छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 209, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २१ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०५
| त्वात्प्रतिहारत्वम् । सर्पादीनां धकारसामान्यान्निधनत्वम् ।<br><br>एतत्साम नामविशेषाभावात्सामसमुदायः सामशब्दः सर्वस्मिन्प्रोतम् । त्रयीविद्यादि हि सर्वम् । त्रयीविद्यादिदृष्ट्या हिंकारादिसामभक्तय उपास्याः। अतीतेष्वपि सामोपासनेषु येषु प्रोतं यद्यत्साम तद्दृष्ट्या तदुपास्यमिति । कर्माङ्गानां दृष्टिविशेषेणाज्यस्येव संस्कार्यत्वात् ॥ १ ॥ | और धकारमें समानता होनेके कारण सर्पादिका निधनत्व बतलाया गया है ।*<br><br>यह साम—किसी नामविशेषका अभाव होनेके कारण यह सामसमुदाय अर्थात् 'साम' शब्द सबमें अनुस्यूत है । त्रयीविद्या आदि ही सब कुछ हैं; तथा त्रयीविद्या आदि दृष्टिसे ही हिंकार आदि सामभक्तियोंकी उपासना करनी चाहिये । पीछे बतलायी हुई सामोपासनाओंमें भी जिन-जिनमें जो-जो साम अनुस्यूत है इन त्रयीविद्या आदिकी दृष्टिसे ही उनकी उपासना करनी चाहिये । [ 'पत्न्यवेक्षितमाज्यं भवति' इस वाक्यके अनुसार पत्नीकी दृष्टि पड़नेसे ] जैसे आज्य संस्कारयुक्त होता है, उसी प्रकार सभी कर्माङ्ग दृष्टिविशेषसे ही संस्कार किये जाने योग्य हैं ॥ १ ॥ |
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| सर्वविषयसामविदः फलम्— | सर्वविषयक सामके विद्वान्को मिलनेवाला फल— |
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स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतं वेद सर्वꣳह भवति ॥ २ ॥
* यहाँ 'सर्प' शब्दका पर्याय 'विषधर', 'फणधर' आदि कोई धकारविशिष्ट शब्द लेना चाहिये; जैसा कि २।२।१ के भाष्यमें भाष्यकारने अन्तरिक्षको उद्गीथ बतलाते हुए अन्तरिक्षके पर्यायभूत गकारविशिष्ट 'गगन' शब्दका ग्रहण किया है ।