भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 926, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 926
९१२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| तथा साधनानां फलस्य चैकत्वे, साध्यसाधनभेदोपदेशशास्त्रानर्थक्यप्रसङ्गः; तत्कर्तुरज्ञानप्रसङ्गो वा। | इस प्रकार साधन और फलकी भी एकता होनेपर तो साध्य-साधनरूप भेदका उपदेश करनेवाले शास्त्रकी व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, तथा उनके रचयिताओंके भी अज्ञानका प्रसङ्ग होगा ! | | किञ्चान्यत्—विज्ञानव्यतिरेकेण वादिप्रतिवादिवाददोषाभ्युपगमात्; न ह्यात्मविज्ञानमात्रमेव वादिप्रतिवादिवादस्तद्दोषो वाभ्युपगम्यते, निराकर्तव्यत्वात् प्रतिवाद्यादीनाम्; न ह्यात्मीयं विज्ञानं निराकर्तव्यमभ्युपगम्यते, स्वयं वा आत्मा कस्यचित्; तथा च सति सर्वसंव्यवहारलोपप्रसङ्गः। | इसके सिवा दूसरी बात यह है कि वादी-प्रतिवादीके वाद और दोष ये विज्ञानसे व्यतिरिक्त ही स्वीकार किये जाते हैं; वादी और प्रतिवादीके वाद अथवा दोष—आत्मविज्ञानमात्र ही नहीं स्वीकार किये जाते; क्योंकि प्रतिवादी आदिके लिये इनका निराकरण करना आवश्यक होता है; किंतु किसीके भी लिये अपना विज्ञान अथवा स्वयं आत्मा ही निराकरणके योग्य नहीं होता, यदि ऐसा हो तब तो सब प्रकारके सम्यक् व्यवहारके लोपका ही प्रसङ्ग उपस्थित हो जाय। | | न च प्रतिवाद्यादयः स्वात्मनैव गृह्यन्त इत्यभ्युपगमः; व्यतिरिक्तग्राह्या हि तेऽभ्युपगम्यन्ते। तस्मात् तद्वत् सर्वमेव व्यतिरिक्तग्राह्यं वस्तु जाग्रद्विषयत्वात्, | प्रतिवादी आदि विज्ञानरूप आत्मासे ही ग्रहण किये जाते हैं—ऐसा विज्ञानवादीको स्वीकार भी नहीं है; वे अपनेसे भिन्न वादी आदिके द्वारा ही ग्रहण किये जाते हैं—ऐसी मान्यता है। अतः उन्हींके समान सब वस्तुएँ अपनेसे भिन्न ग्राहकद्वारा ही ग्राह्य हैं, क्योंकि वे जाग्रत्के विषय हैं, |

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