भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 978 में से

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पृष्ठ 164
१६०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| स्तनयति स प्रतिहारः, प्रतिहृतत्वात् ॥ १ ॥ | कड़कती है—वही प्रतिहत होने (इधर-उधर फैलने) के कारण प्रतिहार है ॥ १ ॥ |


उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान्वृष्टौ पञ्चविधँसामोपास्ते ॥ २ ॥

मेघ जो जल ग्रहण करता है—यह निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है उसके लिये वर्षा होती है और वह [ स्वयं भी ] वर्षा करा लेता है ॥ २ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
उद्गृह्णाति तन्निधनम्, समाप्तिसामान्यात् । फलमुपासनस्य–वर्षति हास्मै। इच्छाताः। तथा वर्षयति हासत्यामपि वृष्टौ य एतदित्यादि पूर्ववत् ॥२॥[ बादल ] जो जल ग्रहण करता है यह निधन है, क्योंकि समाप्तिमें इन दोनोंकी समानता है [ अर्थात् जलग्रहण और निधन दोनों अन्तिम कार्य हैं ] । अब इस उपासनाका फल बतलाते हैं—उसके इच्छानुसार मेघ वर्षा करता है, तथा वृष्टिके न होनेपर भी वह वर्षा करा लेता है। 'य एतदेवम्' इत्यादि शेष वाक्यका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये॥२॥

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥