छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५१
तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥
इसी विषयमें कहते हैं—[ जब कहा जाय कि अमुक पुरुष ] इस [ राजा आदि ] के पास सामद्वारा गया तो [ ऐसा कहकर ] लोग यही कहते हैं कि वह इसके पास साधुभावसे गया और [ जब यों कहा जाय कि ] वह इसके पास असामद्वारा गया तो [ इससे ] लोग यही कहते हैं कि वह इसके यहाँ असाधुभावसे प्राप्त हुआ ॥ २ ॥
| तत्तत्रैव साध्वसाधुविवेककरण उताप्याहुः । साम्नैनं राजानं सामन्तं चोपागादुपगतवान् । कोऽसौ ? यतोऽसाधुत्वप्राप्त्याशङ्का स इत्यभिप्रायः । शोभनाभिप्रायेण साधुनैनमुपागादित्येव तत्तत्राहुर्लौकिका बन्धनाद्यसाधुकार्यमपश्यन्तः । यत्र पुनर्विपर्ययो बन्धनाद्यसाधुकार्यं पश्यन्ति तत्रासाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥ | वहाँ—उस साधु-असाधुका विवेक करनेमें ही कहते हैं कि [ जब यह कहा जाता है कि ] इस राजा अथवा सामन्तके पास सामरूपसे गया—कौन गया ? जिससे कि असाधुत्वकी प्राप्तिकी आशङ्का थी वह—ऐसा इसका तात्पर्य है—तो उसके बन्धन आदि असाधु कार्योंके न देखनेवाले लौकिक पुरुष यही कहते हैं कि वह उस [ राजा या सामन्त ] के पास शोभन अभिप्रायसे साधुभावसे गया । और जहाँ इसके विपरीत बन्धन आदि असाधु-कार्य देखते हैं वहाँ वे ऐसा ही कहते हैं कि वह इसके पास असाम—असाधुरूपसे गया ॥२॥ |
— : ० : —
१५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥ ३ ॥
इसके अनन्तर ऐसा भी कहते हैं कि 'हमारा साम (शुभ हुआ)। अर्थात् जब शुभ होता है तो 'अहा ! बड़ा अच्छा हुआ' ऐसा कहते हैं; और ऐसा भी कहते हैं—'हमारा असाम हुआ' अर्थात् जब अशुभ होता है तो 'ओह ! बुरा हुआ !' ऐसा कहते हैं ॥ ३ ॥
| अथोताप्याहुः स्वसंवेद्यं साम नोऽस्माकं बतेत्यनुकम्पयन्तः संवृत्तमित्याहुः । एतच्चैरुक्तं भवति यत् साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुः । विपर्यये जातेऽसाम नो बतेति । यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः । तस्मात्सामसाधुशब्दयोरेकार्थत्वं सिद्धम् ॥ ३ ॥ | इसके अनन्तर ऐसा भी कहते हैं कि 'अहा ! वह स्वयं ही अनुभव करने योग्य साम हमें प्राप्त हो गया है।' 'बत' इस निपातका आशय यह है कि वे अनुकम्पा करते हुए कहते हैं। अर्थात् उनके द्वारा यह प्रतिपादित होता है कि जो साधु होता है वही 'अहा ! यह साधु है' ऐसा कहा जाता है तथा विपरीत होनेपर 'ओह ! हमारे लिये यह असाम है' ऐसा कहते हैं। जो असाधु होता है वही 'ओह ! यह असाधु (बुरा) है' ऐसा कहा जाता है। इससे साम और साधु शब्दोंकी एकार्थता सिद्ध होती है ॥ ३ ॥ |
—: ० :—
स य एतदेवं विद्वान्साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनग्ँसाधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥४॥
इसे ऐसे जाननेवाला जो पुरुष 'साम साधु है' इस प्रकार उपासना करता है उसके पास, जो साधु धर्म हैं वे शीघ्र ही आ जाते हैं और उसके प्रति विनम्र हो जाते हैं ॥ ४ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५३
| अतः स यः कश्चित्साधु सामेति साधुगुणवत्सामेत्युपास्ते समस्तं साम साधुगुणवद्विद्वांस्तस्यैतत्फलम् अभ्याशो ह क्षिप्रं ह, यदिति क्रियाविशेषणार्थम्, एनमुपासकं साधवः शोभना धर्माः श्रुतिस्मृत्यविरुद्धा आ च गच्छेयुरागच्छेयुश्च । न केवलमागच्छेयुरुप च नमेयुरुपनमेयुश्च भोग्यत्वेनोपतिष्ठेरित्यर्थः ॥ ४ ॥ | अतः वह जो कोई पुरुष साम साधु है यानी साम साधुगुणविशिष्ट है-ऐसी उपासना करता है अर्थात् समस्त सामको साधु गुणवाला जानता है उसे यह फल मिलता है, इस उपासकको जो श्रुति-स्मृतिसे अविरुद्ध शुभ धर्म हैं, वे अभ्यास अर्थात् शीघ्र ही प्राप्त हो जाते हैं। यहाँ जो 'यत्' पद है वह क्रियाविशेषणके लिये है। केवल प्राप्त ही नहीं होते उसके प्रति विनम्र भी हो जाते हैं, अर्थात् भोग्यरूपसे उपस्थित हो जाते हैं।४। |
इति च्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
लोकविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना
| कानि पुनस्तानि साधुदृष्टिविशिष्टानि समस्तानि सामान्युपास्यानि ? इति, इमानि तान्युच्यन्ते लोकेषु पञ्चविधमित्यादीनि । | फिर वे साधुदृष्टिविशिष्ट उपासना करने योग्य समस्त साम कौन-से हैं? ऐसी आशङ्का होनेपर कहते हैं--वे 'लोकेषु पञ्चविधम्' इत्यादि मन्त्रोंद्वारा इस प्रकार बतलाये जाते हैं- |
लोकेषु पञ्चविधँसामोपासीत पृथिवी हिंकारः । अग्निः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथ आदित्यः प्रतिहारो द्यौर्निधनमित्यूर्ध्वेषु ॥ १ ॥
ऊपरके लोकोंमें निम्नाङ्कितरूपसे पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिये । पृथिवी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, आदित्य प्रतिहार है और द्युलोक निधन है ॥ १ ॥
| [साम्नि द्विधा दृष्टौ विरोधोद्भावनम्]<br><br>ननु लोकादिदृष्ट्या तान्युपास्यानि साधुदृष्ट्या चेति विरुद्धम् । | **शंका—**किंतु उन समस्त सामोंकी लोकादिदृष्टिसे तथा साधुदृष्टिसे भी उपासना करनी चाहिये—ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है ? | | [विरोधपरिहारः]<br><br>न, साध्वर्थस्य लोकादिकार्येषु कारणस्यानुगतत्वात्, मृदादिवद्घटादिविकार्येषु । साधुशब्दवाच्योऽर्थो धर्मो ब्रह्म वा सर्वथापि लोकादिकार्येष्वनुगतम् । अतो | **समाधान—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार मृत्तिका आदि अपने विकार घटादिमें अनुगत होते हैं उसी प्रकार [ सबका ] कारणभूत साधु पदार्थ लोकादि कार्यवर्गमें अनुगत है। साधुशब्दका वाच्यार्थ धर्म अथवा ब्रह्म सभी प्रकारसे लोकादि कार्यवर्गमें व्याप्त है । अतः जिस |
| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १५५ |
|---|
| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी (भाष्यार्थ) |
|---|---|
| यथा यत्र घटादिदृष्टिर्मृदादिदृष्ट्यनुगतैव सा, तथा साधुदृष्ट्यनुगतैव लोकादिदृष्टिः, धर्मादिकार्यत्वाल्लोकादीनाम् । यद्यपि कारणत्वमविशिष्टं ब्रह्मधर्मयोः, तथापि धर्म एव साधुशब्दवाच्य इति युक्तम्, साधुकारी साधुर्भवतीति धर्मविषये साधु शब्दप्रयोगात् । | प्रकार जहाँ घटादिदृष्टि होती है वहाँ वह मृत्तिकादिदृष्टिसे अनुगत ही होती है, उसी प्रकार लोकादिदृष्टि भी साधुदृष्टिसे अनुगत ही होती है; क्योंकि ये लोकादि धर्मादिके कार्य ही होते हैं । यद्यपि ब्रह्म और धर्मका प्रपञ्चकारणत्व तो समान है तो भी 'साधु' शब्दका वाच्य धर्म ही है—ऐसा मानना ठीक है; क्योंकि 'साधु करनेवाला साधु होता है' इस प्रकार--धर्मके विषयमें ही 'साधु' शब्दका प्रयोग किया गया है । |
| (लोकादिदृष्ट्यनुशासनवैयर्थ्या-शङ्का)<br>ननु लोकादिकार्येषु कारणस्यानुगतत्वादर्थप्राप्तैव तद्दृष्टिरिति 'साधु सामेत्युपास्ते' इति न वक्तव्यम् । | शंका--लोकादि कार्योंमें उनका कारण अनुगत होनेके कारण उसमें साधुदृष्टि होना तो स्वतः सिद्ध है । ऐसी अवस्थामें 'साम साधु है इस प्रकार उपासना करता है' यह नहीं कहना चाहिये था । |
| (तन्निरसनम्)<br>न, शास्त्रगम्यत्वात्तद् दृष्टेः । सर्वत्र हि शास्त्रार्पिता एव धर्मा उपास्या न विद्यमाना अप्यशास्त्रीयाः । | समाधान--नहीं, क्योंकि वह दृष्टि शास्त्रसे ही प्राप्त हो सकती है । सभी जगह शास्त्रविहित धर्म ही उपासनीय होते हैं, अशास्त्रीय धर्म विद्यमान रहनेपर भी उपासनीय नहीं होते । |
| लोकेषु पृथिव्यादिषु पञ्चविधं पञ्चभक्तिभेदेन पञ्चप्रकारं साधु समस्तं सामोपासीत । कथम् ? पृथिवी हिंकारः । लोकेष्विति या सप्तमी तां प्रथ- | पृथिवी आदि लोकोंमें पञ्चविध--पाँच प्रकारकी भक्तिके भेदसे पाँच प्रकारके साधुगुणविशिष्ट समस्त सामकी उपासना करनी चाहिये । सो किस प्रकार ? [यह बतलाते हैं-] पृथिवी हिंकार है। 'लोकेषु' इस पदमें जो सप्तमी विभक्ति है उसे प्रथमा |
१५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
| मात्वेन विपरिणमय्य पृथिवीदृष्ट्या हिंकारे पृथिवी हिंकार इत्युपासीत । व्यत्यस्य वा सप्तमीश्रुतिं लोकविषयां हिंकारादिषु पृथिव्यादिदृष्टिं कृत्वोपासीत । | विभक्तिके रूपसे* परिणत कर हिंकारमें पृथिवी-दृष्टिद्वारा अर्थात् 'पृथिवी हिंकार है' इस प्रकार उपासना करे । अथवा 'लोकेषु' इस पदकी सप्तमी-श्रुतिको हिंकारादिमें करके और वहाँकी कर्मविभक्ति लोक शब्दमें कर हिंकारादिमें पृथिवी आदि दृष्टि करके उपासना करे ।‡ |
| तत्र पृथिवी हिंकारः, प्राथम्यसामान्यात् । अग्निः प्रस्तावः, अग्नौ हि कर्माणि प्रस्तूयन्ते; प्रस्तावश्च भक्तिः । अन्तरिक्षमुद्गीथः, अन्तरिक्षं हि गगनम्, गकारविशिष्टश्चोद्गीथः । आदित्यः प्रतिहारः, प्रतिप्राण्यभिमुखत्वान्मां प्रति मां प्रतीति । द्यौर्निधनम्, दिवि निधीयन्ते हीतो | उनमें पृथिवी हिंकार है, क्योंकि उन दोनोंमें 'प्रथमता' यह समान गुण है । अग्नि प्रस्ताव है, क्योंकि अग्निमें ही कर्मोंका प्रस्ताव किया जाता है और प्रस्ताव भी एक प्रकारकी सामभक्ति है । अन्तरिक्ष उद्गीथ है। अन्तरिक्ष गगन ( आकाश ) को कहते हैं और उद्गीथ भी गकारविशिष्ट है [इसलिये उन दोनोंमें सादृश्य है]। आदित्य प्रतिहार है, क्योंकि वह प्रत्येक प्राणीके अभिमुख है। सब लोग यह अनुभव करते हैं कि वह 'मां प्रति, मां प्रति-मेरे सम्मुख है, मेरे सम्मुख है।' तथा द्यौ निधन है, क्योंकि यहाँसे [मरकर] |
* प्रथमान्तरूपसे परिणत करनेपर वाक्यका स्वरूप यों होगा—'लोकाः पञ्चविधं सामेत्युपासीत।' भाव यह कि 'पृथिवी आदि लोक पाँच प्रकारके साम हैं' इस प्रकार उपासना करे । इसीलिये आगे 'पृथिवी हिङ्कारः' इत्यादिमें पृथिवी आदि शब्दोंमें सप्तमी विभक्तिका प्रयोग न करके प्रथमाका ही प्रयोग हुआ है ।
‡ अर्थात् 'लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत' इस वाक्यके अन्तर्गत 'लोकेषु' इस पदमें जो सप्तमी विभक्ति है उसे पञ्चविध साम एवं उसके द्वारा प्रतिपाद्य हिंकार आदिमें ले जाय और 'पञ्चविधं साम' में जो द्वितीया विभक्ति है उसे लोकपदमें ले जाय, इस दशामें वाक्यका स्वरूप ऐसा होगा--पञ्चविधं साम्नि लोकम् (लोकदृष्टिं कृत्वा ) उपासीत' । इसीका फलितार्थ बतलाते हुए भाष्यकार लिखते हैं—'हिंकारादिषु पृथिव्यादिदृष्टिं कृत्वोपासीत' ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थे १५७
| गता इत्यूर्ध्वेषूर्ध्वगतेषु लोक-<br><br>दृष्ट्या सामोपासनम् ॥ १ ॥ | जानेवाले लोग द्युलोकमें रक्खे जाते<br>हैं। इस प्रकार उत्तरोत्तर ऊर्ध्वगत-<br>ऊपरके लोकोंमें लोकदृष्टिसे की जाने-<br>वाली उपासना बतलायी गयी ॥ १ ॥ |
आवृत्तिकालिक अधोमुख लोकोंमें पञ्चविध सामोपासना
अथावृत्तेषु द्यौर्हिंकार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्ष-<br>मुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम् ॥ २ ॥
अब अधोमुख लोकोंमें सामोपासनाका निरूपण किया जाता है—द्युलोक हिंकार है, आदित्य प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, अग्नि प्रतिहार है और पृथिवी निधन है ॥ २ ॥
| अथावृत्तेष्ववाङ्मुखेषु पञ्च-<br><br>विधमुच्यते सामोपासनम् ।<br><br>गत्यागतिविशिष्टा हि लोकाः ।<br><br>यथा ते, तन्नादृष्ट्यैव सामोपासनं<br><br>विधीयते यतः, अत आवृत्तेषु<br><br>लोकेषु द्यौर्हिंकारः प्राथम्यात् ।<br><br>आदित्यः प्रस्तावः, उदिते ह्यादित्ये<br><br>प्रस्तूयन्ते कर्माणि प्राणिनाम् ।<br><br>अन्तरिक्षमुद्गीथः पूर्ववत् । अग्निः<br><br>प्रतिहारः, प्राणिभिः प्रतिहरणा- | अब आवृत्त अर्थात् पुनरावृत्तिके<br>समय अधोमुख लोकोंमें पाँच प्रकारकी<br>सामोपासनाका निरूपण किया जाता<br>है, क्योंकि ये लोक गमन और आग-<br>मन [दोनों प्रकारकी वृत्तियों] से<br>युक्त हैं। गमन और आगमन-कालमें<br>जिस प्रकार वे स्थित हैं उसी दृष्टिसे<br>उनमें सामोपासनाका विधान किया<br>जाता है, इसलिये आगमनकालमें<br>उन अधोमुख लोकोंमें प्रथम होनेके<br>कारण द्युलोक हिंकार है, आदित्य<br>प्रस्ताव है, क्योंकि सूर्यके उदित होने-<br>पर ही प्राणियोंके कर्म प्रस्तुत होते हैं;<br>तथा पहलेहीके समान अन्तरिक्ष उद्-<br>गीथ है; अग्नि प्रतिहार है, क्योंकि<br>प्राणियोंद्वारा उसका प्रतिहरण (एक |
१५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
| दग्नेः । पृथिवी निधनम्, तत आगतानामिह निधनात् ॥२॥ | स्थानसे दूसरे स्थानपर ले जाना) होता है और पृथिवी निधन है, क्योंकि वहाँसे आये हुए प्राणियोंको इसीमें रक्खा जाता है ॥ २ ॥ |
| उपासनफलम्— | उपासनाका फल— |
|---|
कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वाँल्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ३ ॥
जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष लोकोंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है उसके प्रति ऊर्ध्व और अधोमुख लोक भोग्यरूपसे उपस्थित होते हैं ॥ ३ ॥
| कल्पन्ते समर्था भवन्ति हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च गत्यागतिविशिष्टा भोग्यत्वेन व्यतिष्ठन्त इत्यर्थः । य एतदेवं विद्वाँल्लोकेषु पञ्चविधं समस्तं साधु सामेत्युपास्ते; इति सर्वत्र योजना पञ्चविधे सप्तविधे च ॥ ३ ॥ | कल्प—समर्थ होते हैं (भोग्यरूप-से प्राप्त होते हैं) अर्थात् उसके प्रति गमनागमन कालकी स्थितिसे युक्त ऊर्ध्व एवं अधोमुख लोक भोग्यरूपसे उपस्थित होते हैं। [किसके प्रति ?] जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष 'लोकोंमें पाँच प्रकारका समस्त साम साधु गुणविशिष्ट है' इस प्रकार उपासना करता है। इसी प्रकार पञ्चविध और सप्तविध सामकी उपासनामें भी सर्वत्र इस वाक्यकी योजना करनी चाहिये ॥ ३ ॥ |
— : ० : —
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २ ॥
— : ० : —
तृतीय खण्ड
वृष्टिविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना
वृष्टौ पञ्चविधँसामोपासीतपुरोवातो हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयतिं स प्रतिहारः ॥ १ ॥
वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे। पूर्वीय वायु हिंकार है मेघ जो उत्पन्न होता है—वह प्रस्ताव है, जो बरसता है वह उद्गीथ है, जो चमकता और गर्जना करता है वह प्रतिहार है ॥ १ ॥
| भाष्यम् | भाषार्थ |
|---|---|
| वृष्टौ पञ्चविधं सामोपासीत;<br><br>लोकस्थितेर्वृष्टिनिमित्तत्वादानन्तर्यम् । पुरोवातो हिंकारः, पुरोवाताद्युद्ग्रहणान्ता हि वृष्टिः, यथा साम हिंकारादिनिधनान्तम्, अतः पुरोवातो हिंकारः प्राथम्यात् । मेघो जायते स प्रस्तावः, प्रावृषि मेघजनने वृष्टेः प्रस्ताव इति हि प्रसिद्धिः । वर्षति स उद्गीथः श्रेष्ठ्यात् । विद्योतते | वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । लोकोंकी स्थिति वृष्टिके कारण होनेसे इसका लोक-सम्बन्धिनी उपासनाके अनन्तर निरूपण किया गया है । पूर्वीय वायु हिंकार है । पूर्वीय वायुसे लेकर जलग्रहणपर्यन्त वृष्टि कही जाती है, जिस प्रकार कि हिंकारसे लेकर निधनपर्यन्त साम कहा जाता है । अतः प्रथम होनेके कारण पूर्वीय वायु हिंकार है । मेघ जो उत्पन्न होता है वह प्रस्ताव है, वर्षा ऋतुमें मेघके उत्पन्न होनेपर ही वृष्टि प्रस्तुत होती है—यह प्रसिद्ध ही है। मेघ जो बरसता है वही श्रेष्ठताके कारण उद्गीथ है; तथा जो बिजली चमकती और |
१६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
| स्तनयति स प्रतिहारः, प्रतिहृतत्वात् ॥ १ ॥ | कड़कती है—वही प्रतिहत होने (इधर-उधर फैलने) के कारण प्रतिहार है ॥ १ ॥ |
उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान्वृष्टौ पञ्चविधँसामोपास्ते ॥ २ ॥
मेघ जो जल ग्रहण करता है—यह निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है उसके लिये वर्षा होती है और वह [ स्वयं भी ] वर्षा करा लेता है ॥ २ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उद्गृह्णाति तन्निधनम्, समाप्तिसामान्यात् । फलमुपासनस्य–वर्षति हास्मै। इच्छाताः। तथा वर्षयति हासत्यामपि वृष्टौ य एतदित्यादि पूर्ववत् ॥२॥ | [ बादल ] जो जल ग्रहण करता है यह निधन है, क्योंकि समाप्तिमें इन दोनोंकी समानता है [ अर्थात् जलग्रहण और निधन दोनों अन्तिम कार्य हैं ] । अब इस उपासनाका फल बतलाते हैं—उसके इच्छानुसार मेघ वर्षा करता है, तथा वृष्टिके न होनेपर भी वह वर्षा करा लेता है। 'य एतदेवम्' इत्यादि शेष वाक्यका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये॥२॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥
चतुर्थ खण्ड
— : ० : —
जलविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना
सर्वास्वप्सु पञ्चविधꣳसामोपासीत मेघो यत्संप्लवते स हिंकारो यद्वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥ १ ॥
सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकारके सामको उपासना करे। मेघ जो घनीभावको प्राप्त होता है—वह हिंकार है, वह जो बरसता है—वह प्रस्ताव है, [ नदियाँ ] जो पूर्वकी ओर बहती हैं, वह उद्गीथ है तथा जो पश्चिमकी ओर बहती हैं वह प्रतिहार है और समुद्र निधन है ॥ १ ॥
| भाष्यम् | भाषानुवाद |
|---|---|
| सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामो-<br><br>पासीत । वृष्टिपूर्वकत्वात्सर्वासा-<br><br>मपामानन्तर्यम् । मेघो यत्संप्ल-<br><br>वत एकीभावेनेतरेतरं घनीभवति<br><br>मेघो यदा उन्नतस्तदा संप्लवत<br><br>इत्युच्यते । तदापामारम्भः<br><br>स हिंकारः। यद्वर्षति स प्रस्तावः, | सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकार-<br>के सामकी उपासना करे । सम्पूर्ण<br>जल वृष्टिपूर्वक ही होते हैं इस-<br>लिये वृष्टिविषयक उपासनाके बाद<br>जलविषयक उपासनाका निरूपण<br>किया गया है । मेघ जो संप्लवन<br>करता है अर्थात् परस्पर एक होकर<br>घनीभूत होता है [ ‘संप्लवते’ का<br>‘घनीभूत होता है’ अर्थ इसलिये<br>किया गया है कि ] जब मेघ ऊँचा<br>होता है उस समय वह संप्लवन<br>करता है—ऐसा कहा जाता है ।<br>उस घनीभूत होनेके ही समय<br>जलोंका प्रारम्भ होता है; अतः<br>संप्लवन ही हिंकार है । वह जो |
१६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २
| १६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २ |
|---|
| आपः सर्वतो व्याप्तुं प्रस्तुताः । <br><br> याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथः, <br><br> श्रैष्ठ्यात् । याः प्रतीच्यः स <br><br> प्रतिहारः प्रतिशब्दसामान्यात् । <br><br> समुद्रो निधनम्, तन्निधनत्वा- <br> दपाम् ॥ १ ॥ | बरसता है उसीको प्रस्ताव कहा जाता है, क्योंकि उसी समय जल-का सर्वत्र प्रसार आरम्भ होता है। जो जल [गङ्गादि नदियोंके रूपमें] पूर्वकी ओर बहते हैं वे उत्कृष्ट होनेके कारण उद्गीथ और जो प्रतीची (पश्चिम) की ओर बहते हैं वे 'प्रति' शब्दमें समान होनेके कारण प्रतिहार कहे जाते हैं तथा समुद्र निधन है, क्योंकि उसीमें जलोंका संचय होता है ॥ १ ॥ |
—: ० :—
न हाप्सु प्रेत्यप्सुमान्भवति य एतदेवं विद्वान्सर्वा- स्वप्सु पञ्चविधꣳसामोपास्ते ॥ २ ॥
जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष सब प्रकारके जलोंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है वह जलमें नहीं मरता और जलसे सम्पन्न होता है ॥ २ ॥
| न हाप्सु प्रैति, नेच्छति चेत् । अप्सुमान्म्मान्भवति फलम् ॥ २ ॥ | यदि वह इच्छा न करे तो जलमें मृत्युको प्राप्त नहीं होता तथा वह अप्सुमान् अर्थात् [इच्छानुकूल] जलसे सम्पन्न होता है—यह इस (उपासना) का फल है ॥ २ ॥ |
—: ० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥
—: ० :—
पञ्चम खण्ड
ऋतुविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना
ऋतुषु पञ्चविधँसामोपासीत वसन्तो हिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनम् ॥ १ ॥
ऋतुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरत् प्रतिहार है और हेमन्त निधन है ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| ऋतुषु पञ्चविधं सामोपासीत ।<br><br>ऋतुव्यवस्थाया यथोक्ताम्बुनिमित्तत्वादानन्तर्यम् । वसन्तो हिंकारः, प्राथम्यात् । ग्रीष्मः प्रस्तावः, यवादिसंग्रहः प्रस्तूयते हि प्रावृडर्थम् । वर्षा उद्गीथः, प्राधान्यात् । शरत्प्रतिहारः, रोगिणां मृतानां च प्रतिहरणात् । हेमन्तो निधनम्, निवाते निधनात्प्राणिनाम् ॥ १ ॥ | ऋतुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । ऋतुओंकी व्यवस्था पूर्वोक्त जलरूप निमित्तसे ही होती है, इस कारण यह ऋतुविषयक सामोपासना उसके बाद कही गयी है [ उनमें ] सबसे पहला होनेके कारण वसन्त हिंकार है । ग्रीष्म प्रस्ताव है, क्योंकि [ इसी समय ] वर्षाऋतुके लिये जौ आदि अन्नोंके संग्रहका प्रस्ताव किया जाता है । प्रधानताके कारण वर्षा उद्गीथ है । रोगी और मृत प्राणियोंका प्रतिहरण करनेके कारण शरद्ऋतु प्रतिहार (एक-जगहसे दूसरे स्थानपर ले जाना ) है तथा वायुके अभावमें प्राणियोंका निधन होनेके कारण हेमन्तऋतु निधन है ॥ १ ॥ |
छा० उ० ६—
१६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
| फलम्— | इस उपासनाका फल— |
|---|
कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान्भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधँसामोपास्ते ॥ २ ॥
जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ऋतुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है उसे ऋतुएँ अपने अनुरूप भोग देती हैं और वह ऋतुमान् ( ऋतुसम्बन्धी भोगोंसे सम्पन्न ) होता है ॥ २ ॥
| कल्पन्ते ह ऋतुव्यवस्थानुरूपं भोग्यत्वेनास्मा उपासकायर्तवः। ऋतुमानार्तवैर्भोगैश्च संपन्नो भवतीत्यर्थः ॥ २ ॥ | इस उपासनाके लिये ऋतुएँ अपने कालकी व्यवस्थाके अनुरूप फल भोग्य-रूपसे उपस्थित करनेमें समर्थ होती हैं और वह ऋतुमान् होता है, अर्थात् ऋतु-सम्बन्धी भोगोंसे सम्पन्न होता है ॥ २ ॥ |
|---|
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥
षष्ठ खण्ड
—: ० :—
पशुविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना
पशुषु पञ्चविधँसामोपासीताजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनम् ॥ १ ॥
पशुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे। बकरे हिंकार हैं, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, अश्व प्रतिहार हैं और पुरुष निधन है ॥ १ ॥
| पशुषु पञ्चविधं सामोपासीत । सम्यग्वृत्तेष्वृतुषु पशव्यः काल इत्यानन्तर्यम् । अजा हिंकारः, प्राधान्यात्प्राथम्याद्वा, "अजः पशूनां प्रथमः" इति श्रुतेः । अवयः प्रस्तावः, साहचर्यदर्शनादजावीनाम्, गाव उद्गीथः, श्रैष्ठ्यात् । अश्वाः प्रतिहारः, प्रतिहरणात्पुरुषाणाम् । पुरुषो निधनम्, पुरुषाश्रयत्वात्पशूनाम् ॥ १ ॥ | पशुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे। ऋतुओंके ठीक-ठीक बरतनेसे पशुओंके लिये अनुकूल समय रहता है इसलिये यह उपासना उसके पीछे कही गयी है। सबमें प्रधान होनेके कारण अथवा "पशुओंमें सर्वप्रथम बकरा है" इस श्रुतिके अनुसार सबसे पहले होनेके कारण बकरे हिंकार हैं। बकरे और भेड़ोंका साहचर्य देखा जानेसे भेड़ें प्रस्ताव हैं। सर्वश्रेष्ठ होनेके कारण गौएँ उद्गीथ हैं। पुरुषोंका प्रतिहरण (वहन) करनेके कारण घोड़े प्रतिहार हैं तथा पशुवर्ग पुरुषके आश्रित हैं, अतः पुरुष निधन है ॥ १ ॥ |
|---|
—: ० :—
१६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २
| १६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २ |
|---|
| फलम्— | इस उपासनाका फल— |
|---|
भवन्ति हास्य पशवः पशुमान्भवति य एतदेवं विद्वान्पशुषु पञ्चविधꣳसामोपास्ते ॥ २ ॥
जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष पशुओंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है उसे पशु प्राप्त होते हैं और वह पशुधनसे सम्पन्न होता है ॥२॥
| भवन्ति हास्य पशवः, पशुमान्भवति पशुफलैश्च भोग-त्यागादिभिर्युज्यत इत्यर्थः॥२॥ | उसे पशु प्राप्त होते हैं और वह पशुमान् होता है अर्थात् वह पशुओंसे प्राप्त होनेवाले फल-भोग एवं दानादिसे युक्त होता है ॥ २ ॥ |
|---|
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
सप्तम खण्ड
—: ० :—
प्राणविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना
प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयाꣳसि वा एतानि ॥ १ ॥
प्राणोंमें पाँच प्रकारके परोवरीय (उत्तरोत्तर उत्कृष्ट) गुणविशिष्ट सामकी उपासना करे। [उनमें] प्राण हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है और मन निधन है। ये उपासनाएँ निश्चय ही परोवरीय (उत्तरोत्तर श्रेष्ठ) हैं ॥ १ ॥
| प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत । परं परं वरीयस्त्वगुणवत्प्राणदृष्टिविशिष्टं सामोपासीतेत्यर्थः । प्राणो घ्राणं हिंकारः, उत्तरोत्तरवरीयसां प्राथम्यात् । वाक्प्रस्तावः, वाचा हि प्रस्तूयते सर्वम्, वाग्वरीयसी घ्राणात्, अप्राप्तमप्युच्यते वाचा, प्राप्तस्यैव तु गन्धस्य ग्राहकः प्राणः । | प्राणोंमें पाँच प्रकारके परोवरीय सामकी उपासना करे अर्थात् उत्तरोत्तर श्रेष्ठत्वगुणवान् प्राणदृष्टियुक्त सामकी उपासना करे। उन उत्तरोत्तर श्रेष्ठ प्राणोंमें प्रथम होनेके कारण प्राण—घ्राणेन्द्रिय हिंकार है। वाणी प्रस्ताव है, क्योंकि वाणीसे ही सबका प्रस्ताव किया जाता है। वाणी प्राणकी अपेक्षा उत्कृष्ट है, [क्योंकि] वाणीसे अप्राप्त वस्तुका भी निरूपण किया जाता है और प्राण केवल प्राप्त हुए गन्धका ही ग्रहण करनेवाला है। |
| १६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
| १६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
| चक्षुरुद्गीथः, वाचो बहुतरविषयं प्रकाशयति चक्षुरतो वरीयो वाचः, उद्गीथः श्रेष्ठ्यात् । श्रोत्रं प्रतिहारः, प्रतिहृतत्वात्, वरीयश्चक्षुषः सर्वतः श्रवणात् । मनो निधनम्, मनसि हि निधीयन्ते पुरुषस्य भोग्यत्वेन सर्वेन्द्रियाहृता विषयाः, वरीयस्त्वं च श्रोत्रान्मनसः, सर्वेन्द्रियविषयव्यापकत्वात्, अतोन्द्रियविषयोऽपि मनसो गोचर एवेति । यथोक्तहेतुभ्यः परोवरीयांसि प्राणादीनि वा एतानि ॥ १ ॥ | चक्षु उद्गीथ है; चक्षु वाणीसे भी अधिक विषयको प्रकाशित करता है; अतः वह वाणीसे उत्कृष्ट है और उत्कृष्ट होनेके कारण ही उद्गीथ है । श्रोत्र प्रतिहार है, क्योंकि वह प्रतिहत है तथा सब ओरसे श्रवण करनेके कारण वह नेत्रकी अपेक्षा उत्कृष्ट भी है। मन निधन है क्योंकि भोग्यरूपसे पुरुषकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा लाये हुए विषय मनमें ही रखे जाते हैं, तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंमें व्यापक होनेके कारण श्रोत्रकी अपेक्षा मनकी उत्कृष्टता भी है । तात्पर्य यह है कि जो पदार्थ अन्य इन्द्रियोंकी पहुँचसे परे है वह भी मनका विषय तो है ही । उपर्युक्त हेतुओंसे ये प्राणादि उत्तरोत्तर उत्कृष्ट हैं ॥ १ ॥ |
परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान् प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ २ ॥
जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष प्राणोंमें पाँच प्रकारके उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर सामकी उपासना करता है उसका जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जाता है और वह उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर लोकोंको जीत लेता है । यह पाँच प्रकारकी सामोपासनाका निरूपण किया गया ॥ २ ॥
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६९
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एतद्दृष्ट्या विशिष्टं यः परोवरीयः सामोपास्ते परोवरीयो हास्य जीवनं भवतीत्युक्तार्थम् । इति तु पञ्चविधस्य साम्न उपासनमुक्तमिति सप्तविधे वक्ष्यमाणविषये बुद्धिसमाधानार्थम् । निरपेक्षो हि पञ्चविधे वक्ष्यमाणे बुद्धिं समाधित्सति ॥ २ ॥ | जो पुरुष इस प्राणदृष्टिसे युक्त उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर सामकी उपासना करता है उसका जीवन निश्चय ही उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जाता है—यह अर्थ पहले (१ । ९ । २ में) कहा जा चुका है । इस प्रकार यह पाँच प्रकारके सामकी उपासना तो कह दी गयी; यह बात श्रुतिने आगे कही जानेवाली सप्तविध सामोपासनामें बुद्धिको समाहित करनेके लिये कही है, क्योंकि पञ्चविध सामोपासनामें निरपेक्ष हुआ पुरुष ही आगे कही जानेवाली उपासनामें बुद्धिको समाहित करना चाहेगा ॥ २ ॥ |
— : ० : —
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥
अष्टम खण्ड
— : ✤ : —
वाणीविषयक सप्तविध सामोपासना
अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधँ सामोपासीत यत्किं च वाचो हुमिति स हिंकारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिः ॥ १ ॥
अब सप्तविध सामकी उपासनाका प्रकरण [ आरम्भ किया जाता ] है—वाणीमें सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये । वाणीमें जो कुछ 'हुँ' ऐसा स्वरूप है वह हिंकार है, जो कुछ 'प्र' ऐसा स्वरूप है वह प्रस्ताव है और जो कुछ 'आ' ऐसा स्वरूप है वह आदि है ॥ १ ॥
| अथानन्तरं सप्तविधस्य समस्तस्य साम्न उपासनं साध्विद्मारभ्यते । वाचीति सप्तमी पूर्ववत् । वाग्दृष्टिविशिष्टं सप्तविधं सामोपासीतेत्यर्थः । यत्किञ्च वाचः शब्दस्य हुमिति यो विशेषः स हिंकारो हकारसामान्यात् । यत्प्रेति शब्दरूपं स प्रस्तावः प्रसामान्यात् । यत् आ | अब इसके पश्चात्—यह सप्तविध समस्त सामकी साधु उपासना आरम्भ की जाती है। श्रुतिमें 'वाचि' इस पदकी सप्तमी विभक्ति पूर्ववत् ('लोकेषु' आदि पदोंकी सप्तमीके समान ) समझनी चाहिये। इसका तात्पर्य यह है कि वाग्दृष्टिविशिष्ट सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये। जो कुछ वाणी अर्थात् शब्दका 'हूँ' ऐसा विशेषरूप है वह हिंकार है, क्योंकि 'हूँ' और हिंकारमें हकारकी समानता है जो कुछ 'प्र' ऐसा शब्दरूप है वह प्रस्ताव है, क्योंकि उन दोनोंमें 'प्र' शब्दका सादृश्य है । तथा जो कुछ |