छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 168, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 168
| १६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
| फलम्— | इस उपासनाका फल— |
|---|
कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान्भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधँसामोपास्ते ॥ २ ॥
जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ऋतुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है उसे ऋतुएँ अपने अनुरूप भोग देती हैं और वह ऋतुमान् ( ऋतुसम्बन्धी भोगोंसे सम्पन्न ) होता है ॥ २ ॥
| कल्पन्ते ह ऋतुव्यवस्थानुरूपं भोग्यत्वेनास्मा उपासकायर्तवः। ऋतुमानार्तवैर्भोगैश्च संपन्नो भवतीत्यर्थः ॥ २ ॥ | इस उपासनाके लिये ऋतुएँ अपने कालकी व्यवस्थाके अनुरूप फल भोग्य-रूपसे उपस्थित करनेमें समर्थ होती हैं और वह ऋतुमान् होता है, अर्थात् ऋतु-सम्बन्धी भोगोंसे सम्पन्न होता है ॥ २ ॥ |
|---|
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥