बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 929, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 929
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९१५ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| एवेति प्रत्ययो भवति; कस्यचिद् दीर्घकालव्यवहितदृष्टेषु च तुल्यपरिमाणेषु, तत्कालीनवालादितुल्या इमे केशनखाद्या इतिप्रत्ययो भवति, न तु त एवेति; घटादिषु पुनर्भवति स एवेति प्रत्ययः; तस्मान्न समो दृष्टान्तः। | के लिये (एक-एक नख या केशके लिये) नहीं होती। किसी-किसीको दीर्घकालके पश्चात् देखे हुए समान परिमाणवाले केश-नखादिमें तो ये केश और नखादि उस समयके केश-नखादिके समान हैं—ऐसा प्रत्यय होता है, परंतु 'ये वही हैं' ऐसा नहीं होता; किंतु घटादिमें तो 'यह वही है' ऐसा प्रत्यय होता है; इसलिये यह (कटकर बढ़े हुए केश आदिका) दृष्टान्त ठीक नहीं है। |
| प्रत्यक्षेण हि प्रत्यभिज्ञायमाने वस्तुनि तदेवेति, न चान्यत्वमनुमातुं युक्तम्, प्रत्यक्षविरोधे लिङ्गस्याभासत्वोपपत्तेः; सादृश्यप्रत्ययानुपपत्तेश्च, ज्ञानस्य क्षणिकत्वात्; एकस्य हि वस्तुदर्शिनो वस्त्वन्तरदर्शने सादृश्यप्रत्ययः स्यात्; न तु वस्तुदर्शी एको वस्त्वन्तरदर्शनाय क्षणान्तरमवतिष्ठते; विज्ञानस्य क्षणिकत्वात् सकृद्वस्तुदर्शनेनैव क्षयोपपत्तेः। | यदि किसी वस्तुके विषयमें प्रत्यक्षतया ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है कि यह वही है तो उसके अन्य होनेका अनुमान करना उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोध होनेपर लिङ्गका आभासत्व सिद्ध होगा; तथा ज्ञान क्षणिक है, इसलिये सदृशताका भान होना भी सम्भव नहीं है। एक ही वस्तुदर्शीको किसी दूसरी वस्तुके देखनेपर सादृश्यप्रत्यय हो सकता है; और [तुम्हारे सिद्धान्तानुसार] एक वस्तुदर्शी दूसरी वस्तुको देखनेके लिये दूसरे क्षणमें रहता नहीं है; क्योंकि विज्ञान क्षणिक होनेके कारण उसका एक बार वस्तु देखनेसे ही क्षय होना सिद्ध हो जाता |