्ञायमानत्वात् परमात्मादियाथात्म्यज्ञानस्मृत्या स्वाभाविके तन्निमित्तविज्ञाने बाधितेऽभावः स्यात् । | इसी प्रकार यहाँ भी परमात्मादिके स्वरूपका ज्ञान करानेवाली विधियोंका तात्पर्य केवल उतनेहीमें है । तथा उसके ज्ञानके संस्कारसे युक्त पुरुषको उससे विपरीत पदार्थोंके ज्ञानकी निमित्तभूता प्रवृत्तियोंकी अनर्थार्थकताका ज्ञान हो जानेसे परमात्मादिके स्वरूपज्ञानकी स्मृतिसे स्वाभाविक प्रवृत्तिविषयक ज्ञानके बाधित हो जानेसे प्रवृत्तिका अभाव ही हो जाता है । | | ननु कलञ्जादिभक्षणादेरनर्थार्थत्ववस्तुयाथात्म्यज्ञानस्मृत्या स्वाभाविके तद्भक्ष्यत्वादिविषयविपरीतज्ञाने निवर्तिते तद्भक्षणाद्यनर्थप्रवृत्त्यभाववदप्रतिषेधविषयत्वाच्छास्त्रविहितप्रवृत्त्यभावो न युक्त इति चेत् । | पूर्व०—किंतु कलञ्जभक्षणादि अनर्थार्थक वस्तुओंके स्वरूपज्ञानकी स्मृतिसे उनके भक्ष्यत्वादिविषयक स्वभावसिद्ध विपरीत ज्ञानके निवृत्त हो जानेपर जैसे उनके भक्षणादिकी अनर्थमयी प्रवृत्तिका अभाव हो जाता है वैसे ही शास्त्रविहित प्रवृत्तिका अभाव होना तो उचित नहीं है, क्योंकि वह प्रतिषेधका विषय नहीं है । |