भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 910, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 910
८९६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| करोति, तादृगेतदात्मज्योतिर्बुद्धेरपि हृदयात् सूक्ष्मत्वाद् हृदन्तस्थमपि हृदयादिकं कार्यकारणसंघातं चैकीकृत्य आत्मज्योतिश्छायं करोति, पारम्पर्येण सूक्ष्मस्थूलतारतम्यात्, सर्वान्तरतमत्वात्। | कान्तिवाला कर देती है, उसी प्रकार यह आत्मज्योति बुद्धि अर्थात् हृदयसे भी सूक्ष्म होनेके कारण हृत्पिण्डमें स्थित हृदयादिक और देहेन्द्रियसंघातको भी अपनेसे अभिन्न करके आत्मज्योतिकी कान्तिसे युक्त ही कर देता है, क्योंकि परम्परासे सूक्ष्म-स्थूल तारतम्यसे यह सबकी अपेक्षा अन्तरतम है। | | बुद्धिस्तावत् स्वच्छत्वादानन्तर्याच्चात्मचैतन्यज्योतिः प्रतिच्छाया भवति; (अनात्मन्यात्मचैतन्याभाससंक्रान्तेः क्रमः) तेन हि विवेकिनामपि तत्र आत्माभिमानबुद्धिः प्रथमा; ततोऽप्यानन्तर्यान्मनसि चैतन्यावभासता, बुद्धिसम्पर्कात्; तत इन्द्रियेषु, मनःसंयोगात्; ततोऽनन्तरं शरीरे, इन्द्रियसम्पर्कात्। एवं पारम्पर्येण कृत्स्नं कार्यकारणसंघातमात्मा चैतन्यस्वरूपज्योतिषावभासयति। तेन हि सर्वस्य लोकस्य कार्यकारणसंघाते तद्वृत्तिषु चानियतात्माभिमानबुद्धिर्यथाविवेकं जायते। | बुद्धि तो स्वच्छ है और आत्माकी समीपवर्तिनी है, इसलिये वह आत्मचैतन्यकी प्रतिच्छायासे युक्त हो जाती है; इसीसे विवेकियॉको भी पहले उसीमें आत्माभिमानबुद्धि होती है; उसका भी समीपवर्ती होनेसे बुद्धिके सम्पर्कसे मनमें चैतन्यावभासता आती है और मनका [ इन्द्रियोंसे ] सम्पर्क होनेके कारण मनसे इन्द्रियोंमें; फिर इन्द्रियोंका शरीरसे सम्पर्क होनेके कारण उनसे शरीरमें चैतन्यावभासता आ जाती है; इस प्रकार परम्परासे आत्मा सम्पूर्ण देहेन्द्रियसंघातको चैतन्यस्वरूप प्रकाशसे प्रकाशित कर देता है, इसीसे सब लोगोंकी देहेन्द्रियसंघात और उसकी वृत्तियोंमें अपने-अपने विवेकके अनुसार अनियत आत्माभिमानबुद्धि उत्पन्न हो जाती है। | | तथा च भगवतोक्तं गीतासु— | ऐसा ही भगवान्ने भी गीतामें |