भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 978 में से

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पृष्ठ 165

चतुर्थ खण्ड

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जलविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना

सर्वास्वप्सु पञ्चविधꣳसामोपासीत मेघो यत्संप्लवते स हिंकारो यद्वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥ १ ॥

सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकारके सामको उपासना करे। मेघ जो घनीभावको प्राप्त होता है—वह हिंकार है, वह जो बरसता है—वह प्रस्ताव है, [ नदियाँ ] जो पूर्वकी ओर बहती हैं, वह उद्गीथ है तथा जो पश्चिमकी ओर बहती हैं वह प्रतिहार है और समुद्र निधन है ॥ १ ॥


भाष्यम्भाषानुवाद
सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामो-<br><br>पासीत । वृष्टिपूर्वकत्वात्सर्वासा-<br><br>मपामानन्तर्यम् । मेघो यत्संप्ल-<br><br>वत एकीभावेनेतरेतरं घनीभवति<br><br>मेघो यदा उन्नतस्तदा संप्लवत<br><br>इत्युच्यते । तदापामारम्भः<br><br>स हिंकारः। यद्वर्षति स प्रस्तावः,सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकार-<br>के सामकी उपासना करे । सम्पूर्ण<br>जल वृष्टिपूर्वक ही होते हैं इस-<br>लिये वृष्टिविषयक उपासनाके बाद<br>जलविषयक उपासनाका निरूपण<br>किया गया है । मेघ जो संप्लवन<br>करता है अर्थात् परस्पर एक होकर<br>घनीभूत होता है [ ‘संप्लवते’ का<br>‘घनीभूत होता है’ अर्थ इसलिये<br>किया गया है कि ] जब मेघ ऊँचा<br>होता है उस समय वह संप्लवन<br>करता है—ऐसा कहा जाता है ।<br>उस घनीभूत होनेके ही समय<br>जलोंका प्रारम्भ होता है; अतः<br>संप्लवन ही हिंकार है । वह जो