भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 913, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 913

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ८९९


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
प्रक्रमते—दिखानेकी इच्छासे श्रुति आरम्भ करती है।
स समानः सन्नुभौ लोकावनुसञ्चरति । यः पुरुषः स्वयमेव ज्योतिरात्मा; स समानः सदृशः सन्—केन ? प्रकृतत्वात् सन्निहितत्वाच्च हृदयेन; ‘हृदि’ इति च हृच्छब्दवाच्या बुद्धिः प्रकृता सन्निहिता च; तस्मात्तयैव सामान्यम् ।वह पुरुष समान रहकर इस लोक और परलोक-दोनोंमें सञ्चार करता है। जो पुरुष स्वयंज्योतिः-स्वरूप आत्मा ही है, वह समान—एक जैसा रहकर; किसके समान रहकर ? प्रकरण-प्राप्त और समीपवर्ती होनेके करण हृदयके; ‘हृदि’ इससे ‘हृत्’ शब्दवाच्य बुद्धि ही प्रकरणप्राप्त है और वही समीपवर्तिनी भी है; अतः उसीसे आत्माकी समानता रहती है।
किं पुनः सामान्यम् ? अश्वमहिषवद् विवेकतॊऽनुपलब्धिः; अवभास्या बुद्धिः, अवभासकं तदात्मज्योतिः, आलोकवत्; अवभास्यावभासकयोर्विवेक्तोऽनुपलब्धिः प्रसिद्धा; विशुद्धत्वाद्वद्यालोकोऽवभास्येन सदृशो भवति; यथा रक्तमवभासयन् रक्तसदृशो रक्ताकारो भवति, यथा हरितं नीलं लोहितं च अवभासयन्नालोकःवह समानता किस प्रकारकी है ? घोड़े और भैंसेके समान उनका अलग-अलग उपलब्ध न होना; बुद्धि प्रकाश्य है और प्रकाशके समान आत्मज्योति प्रकाशक है; प्रकाश्य और प्रकाशकका अलग-अलग उपलब्ध न होना प्रसिद्ध ही है; क्योंकि प्रकाश शुद्ध होनेके कारण प्रकाश्यके समान हो जाता है, जिस प्रकार लाल रंगकी वस्तुको प्रकाशित करते समय वह लालके समान—लाल आकारवाला हो जाता है। एवं हरे, नीले और लोहित पदार्थोंको प्रकाशित करते