छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
एकादश खण्ड
—: ० :—
राजा और उषस्तिका संवाद
अथ हैनँ यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच ॥ १ ॥
तब उससे यजमानने कहा—'मैं आप पूज्य-चरणको जानना चाहता हूँ।' इसपर उसने कहा—'मैं चक्रका पुत्र उषस्ति हूँ' ॥ १ ॥
| अथानन्तरं हैनमुषस्तिं यजमानो राजोवाच । भगवन्तं वै पूजावन्तमहं विविदिषाणि वेदितुमिच्छामीत्युक्त उषस्तिरस्मि चाक्रायणस्तवापि श्रोत्रपथमागतो यदीति होवाचोक्तवान् ॥ १ ॥ | तदनन्तर उस उषस्तिसे यजमान राजाने कहा—'मैं भगवान्को—पूजनीयको जानना चाहता हूँ।' ऐसा कहे जानेपर उसने कहा—'यदि तुमने सुना हो तो मैं चक्रका पुत्र उषस्ति हूँ' ॥ १ ॥ |
—: ❀ :—
स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरात्विज्यैः पर्यैषिषं भगवतो वा अहमवित्त्यान्यानवृषि ॥ २ ॥
मैंने इन समस्त ऋत्विक्कर्मोंके लिये श्रीमान्को खोजा था। श्रीमान्के न मिलनेसे ही मैंने दूसरे ऋत्विजोंका वरण किया था ॥ २ ॥
| स ह यजमान उवाच—सत्यमेवमहं भगवन्तं बहुगुणमश्रौषं सर्वैश्च ऋत्विक्कर्मभिरात्विज्यैः पर्यैषिषं पर्येषणं कृतवानस्मि । | उस यजमानने कहा—'यह ठीक ही है, मैंने श्रीमान्को बहुत गुणवान् सुना है। मैंने सम्पूर्ण ऋत्विक्कर्मोंके लिये आपकी खोज |
छा० उ० ५—
१३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| अन्विष्य भगवतो वा अहम-<br>वित्त्यालाभेनान्यानिमानवृषि-<br>तवानस्मि ॥ २ ॥ | की थी । ढूँढ़नेपर श्रीमान्के न<br>मिलनेसे ही मैंने इन दूसरे ऋत्विजों-<br>का वरण किया था ॥ २ ॥ |
<div align="center">—: ० :—</div>भगवांस्त्वेव मे सर्वैरात्विज्यैरिति तथेत्यथ तर्ह्येत एव समतिसृष्टाः स्तुवतां यावद्धेभ्यो धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ ३ ॥
मेरे समस्त ऋत्विक्कर्मोंके लिये श्रीमान् ही रहें—ऐसा सुनकर उषस्तिने 'ठीक है' ऐसा कहा—[ और बोला— ] 'अच्छा तो मेरे द्वारा प्रसन्नतासे आज्ञा दिये हुए ये ही लोग स्तुति करें; और तुम जितना धन इन्हें दो उतना ही मुझे देना।' तब यजमानने 'ऐसा ही होगा' यह कहा ॥ ३ ॥
| अद्यापि भगवांस्त्वेव मे मम सर्वैरात्विज्यैर्ऋत्विक्कर्मार्थमस्त्वित्युकस्तथेत्याहोषस्तिः । किं त्वथैवं तर्ह्येत एव त्वया पूर्वं वृता मया समतिसृष्टा मया सम्यक्प्रसन्नेनानुज्ञाताः सन्तः स्तुवताम् । त्वया त्वेतत्कार्यम् , यावद्धेभ्यः प्रस्तोत्रादिभ्यः सर्वेभ्यो धनं दद्याः प्रयच्छसि तावन्मम दद्याः । इत्युक्तस्तथेति ह यजमान उवाच ॥ ३ ॥ | 'अब भी श्रीमान् ही मेरे सम्पूर्ण ऋत्विक्कर्मोंके लिये रहें' ऐसा कहे जानेपर उषस्तिने कहा—'अच्छा, किंतु तुमने पहले जिनका वरण कर लिया है वे ही ऋत्विग्गण मेरे द्वारा समतिसृष्ट हो—प्रसन्नतासे आज्ञा प्राप्त कर स्तवन करें। तुम्हें तो यही करना होगा कि जितना धन तुम इन सम्पूर्ण प्रस्तोता आदिको दोगे उतना ही मुझे देना।' ऐसा कहे जानेपर यजमानने 'ऐसा ही होगा' यह कहा ॥ ३ ॥ |
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३३
उषस्तिके प्रति प्रस्तोताका प्रश्न
अथ हैनँ प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥४॥
तदनन्तर उस (उषस्ति) के पास [शिष्यभावसे] प्रस्तोता आया [और बोला—] 'भगवन्! आपने जो मुझसे कहा था कि हे प्रस्तोतः! जो देवता प्रस्तावमें अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा—सो वह देवता कौन है?' ॥४॥
| अथ हैनमौषस्त्यं वचः श्रुत्वा प्रस्तोतोपससादोषस्तिं विनयेनोपजगाम। प्रस्तोतर्या देवतेत्यादि मा मां भगवानवोचत्पूर्वम्; कतमा सा देवता? या प्रस्तावभक्तिमन्वायत्तेति ॥४॥ | तदनन्तर उषस्तिका यह वचन सुनकर प्रस्तोता उषस्तिके प्रति उपसन्न हुआ—विनीत भावसे उषस्तिके समीप आया [और बोला—] 'श्रीमान्ने जो पहले 'हे प्रस्तोतः! जो देवता प्रस्तावमें अनुगत है' इत्यादि वाक्य मुझसे कहा था सो वह देवता कौन है, जो कि प्रस्ताव-भक्तिमें अनुगत है?' ॥४॥ |
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उषस्तिका उत्तर---प्रस्तावानुगत देवता प्राण है
प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते। सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता। तां चेदविद्वान्प्रास्तोष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ ५ ॥
उस (उषस्ति) ने 'वह (देवता) प्राण है' ऐसा कहा 'क्योंकि ये सभी भूत प्राणमें ही प्रवेश कर जाते हैं और प्राणसे ही उत्पन्न होते
१३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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हैं। वह यह प्राण-देवता ही प्रस्तावमें अनुगत है, यदि तू उसे बिना जाने ही प्रस्तवन करता तो मेरेद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर तेरा मस्तक गिर जाता' ॥ ५ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| पृष्टः प्राण इति होवाच। युक्तं प्रस्तावस्य प्राणो देवतेति। कथम् ? सर्वाणि स्थावरजङ्गमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्रलयकाले प्राणमभि लक्षयित्वा प्राणात्मनैव, उज्जिहते प्राणादेवोद्गच्छन्तीत्यर्थ उत्पत्तिकाले। अतः सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता।<br><br>तां चेदविद्वांस्त्वं प्रास्तोष्यः प्रस्तवनं प्रस्तावभक्तिं कृतवानसि यदि मूर्धा शिरस्ते व्यपतिष्यद्विपतितमभविष्यत्तथोक्तस्य मया तत्काले मूर्धा ते विपतिष्यतीति। अतस्त्वया साधु कृतम्, मया निषिद्धः कर्मणो यदुपरममकार्षीरित्यभिप्रायः ॥ ५ ॥ | इस प्रकार पूछे जानेपर उसने 'वह देवता प्राण है' ऐसा कहा। प्राण प्रस्तावका देवता है—यह कथन ठीक ही है। किस प्रकार ? क्योंकि सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्राणी प्रलयकालमें प्राणहीमें प्रवेश करते हैं, अर्थात् प्राणकी ओर लक्ष्यकर प्राणरूपसे ही [ उसमें स्थित हो जाते हैं ] और उत्पत्तिकालमें उसीसे उद्गत होते हैं अर्थात् वे प्राणसे ही उत्पन्न होते हैं। अतः वह यह प्राणदेवता ही प्रस्तावमें अनुगत है।<br><br>तू यदि उसे बिना जाने ही प्रस्तवन-प्रस्तावभक्ति करता तो तेरा मूर्द्धा यानी मस्तक गिर जाता। अर्थात् उस समय मेरे इस प्रकार कहनेपर कि 'तेरा मस्तक गिर जायगा' तेरा मस्तक अवश्य गिर जाता। अतः अभिप्राय यह है कि तूने जो मेरे निषेध करनेपर कर्मसे उपरति की वह अच्छा ही किया है ॥ ५ ॥ |
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५
उद्गाताका प्रश्न
अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥ ६ ॥
तदनन्तर उसके समीप उद्गाता आया [ और बोला— ] 'भगवन् ! आपने मुझसे जो कहा था कि हे उद्गातः ! जो देवता उद्गीथमें अनुगत है यदि उसे बिना जाने ही तू उद्गान करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा—सो वह देवता कौन है ?' ॥ ६ ॥
| तथोद्गाता पप्रच्छ कतमा सोद्गीथभक्तिमनुगतान्वायत्ता देवता ? इति ॥ ६ ॥ | इसी प्रकार उससे उद्गाताने भी पूछा कि वह उद्गीथभक्तिमें अनुगत कौन देवता है ? ॥ ६ ॥ |
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उषस्तिका उत्तर-उद्गीथानुगत देवता आदित्य है
आदित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ ७ ॥
उषस्तिने 'वह ( देवता ) आदित्य है' ऐसा कहा, क्योंकि ये सभी भूत ऊँचे उठे आदित्यका ही गान करते हैं । वह यह आदित्य देवता ही उद्गीथमें अनुगत है । यदि तू उसे बिना जाने ही उद्गान करता तो मेरे द्वारा उस तरह कहे जानेपर तेरा मस्तक गिर जाता ॥ ७ ॥
| पृष्ट आदित्य इति होवाच । | इस प्रकार पूछे जानेपर उसने 'वह [ देवता ] आदित्य है' ऐसा | | सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्या- | कहा; क्योंकि ये सभी प्राणी ऊँचे |
१३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| दित्यमुच्चैरूर्ध्वं सन्तं गायन्ति शब्दयन्ति स्तुवन्तीत्यभिप्रायः, उच्च्छब्दसामान्यात्; प्रशब्दसामान्यादिव प्राणः । अतः सैषा देवतेत्यादि पूर्ववत् ॥ ७ ॥ | अर्थात् ऊपर विद्यमान आदित्यका ही गान—शब्द अर्थात् स्तवन करते हैं; प्रस्तावसे 'प्र' शब्दमें समानता होनेके कारण जैसे प्राण-प्रस्ताव-देवता था उसी प्रकार यहाँ [उद्गत आदित्य और उद्गीथकी ] 'उत्' शब्दमें समानता होनेसे यह उद्गीथ देवता है, अतः वह यह देवता आदि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ७ ॥ |
प्रतिहर्ताका प्रश्न
अथ हैनँ प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥८॥
फिर प्रतिहर्ता उसके पास आया [और बोला—] 'भगवन् ! आपने जो मुझसे कहा था कि हे प्रतिहर्तः ! जो देवता प्रतिहारमें अनुगत है यदि उसे बिना जाने ही तू प्रतिहरण करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा—सो वह देवता कौन है ?' ॥ ८ ॥
| एवमेवाथ हैनँ प्रतिहर्तोपससाद कतमा सा देवता प्रतिहारमन्वायत्तेति ? ॥ ८ ॥ | इसी प्रकार फिर उसके पास प्रतिहर्ता आया और बोला कि 'वह प्रतिहारमें अनुगत देवता कौन है ?' ॥ ८ ॥ |
उषस्तिका उत्तर—प्रतिहारानुगत देवता अन्न है
अन्नमिति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहार-
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्याथ १३७
मन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रत्यहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ९ ॥
इसपर उसने 'वह ( देवता ) अन्न है' ऐसा कहा; क्योंकि ये सम्पूर्ण भूत अपने प्रति अन्नका ही हरण करते हुए जीवित रहते हैं । वह यह अन्न देवता प्रतिहारमें अनुगत है । यदि तू उसे बिना जाने ही प्रतिहरण करता तो मेरेद्वारा उस तरह कहे जानेपर तेरा मस्तक गिर जाता ॥ ९ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाषार्थ |
|---|---|
| पृष्टोऽन्नमिति होवाच ।<br><br>सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेवात्मानं प्रति सर्वतः प्रतिहरमाणानि जीवन्ति । सैषा देवता प्रतिशब्दसामान्यात्प्रतिहारभक्तिमनुगता । समानमन्यत्तथोक्तस्य मयेति । प्रस्तावोद्गीथप्रतिहारभक्तीः प्राणादित्यान्नदृष्ट्योपासीतेति समुदायार्थः ।<br><br>प्राणाद्यापत्तिः कर्मसमृद्धिर्वा फलमिति ॥ ९ ॥ | इस प्रकार पूछे जानेपर उसने 'वह देवता अन्न है' ऐसा उत्तर दिया, क्योंकि ये सम्पूर्ण भूत सब ओरसे अपनी ओर अन्नका प्रतिहरण करते हुए ही जीवित रहते हैं । वह यह देवता ही 'प्रति' शब्दमें सादृश्य होनेके कारण प्रतिहार भक्तिमें अनुगत है । [ 'तां चेदविद्वान्' यहाँसे लेकर ] 'तथोक्तस्य मया' यहाँतक शेष अर्थ पहलेके समान है । समुदायार्थ ( 'प्राण इति होवाच' इत्यादि सब मन्त्रोंका सारांश ) यह है कि प्रस्ताव, उद्गीथ और प्रतिहार भक्तियोंकी क्रमशः प्राण, आदित्य और अन्नदृष्टिसे उपासना करनी चाहिये । प्राणादिरूपताकी प्राप्ति अथवा कर्ममें समृद्धिलाभ करना यह उस उपासनाका फल है ॥ ९ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥
—: ० :—
द्वादश खण्ड
शौवसामसम्बन्धी उपाख्यान
अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वव्राज ॥ १ ॥
तदनन्तर अब [अन्नलाभके लिये अपेक्षित] शौव उद्गीथका आरम्भ किया जाता है। वहाँ प्रसिद्ध है कि [पूर्वकालमें] दल्भका पुत्र बक अथवा मित्राका पुत्र ग्लाव स्वाध्यायके लिये [गाँवके बाहर] जलाशयके समीप गया ॥ १ ॥
| [शौवोद्गीथोपदेश-प्रयोजनम्] अतीते खण्डेऽन्नाप्राप्तिनिमित्ता कष्टावस्थोक्तोच्छिष्टपर्युषितभक्षणलक्षणा सा मा भूदित्यन्नाभाय अथानन्तरं शौवः श्वभिर्दृष्ट उद्गीथ उद्गानं सामातः प्रस्तूयते । <br><br> तत्तत्र ह किल बको नामतो दल्भस्यापत्यं दाल्भ्यो ग्लावो वा नामतो मित्रायाश्चापत्यं मैत्रेयः। वाशब्दश्चार्थे द्वयामुष्या- | अतीत खण्डमें अन्नकी अप्राप्तिसे होनेवाली उच्छिष्ट और पर्युषित (बासी) अन्नभक्षणरूप कष्टमयी अवस्थाका वर्णन किया गया था, वैसी अवस्थाकी प्राप्ति न हो— इसलिये अब इससे आगे अन्न-प्राप्तिके लिये शौव—श्वानोंद्वारा देखे हुए उद्गीथ—उद्गान साम-का आरम्भ किया जाता है। <br><br> यहाँ प्रसिद्ध है कि बकनामक दाल्भ्य—दल्भका पुत्र अथवा ग्लाव-नामक मैत्रेय—मित्राका पुत्र स्वाध्याय करनेके लिये ग्रामसे बाहर 'उद्वव्राज' एकान्त देशमें स्थित जलाशयके समीप गया। यहाँ 'वा' शब्द 'च' |
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खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| यणो ह्यसौ। वस्तुविषये क्रियास्विव विकल्पानुपपत्तेः। <br><br> “द्विनामा द्विगोत्रः” इत्यादि हि स्मृतिः। दृश्यते चोभयतः पिण्डभाक्त्वम्। उद्गीथे बद्धचित्त्वाद्दृष्टावनादराद्वा वाशब्दः स्वाध्यायर्थः। स्वाध्यायं कर्तुं ग्रामाद्बहिरुद्वव्राजोद्गतवान्विविक्तदेशस्थोदकाभ्याशम्। | (और) के अर्थमें हैं। अवश्य ही वह द्व्यामुष्यायण है, क्योंकि वस्तुके विषयमें क्रियाओंके समान विकल्प होना सम्भव नहीं है। <br><br> “द्विनामा द्विगोत्रः” इत्यादि वाक्य स्मृतिमें प्रसिद्ध भी है। [जिस गोत्रमें पुत्र उत्पन्न होता है और जहाँ वह धर्मपूर्वक गोद लिया जाता है उन] दोनोंका उससे पिण्डग्रहण करना लोकमें भी देखा ही जाता है। अथवा उद्गीथविद्यामें बद्धचित्त होनेसे ऋषियोंमें अनादर होनेके कारण ‘वा’ शब्दका प्रयोग स्वाध्यायके लिये किया गया है। |
| उद्वव्राज प्रतिपालयाञ्चकारेति चैकवचनाल्लिङ्गादेकोऽसावृषिः। श्रोद्गीथकालप्रतिपालनादृषेःस्वाध्यायकरणमन्नकामनयेति लक्ष्यत इत्यभिप्रायः॥१॥ | ‘उद्वव्राज’ और ‘प्रतिपालयाञ्चकार’ इन क्रियाओंमें एकवचन होनेसे सिद्ध होता है कि यह एक ही ऋषि है। [तृतीय मन्त्रमें कथित] श्वानोंके उद्गीथकालकी प्रतीक्षा करनेसे तात्पर्यतः यह लक्षित होता है कि ऋषिका स्वाध्याय करना अन्नकी कामनासे है॥ १॥ |
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</div>१४० छाान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
१४० छाान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
तस्मै श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमे-
त्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ॥२॥
उसके समीप एक श्वेत कुत्ता प्रकट हुआ। उसके पास दूसरे कुत्तों ने आकर कहा—'भगवन् ! आप हमारे लिये अन्न का आगान कीजिये, हम निश्चय ही भूखे हैं' ॥ २ ॥
| स्वाध्यायेन तोषिता देवत-<br>र्षिर्वा श्वरूपं गृहीत्वा श्वा श्वेतः<br>संस्तस्मा ऋषये तदनुग्रहार्थं<br>प्रादुर्बभूव प्रादुश्चकार । तमन्ये<br>शुक्लं श्वानं क्षुल्लकाः श्वान उप-<br>समेत्योचुरक्तवन्तोऽन्नं नाऽस्मभ्यं<br>भगवानागायत्वागानेन निष्पा-<br>दयत्वित्यर्थः । | स्वाध्यायसे संतुष्ट हो उस<br>ऋषिके निमित्त—उसपर अनुग्रह<br>करनेके लिये [ कोई ] देवता या<br>ऋषि श्वानरूप धारणकर श्वेत कुत्ता<br>बनकर प्रकट हुआ। उस श्वेत कुत्तेसे<br>दूसरे छोटे-छोटे कुत्तों ने समीप<br>आकर कहा—'भगवन् ! आप हमारे<br>लिये अन्नका आगान कीजिये अर्थात्<br>आगानके द्वारा अन्न प्रस्तुत कीजिये।' | | मुख्यप्राणं वागादयो वा<br>प्राणमन्वन्नभुजःस्वाध्यायपरि-<br>तोषिताः सन्तोऽनुगृह्णीयूरेनं<br>श्वरूपमादायेति युक्तमेवं प्रतिप-<br>त्तुम् । अशनायाम वै बुभुक्षिताः<br>स्मो वा इति ॥ २ ॥ | अथवा मुख्य प्राणसे वागादि<br>गौण प्राणोंने इस तरह कहा, क्योंकि<br>मुख्य प्राणके पीछे अन्न ग्रहण<br>करनेवाले वागादि गौण प्राण उसके<br>स्वाध्यायसे संतुष्ट हो श्वानरूप<br>धारणकर उसपर अनुग्रह करें—<br>ऐसा मानना उचित ही है। 'अवश्य<br>ही हमें अशन (भोजन) की इच्छा है<br>अर्थात् हम निश्चय ही भूखे हैं' ॥२॥ |
तान्होवाचेहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाञ्चकार ॥ ३ ॥
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्याथ १४१
उनसे उस (श्वेत श्वान) ने कहा—'तुम प्रातःकाल यहीं मेरे पास आना।' तब दाल्भ्य बक अथवा मैत्रेय ग्लाव उनकी प्रतीक्षा करता रहा ॥ ३ ॥
| एवमुक्ते श्वा श्वेत उवाच तान्क्षुल्लकाञ्श्वन इहैवास्मिन्नेव देशे मा मां प्रातः प्रातःकाल उपसमीयातेति । दैर्घ्यं छान्दसं समीयातेति प्रमादपाठो वा । प्रातःकालकरणं तत्काल एव कर्तव्यार्थम् । अन्नदस्य वा सवितुरपराह्णेऽनाभिमुख्यात् ।<br><br>तत्तत्रैव ह बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेय ऋषिः प्रतिपालयाञ्चकार प्रतीक्षणं कृतवानित्यर्थः ॥ ३ ॥ | ऐसा कहे जानेपर श्वेत कुत्तेने उन छोटे-छोटे कुत्तोंसे कहा—तुम प्रातःकाल इसी स्थानपर मेरे पास आना। 'समीयात' इस क्रियापदमें दीर्घपाठ छान्दस है अथवा प्रमादके कारण है। प्रातःकालकी जो नियुक्ति की गयी है वह उसी समय उद्गानकी कर्तव्यता सूचित करनेके लिये अथवा मध्याह्नोत्तर कालमें अन्नदाता सूर्य उद्गाताके सम्मुख नहीं रहता—यह सूचित करनेके लिये है।<br><br>तब दाल्भ्य बक अथवा मैत्रेय ग्लाव नामक ऋषि उसी स्थानपर 'प्रतिपालयाञ्चकार'–प्रतीक्षा करता रहा–यह इसका तात्पर्य है ॥ ३ ॥ |
— : o : —
ते ह यथैवेह बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः सँरब्धाःसर्पन्तीत्येवमाससृपुस्ते ह समुपविश्य हिं चक्रुः॥४॥
उन कुत्तोंने, जिस प्रकार कर्ममें बहिष्पवमान स्तोत्रसे स्तवन करनेवाले उद्गाता परस्पर मिलकर भ्रमण करते हैं उसी प्रकार भ्रमण किया और फिर वहाँ बैठकर हिंकार करने लगे ॥ ४ ॥
१४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| ते श्वानस्तत्रैवागम्य ऋषेः समक्षं यथैवेह कर्माणि बहिष्पवमानेन स्तोत्रेण स्तोष्यमाणा उद्गातृपुरुषाः संरब्धाः संलग्ना अन्योन्यमेन मुखेनान्योन्यस्य पुच्छं गृहीत्वा ससृपुरासृप्तवन्तः परिभ्रमणं कृतवन्त इत्यर्थः । त एवं संसृप्य समुपविश्योपविष्टाः सन्तो हिं चक्रुर्हिंकारं कृतवन्तः ॥ ४ ॥ | उन कुत्तोंने वहाँ उस ऋषिके सम्मुख आकर, जिस प्रकार कर्ममें बहिष्पवमान स्तोत्रसे स्तवन करनेवाले उद्गातालोग एक-दूसरेसे मिलकर चलते हैं उसी प्रकार मुँहसे एक-दूसरेकी पूँछ पकड़कर सर्पण–परिश्रमण किया । उन्होंने इस प्रकार परिश्रमण कर फिर वहाँ बैठकर हिंकार किया ॥ ४ ॥ |
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कुत्तोंद्वारा किया हुआ हिंकार
ओ ३ मदा ३ मों ३ पिबा ३ मों ३ देवो वरुणः प्रजापतिः सविता २ न्नमिहा २ हरदन्नपते ३ ऽन्नमिहा २ हरा २ हरो ३ मिति ॥ ५ ॥
ॐ हम खाते हैं, ॐ हम पीते हैं, ॐ देवता, वरुण, प्रजापति, सूर्यदेव यहाँ अन्न लावें। हे अन्नपते ! यहाँ अन्न लाओ, अन्न लाओ, ॐ ॥ ५ ॥
| ओमदामों पिबामों देवो द्योतनात्, वरुणो वर्षणाज्जगतः, प्रजापतिः पालनात्प्रजानाम्, सविता प्रसवितृत्वात्सर्वस्यादित्य उच्यते । एतैः पर्यायैः स एवंभूत आदित्योऽन्नमस्मभ्यमिहाहरदाहरत्विति । | ॐ हम खाते हैं, ॐ हम पीते हैं, ॐ। आदित्य ही द्योतनशील होनेके कारण देव, जगत्की वर्षा करनेके कारण वरुण, प्रजाओंका पालन करनेसे प्रजापति तथा सबका प्रसविता होनेके कारण सविता कहा जाता है । इन पर्यायोंके कारण ऐसे गुणोंवाले वे आदित्य हमारे लिये यहाँ अन्न लावें । |
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४३
| त एवं हिं कृत्वा पुनरप्यूचुः— <br><br> स त्वं हेऽन्नपते ! स हि सर्वस्यान्नस्य प्रसवितृत्वात्पतिः । न हि तत्पाकेन विना प्रसूत मन्नमणुमात्रमपि जायते प्राणिनाम् । अतोऽन्नपतिः । हेऽन्नपतेऽन्नमस्मभ्यमिहाहराहरेति । अभ्यास आदरार्थः । ओमिति ॥ ५ ॥ | इस प्रकार हिंकार कर उन्होंने फिर भी कहा—‘वही तू हे अन्नपते ! —सम्पूर्ण अन्नका उत्पत्तिकर्ता होनेके कारण वही अन्नपति है, क्योंकि उसके पाक बिना उत्पन्न हो जानेपर भी प्राणियोंके लिये अणुमात्र भी अन्न उत्पन्न नहीं होता, अतः वह अन्नपति है—हे अन्नपते ! तू हमारे लिये यहाँ अन्न ला।’ ‘आहर’ इस शब्दकी पुनरावृत्ति आदरके लिये है। ओमिति—[ यह पद उपासनाकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ] ॥ ५ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥
त्रयोदश खण्ड
सामावयवभूत स्तोभाक्षरसम्बन्धिनी उपासनाएँ
| भक्तिविषयोपासनं सामावयवसंबद्धमित्यतः सामावयवान्तरस्तोभाक्षरविषयाण्युपासनान्तराणि संहतान्युपदिश्यन्तेऽनन्तरं सामावयवसंबद्धत्वाविशेषात्— | सामभक्ति-विषयक उपासना सामावयवोंसे सम्बद्ध है । अतः यहाँसे आगे सामके एक अवयवमात्र स्तोभाक्षरविषयक अन्य संहत उपासनाओंका वर्णन किया जाता है, क्योंकि उनका भी सामावयवरूपसे [ सामभक्तिके साथ ] सम्बद्ध होना समान ही है— |
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अयं वाव लोको हाउकारो वायुर्हाइकारश्चन्द्रमा अथकारः । आत्मेहकारोऽग्निरीकारः ॥ १ ॥
यह लोक ही हाउकार है, वायु हाइकार है, चन्द्रमा अथकार है, आत्मा इहकार है और अग्नि ईकार है ॥ १ ॥
| अयं वावायमेव लोको हाउकारः स्तोभो रथन्तरे साम्नि प्रसिद्धः । 'इयं वै रथन्तरम्' इत्यस्मात्संबन्धसामान्याद्धाउकारस्तोभोऽयं लोक इत्येवमुपासीत । वायुर्हाइकारः । वामदेव्ये साम्नि हाइकारः प्रसिद्धः । वाय्वप्संबन्धश्च वामदेव्यस्य साम्नो यानि | यह लोक ही रथन्तर साममें प्रसिद्ध हाउकार स्तोभ है । 'यही रथन्तर है' इस सम्बन्धसामान्यसे हाउकार स्तोभ ही यह लोक है-इस प्रकार उपासना करे । वायु हाइकार है; वामदेव्य साममें हाइकार स्तोभ प्रसिद्ध है । वायु और जलका सम्बन्ध ही वामदेव्य सामका मूल |
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खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४५
| शाङ्करभाष्यम् | शाङ्करभाष्यार्थ |
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| रिति । अस्मात् सामान्याद्वाइ-<br>कारं वायुदृष्ट्योपासीत ।<br><br>चन्द्रमा अथकारः । चन्द्र-<br>दृष्ट्याथकारमुपासीत । अन्ने हीदं<br>स्थितम् । अन्नात्मा चन्द्रः ।<br>थकाराकारसामान्याच्च । आत्मे-<br>हकारः । इहेति स्तोभः प्रत्यक्षो<br>ह्यात्मेहेति व्यपदिश्यते, इहेति<br>च स्तोभः, तत्सामान्यात् । अग्नि-<br>रीकारः । ईनिधनानि चाग्नेयानि<br>सर्वाणि सामानीत्यतस्तत्सामा-<br>न्यात् ॥ १ ॥ | है । अतः इस समानताके कारण हाइकार सामकी वायुदृष्टिसे उपा-<br>सना करनी चाहिये ।<br>चन्द्रमा अथकार है । अथकारकी उपासना चन्द्रदृष्टिसे करनी चाहिये, क्योंकि यह (चन्द्रमा) अन्नमें ही स्थित है । चन्द्रमा अन्नस्वरूप ही है । थकार और अकारमें समानता होनेके कारण भी [अन्नरूप चन्द्रमा-<br>की अथकाररूपसे उपासना करनी चाहिये ] आत्मा इहकार है; 'इह' यह [ एक प्रकारका ] स्तोभ होता है । प्रत्यक्ष ही आत्मा 'इह' ऐसा कहकर निर्देश किया जाता है और 'इह' ऐसा स्तोभ भी होता है, अतः उसकी समानताके कारण [ आत्मा इहकार है ] । अग्नि ईकार है । सम्पूर्ण आग्नेय साम 'ई' में समाप्त होनेवाले हैं । अतः उस सदृशताके कारण अग्नि ईकार है ॥ १ ॥ |
आदित्य ऊकारो निह्नव एकारो विश्वे देवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिंकारः प्राणः स्वरोऽन्नं या वाग्विराट् ॥ २ ॥
आदित्य ऊकार है, निह्नव एकार है, विश्वेदेव औहोयिकार हैं, प्रजापति हिंकार है तथा प्राण स्वर है, अन्न या है एवं विराट् वाक् है ॥ २ ॥
१४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| आदित्य ऊकारः। उच्चैरूर्ध्वं सन्तमादित्यं गायन्तीत्यूकारश्चायं स्तोभः। आदित्यदैवत्ये साम्नि स्तोभ ऊ इत्यादित्य ऊकारः। निहव इत्याह्वानमेकारः स्तोभः। एहीति चाह्वयन्तीति तत्सामान्यात्। विश्वे देवा औहोयिकारः। वैश्वदेव्ये साम्नि स्तोभस्य दर्शनात्। प्रजापतिर्हिंकारः। अनिरुक्तत्वाद्विंकारस्य चाव्यक्तत्वात्। | आदित्य ऊकार है; ऊँचा अर्थात् ऊपरकी ओर स्थित आदित्यका ही [उद्गाता लोग] गान करते हैं, अतः ऊकार ही यह स्तोभ है। आदित्य देवतासम्बन्धी साममें ऊ स्तोभ है, अतः आदित्य ऊकार है—[ ऐसी उपासना करे ]। निहव आह्वानको कहते हैं; वह एकार स्तोभ है, क्योंकि 'एहि' ऐसा कहकर लोग पुकारा करते हैं, उस सादृश्यके कारण [ निहव एकार है ]। विश्वेदेव औहोयिकार हैं, क्योंकि वैश्वदेव्य साममें यह स्तोभ देखा जाता है। प्रजापति हिंकार है, क्योंकि उसका किसी प्रकार निर्वचन नहीं किया जा सकता तथा हिंकार भी अव्यक्त ही है। |
| घ्राणः स्वरः, स्वर इति स्तोभः। घ्राणस्य च स्वरहेतुत्वसामान्यात्। अन्नं या। या इति स्तोभोऽन्नम्। अन्नेन हीदं यातीत्यतस्तत्सामान्यात्। वागिति स्तोभो विराडन्नं देवताविशेषो वा। वैराजे साम्नि स्तोभदर्शनात् ॥ २ ॥ | प्राण स्वर है; 'स्वर' यह एक प्रकारका स्तोभ है। स्वरका कारण होनेमें उससे प्राणकी सदृशता होनेके कारण [प्राण स्वर है]। अन्न या है। 'या' यह स्तोभ अन्न है, क्योंकि अन्नसे ही यह प्राणी यात्रा करता है अतः उसकी समानता होनेके कारण अन्न या है। 'वाक्' यह स्तोभ विराट्—अन्न अथवा देवताविशेष है, क्योंकि वैराज साममें वाक् स्तोभ देखा जाता है॥२॥ |
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खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्याथ [ १४७
अनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः संचरो हुंकारः ॥३॥
जिसका [ विशेषरूपसे ] निरूपण नहीं किया जाता और जो [ कार्यरूपसे ] संचार करनेवाला है वह तेरहवाँ स्तोभ हुंकार है ॥ ३ ॥
| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी (अनुवाद) |
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| अनिरुक्तोऽव्यक्तत्वादिदं चेदं चेति निर्वक्तुं न शक्यत इत्यतः संचरो विकल्प्यमानस्वरूप इत्यर्थः। कोऽसौ ? इत्याह- त्रयोदशः स्तोभो हुंकारः। अव्यक्तो ह्ययमतोग्निरुक्तविशेष एवोपास्य इत्यभिप्रायः ॥ ३ ॥ | जो अव्यक्त होनेके कारण 'यह और यह' इस रूपसे निरूपित नहीं किया जा सकता, इसलिये अनिरुक्त है और संचर अर्थात् विकल्प्यमानस्वरूप है, वह क्या है ? सो बतलाते हैं—वह तेरहवाँ स्तोभ हुंकार है। वह अव्यक्त ही है, अतः अनिरुक्तविशेषरूपसे ही उपासनीय है—यह इसका अभिप्राय है ॥ ३ ॥ |
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स्तोभाक्षरसम्बन्धिनी उपासनाओंका फल
| स्तोभाक्षरोपासनाफलमाह— | अब स्तोभाक्षरोंकी उपासनाका फल बतलाते हैं— |
दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवꣳसाम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद ॥४॥
जो इस प्रकार इस सामसम्बन्धिनी उपनिषद्को जानता है उसे वाणी, जो वाणीका फल है उस फलको देती है तथा वह अन्नवान् और अन्न भक्षण करनेवाला होता है ॥ ४ ॥
| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी (अनुवाद) |
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| दुग्धेऽस्मै वाग्दोहमित्याद्युक्तार्थम् । य एतामेवं यथोक्त- | 'दुग्धेऽस्मै वाग्दोहम्' इत्यादि-वाक्यका अर्थ पहले (छा० १।३।७ में) कहा जा चुका है। जो |
१४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| लक्षणां साम्नां सामावयवस्तोभाक्षरविषयामुपनिषदं दर्शनं वेद तस्यैतद्यथोक्तं फलमित्यर्थः। द्विरभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्त्यर्थः सामावयवविषयोपासनाविशेषपरिसमाप्त्यर्थो वेति ॥ ४ ॥ | इस उपर्युक्त लक्षणविशिष्ट सामको सामावयवभूत स्तोभाक्षरसम्बन्धिनी उपनिषद्को जानता है, उसे यह पूर्वोक्त फल मिलता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। ‘उपनिषदं वेद उपनिषदं वेद’ यह पुनरुक्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है। अथवा सामावयवविषयक उपासनाविशेषकी समाप्ति बतानेके लिये है ॥ ४ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये
त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१३॥
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इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य-
श्रीमच्छंकरभगवत्पादकृतौ छान्दोग्योपनिषद्विवरणे
प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥ १ ॥
द्वितीय अध्याय
द्वितीय अध्याय
प्रथम खण्ड
साधुदृष्टिसे समस्त सामोपासना
| ओमित्येतदक्षरमित्यादिना सामावयवविषयमुपासनमनेकफलमुपदिष्टम् । अनन्तरं च स्तोभाक्षरविषयमुपासनमुक्तम् । सर्वथापि सामैकदेशसम्बद्धमेव तदिति । अथेदानीं समस्ते साम्नि समस्तसामविषयाण्युपासनानि वक्ष्यामीत्यारभते श्रुतिः । युक्तं ह्येकदेशोपासनानन्तरमेकदेशिविषयमुपासनमुच्यत इति । | [प्रथम अध्यायमें स्थित] 'ओमित्येतदक्षरम्' इत्यादि मन्त्रके द्वारा अनेक फल देनेवाली सामावयवसम्बन्धिनी उपासनाओंका उपदेश किया गया। उसके पश्चात् सामके अवयवभूत स्तोभाक्षरविषयिणी उपासनाका निरूपण हुआ। वह भी सर्वथा सामके एकदेशसे ही सम्बन्ध रखती है। इसके बाद अब मैं समस्त साममें होनेवाली अर्थात् समस्त सामसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासनाओंका वर्णन करूँगी—इस आशयसे श्रुति आरम्भ करती है। एकदेश [अर्थात् अवयव] से सम्बन्ध रखनेवाली उपासनाके अनन्तर एकदेशी (अवयवी) से सम्बद्ध उपासनाका वर्णन किया जाता है—यह ठीक ही है। |
ॐ समस्तस्य खलु साम्न उपासनꣳसाधु यत्खलु साधु तत्सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥१॥
१५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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ॐ समस्त सामकी उपासना साधु है। जो साधु होता है उसको साम कहते हैं और जो असाधु होता है वह असाम कहलाता है ॥१॥
| समस्तस्य सर्वावयवविशिष्टस्य पाञ्चभक्तिकस्य सप्तभक्तिकस्य चेत्यर्थः। खल्विति वाक्यालंकारार्थः साम्न उपासनं साधु। समस्ते साम्नि साधुदृष्टिविधिपरत्वान्न पूर्वोपासननिन्दार्थत्वं साधुशब्दस्य। <br><br> ननु पूर्वत्राविद्यमानं साधुत्वं समस्ते साम्न्यभिधीयते, न; साधु सामेत्युपास्त इत्युपसंहारात्। साधुशब्दः शोभनवाची कथमवगम्यते ? इत्याह-यत्खलु लोके साधु शोभनमनवद्यं प्रसिद्धं तत्सामेत्याचक्षते कुशलाः। यदसाधु विपरीतं तदसामेति ॥ १ ॥ | समस्त अर्थात् सम्पूर्ण अवयवोंसे युक्त यानी पाञ्चभक्तिक और साप्तभक्तिक सामकी उपासना साधु है। 'खलु' यह निपात वाक्यकी शोभा बढ़ानेके लिये है। समस्त साममें साधुदृष्टिका विधान करनेमें प्रवृत्त होनेके कारण साधु शब्द पूर्व उपासनाकी निन्दाके लिये नहीं है। <br><br> यदि कहो कि पूर्व उपासनामें न रहनेवाली ही साधुता समस्त साममें बतलायी जाती है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि [पूर्वोक्त उपासनाका] 'साम साधु है इस प्रकार उपासना करे' ऐसा कहकर उपसंहार किया है। 'साधु' शब्द शोभन अर्थका बोधक है—यह कैसे जाना जाता है ? इसपर कहते हैं—लोकमें जो वस्तु साधु—शोभन अर्थात् निर्दोष-रूपसे प्रसिद्ध है उसको निपुणजन 'साम' ऐसा कहकर पुकारते हैं। तथा जो असाधु यानी विपरीत होती है, उसको असाम कहते हैं ॥१॥ |