भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 978 में से

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पृष्ठ 166
१६२छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय २

| आपः सर्वतो व्याप्तुं प्रस्तुताः । <br><br> याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथः, <br><br> श्रैष्ठ्यात् । याः प्रतीच्यः स <br><br> प्रतिहारः प्रतिशब्दसामान्यात् । <br><br> समुद्रो निधनम्, तन्निधनत्वा- <br> दपाम् ॥ १ ॥ | बरसता है उसीको प्रस्ताव कहा जाता है, क्योंकि उसी समय जल-का सर्वत्र प्रसार आरम्भ होता है। जो जल [गङ्गादि नदियोंके रूपमें] पूर्वकी ओर बहते हैं वे उत्कृष्ट होनेके कारण उद्गीथ और जो प्रतीची (पश्चिम) की ओर बहते हैं वे 'प्रति' शब्दमें समान होनेके कारण प्रतिहार कहे जाते हैं तथा समुद्र निधन है, क्योंकि उसीमें जलोंका संचय होता है ॥ १ ॥ |

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न हाप्सु प्रेत्यप्सुमान्भवति य एतदेवं विद्वान्सर्वा- स्वप्सु पञ्चविधꣳसामोपास्ते ॥ २ ॥

जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष सब प्रकारके जलोंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है वह जलमें नहीं मरता और जलसे सम्पन्न होता है ॥ २ ॥

| न हाप्सु प्रैति, नेच्छति चेत् । अप्सुमान्म्मान्भवति फलम् ॥ २ ॥ | यदि वह इच्छा न करे तो जलमें मृत्युको प्राप्त नहीं होता तथा वह अप्सुमान् अर्थात् [इच्छानुकूल] जलसे सम्पन्न होता है—यह इस (उपासना) का फल है ॥ २ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥

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