छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५३
| अतः स यः कश्चित्साधु सामेति साधुगुणवत्सामेत्युपास्ते समस्तं साम साधुगुणवद्विद्वांस्तस्यैतत्फलम् अभ्याशो ह क्षिप्रं ह, यदिति क्रियाविशेषणार्थम्, एनमुपासकं साधवः शोभना धर्माः श्रुतिस्मृत्यविरुद्धा आ च गच्छेयुरागच्छेयुश्च । न केवलमागच्छेयुरुप च नमेयुरुपनमेयुश्च भोग्यत्वेनोपतिष्ठेरित्यर्थः ॥ ४ ॥ | अतः वह जो कोई पुरुष साम साधु है यानी साम साधुगुणविशिष्ट है-ऐसी उपासना करता है अर्थात् समस्त सामको साधु गुणवाला जानता है उसे यह फल मिलता है, इस उपासकको जो श्रुति-स्मृतिसे अविरुद्ध शुभ धर्म हैं, वे अभ्यास अर्थात् शीघ्र ही प्राप्त हो जाते हैं। यहाँ जो 'यत्' पद है वह क्रियाविशेषणके लिये है। केवल प्राप्त ही नहीं होते उसके प्रति विनम्र भी हो जाते हैं, अर्थात् भोग्यरूपसे उपस्थित हो जाते हैं।४। |
इति च्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥