छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| २३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| प्रातःसवनं वसवो यजमानाय सम्प्रयच्छन्ति ॥ ६ ॥ | ले लिया जाता है । तब वे वसुगण यजमानको प्रातःसवन प्रदान करते हैं ॥ ६ ॥ |
मध्याह्नसवनमें रुद्रसम्बन्धी सामगान
पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योदङ्मुख उपविश्य स रौद्रँसामाभि गायति ॥ ७ ॥
मध्याह्नसवनका आरम्भ करनेसे पूर्व यजमान दक्षिणाग्निके पीछे उत्तराभिमुख बैठकर रुद्रदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है ॥ ७ ॥
| तथाग्नीध्रीयस्य दक्षिणाग्नेर्जघनेनोदङ्मुख उपविश्य स रौद्रं सामाभिगायति यजमानो रुद्रदैवत्यं वैराज्याय ॥ ७ ॥ | तथा आग्नीध्रीय यानी दक्षिणाग्निके पीछेकी ओर उत्तराभिमुख बैठकर यजमान वैराज्यपदकी प्राप्तिके लिये रुद्रदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है ॥ ७ ॥ |
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लो३कद्वारमपावा३र्णू ३३ पश्येम त्वा वयं वैरा ३ ३ ३ ३ ३ हु ३ म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३ २ १ १ १ इति ॥ ८ ॥
[ हे वायो ! ] तुम अन्तरिक्षलोकका द्वार खोल दो, जिससे कि वैराज्यपदकी प्राप्तिके लिये हम तुम्हारा दर्शन कर सकें ॥ ८ ॥
अथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एतास्मि ॥ ९ ॥