छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| तथा च तद्विद्यसंवादे विपरी- <br> तग्रहनाशोऽपूर्वविज्ञानोपजनः <br> संशयनिवृत्तिश्चेति । अतस्तद्वि- <br> द्यसंयोगः कर्तव्य इति चेति- <br> हासप्रयोजनम् । दृश्यते हि <br> शिलकादीनाम् ॥ १ ॥ | इस प्रकार, जिन्हें विवक्षित अर्थका <br> ज्ञान है उन पुरुषोंके पारस्परिक <br> संवादसे विपरीत ग्रहणका नाश, <br> अपूर्व ज्ञानकी उत्पत्ति और संशयकी <br> निवृत्ति होती है । अतः उन-उन <br> विषयोंके ज्ञाता पुरुषोंका साथ करना <br> चाहिये—यह भी इस इतिहासका <br> प्रयोजन है । यही बात शिलकादिके <br> प्रसङ्गमें भी देखी जाती है ॥ १ ॥ |
तथेति ह समुपविविशुः स ह प्रवाहणो जैवलि- <br> रुवाच भगवन्तावग्रे वदतां ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचँश्रो- <br> ष्यामीति ॥ २ ॥
तब वे 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर बैठ गये । फिर जीवलके पुत्र प्रवाहणने कहा—'पहले आप दोनों पूज्यवर प्रतिपादन करें । मैं आप ब्राह्मणोंकी कही हुई वाणीको श्रवण करूँगा' ॥ २ ॥
| तथेत्युक्त्वा ते समुपविविशु- <br> ह्योपविष्टवन्तः किल । तत्र राज्ञः <br> प्रागल्भ्योपपत्तेः स ह प्रवाहणो <br> जैवलिरुवाचेतरौ भगवन्तौ पूजा- <br> वन्तावग्रे पूर्वं वदताम् । ब्राह्मण- | फिर वे 'बहुत अच्छा' ऐसा कह- <br> कर बैठ गये । उनमें [ ब्राह्मणोंके <br> प्रथम बोलनेसे ] राजा ( क्षत्रिय ) <br> की प्रगल्भता ( धृष्टता ) सिद्ध होती <br> है, इसलिये उस जीवलके पुत्र <br> प्रवाहणने शेष दोनोंके प्रति कहा— <br> 'पहले आप भगवान्—पूजनीय लोग <br> कहें; आप ब्राह्मणोंके कहे हुए शब्दों- |