बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 918, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भासकं ज्योतिरन्तरं प्रत्यक्षेण वानुमानेन वोपलभामहे; धीरेव हि चित्स्वरूपावभासकत्वेन स्वाकारा विषयाकारा च; तस्मान्नानुमानतो नापि प्रत्यक्षतो धियोऽवभासकं ज्योतिः शक्यते प्रतिपादयितुं व्यतिरिक्तम् । | तो घटादिके समान प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाणसे भी बुद्धिकी प्रकाशक कोई अन्य ज्योति हमें उपलब्ध नहीं होती; अपि तु चित्स्वरूपसे प्रकाशक होनेके कारण बुद्धि ही बुद्ध्याकार और विषयाकार हो जाती है । अतः बुद्धिकी अवभासक उससे भिन्न कोई अन्य ज्योति न तो अनुमानसे और न प्रत्यक्षसे ही बतलायी जा सकती है। | | यदपि दृष्टान्तरूपमभिहितम्, अवभास्यावभासकयोर्भिन्नयोरेव घटाद्यालोकयोः संयुक्तयोः सादृश्यमिति—तत्राभ्युपगममात्रमस्माभिरुक्तम्; न तत्र घटाद्यवभास्यावभासकौ भिन्नौ; परमार्थतस्तु घटादिरेवावभासात्मकः सालोकः; अन्योऽन्यो हि घटादिरुत्पद्यते; विज्ञानमात्रमेव सालोकघटादिविषयाकारमवभासते; यदैवम्, तदा न बाह्यो दृष्टान्तोऽस्ति, विज्ञानलक्षणमात्रत्वात् सर्वस्य । | इसके सिवा [स्वरूपतः] भिन्न किंतु परस्पर मिले हुए अवभास्य घटादि और अवभासक आलोकका जो दृष्टान्तरूपसे सादृश्य बतलाया गया है, उसे भी हमने एक प्रकारकी मान्यतामात्र कहा है; किंतु वहाँ घटादि अवभास्य और उनका अवभासक भिन्न नहीं हैं; वास्तवमें तो आलोकके सहित घटादि ही अवभासस्वरूप हैं । अन्य-अन्य घटादि उत्पन्न होते रहते हैं, केवल विज्ञान ही आलोकसहित घटादिरूप विषयके आकारमें भासित होता रहता है । जब कि ऐसी बात है, तो वस्तुतः कोई बाह्य दृष्टान्त नहीं है, क्योंकि सब कुछ विज्ञानस्वरूपमात्र ही है।¹ |
१. यहाँतक विज्ञानवादी बौद्धोंका मत कहा गया, इससे आगे इस मतका अनुवाद करते हुए शून्यवादी बौद्धोंका मत बतलाते हैं ।