भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 97

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९१


संस्कृत शाङ्करभाष्यहिन्दी अनुवाद
ऽसुराणां जयो देवानां पराजयः। एवं देवानां जये धर्मभूयस्त्वादुत्कर्ष आ प्रजापतित्वप्राप्तेः। असुरजयेऽधर्मभूयस्त्वादपकर्ष आ स्थावरत्वप्राप्तेः । उभयसाम्ये मनुष्यत्वप्राप्तिः ।होता है । वह असुरोंका विजय और देवोंका पराजय है। इस प्रकार देवताओंका विजय होनेपर धर्मकी अधिकता होनेके कारण प्रजापतिपदकी प्राप्तिपर्यन्त उत्कर्ष (ऊर्ध्वगमन) होता है तथा असुरोंका विजय होनेपर अधर्मकी अधिकता होनेके कारण स्थावरत्वप्राप्तिपर्यन्त अधोगति होती है और दोनोंकी समानता होनेपर मनुष्यत्वकी प्राप्ति होती है ।
त एवं कनीयस्त्वादभिभूयमाना असुरैर्देवा बाहुल्यादसुराणां किं कृतवन्तः? इत्युच्यते—ते देवा असुरैरभिभूयमाना ह किलोचुरूक्तवन्तः । कथम्? हन्तेदानीम् अस्मिन्यज्ञे ज्योतिष्टोमे, उद्गीथेन उद्गीथकर्मपदार्थकर्तृस्वरूपाश्रयणेन अत्ययामातिगच्छामः। असुरानभिभूय स्वं देवभावं शास्त्रप्रकाशितं प्रतिपद्यामह इत्युक्तवन्तोऽन्योन्यम् । उद्गीथकर्मपदार्थकर्तृस्वरूपाश्रयणं च ज्ञानकर्मभ्याम् ।इस प्रकार असुरोंकी अपेक्षा स्वयं अल्पसंख्य होनेसे तथा असुरोंकी अधिकता होनेके कारण उनके द्वारा दबे हुए उन देवताओंने क्या किया ? सो बतलाया जाता है । कहते हैं, असुरोंसे अभिभूत होते हुए उन देवताओंने कहा । क्या कहा ?—'अहो ! अब इस ज्योतिष्टोम यज्ञमें उद्गीथके द्वारा—उद्गीथनामक जो कर्मका अङ्गभूत पदार्थ है उसे करनेवाले प्राणके स्वरूपका आश्रय करके हम असुरोंका अतिक्रमण करेंगे; अर्थात् असुरोंका पराभव कर अपने शास्त्रप्रकाशित देवभावको प्राप्त करेंगे'—इस प्रकार उन्होंने आपसमें कहा । उद्गीथ कर्मरूप पदार्थके कर्ताके स्वरूपका आश्रय ज्ञान और कर्मके-