भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 978 में से

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पृष्ठ 155

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५१


तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥

इसी विषयमें कहते हैं—[ जब कहा जाय कि अमुक पुरुष ] इस [ राजा आदि ] के पास सामद्वारा गया तो [ ऐसा कहकर ] लोग यही कहते हैं कि वह इसके पास साधुभावसे गया और [ जब यों कहा जाय कि ] वह इसके पास असामद्वारा गया तो [ इससे ] लोग यही कहते हैं कि वह इसके यहाँ असाधुभावसे प्राप्त हुआ ॥ २ ॥

| तत्तत्रैव साध्वसाधुविवेककरण उताप्याहुः । साम्नैनं राजानं सामन्तं चोपागादुपगतवान् । कोऽसौ ? यतोऽसाधुत्वप्राप्त्याशङ्का स इत्यभिप्रायः । शोभनाभिप्रायेण साधुनैनमुपागादित्येव तत्तत्राहुर्लौकिका बन्धनाद्यसाधुकार्यमपश्यन्तः । यत्र पुनर्विपर्ययो बन्धनाद्यसाधुकार्यं पश्यन्ति तत्रासाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥ | वहाँ—उस साधु-असाधुका विवेक करनेमें ही कहते हैं कि [ जब यह कहा जाता है कि ] इस राजा अथवा सामन्तके पास सामरूपसे गया—कौन गया ? जिससे कि असाधुत्वकी प्राप्तिकी आशङ्का थी वह—ऐसा इसका तात्पर्य है—तो उसके बन्धन आदि असाधु कार्योंके न देखनेवाले लौकिक पुरुष यही कहते हैं कि वह उस [ राजा या सामन्त ] के पास शोभन अभिप्रायसे साधुभावसे गया । और जहाँ इसके विपरीत बन्धन आदि असाधु-कार्य देखते हैं वहाँ वे ऐसा ही कहते हैं कि वह इसके पास असाम—असाधुरूपसे गया ॥२॥ |

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