भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 978 में से

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पृष्ठ 282

द्वादश खण्ड

गायत्रीद्वारा ब्रह्मकी उपासना

यत एवमतिशयफलैषा ब्रह्म-विद्यातः सा प्रकारान्तरेणापि वक्तव्येति गायत्री वा इत्याद्यारभ्यते । गायत्रीद्वारेण चोच्यते, ब्रह्मणः सर्वविशेषरहितस्य नेति नेतीत्यादिविशेषप्रतिषेधगम्यस्य दुर्बोधत्वात्। सत्स्वनेकेषुच्छन्दःसु गायत्र्या एव ब्रह्मज्ञानद्वारतयोपादानं प्राधान्यात् । सोमाहरणादितरच्छन्दोऽक्षराहरणेनेतरच्छन्दो-क्योंकि इस प्रकार ब्रह्मविद्या अतिशय फलवती है इसलिये उसका अन्य प्रकारसे भी वर्णन करना चाहिये; इसीसे 'गायत्री वा' इत्यादि मन्त्रका आरम्भ किया जाता है। गायत्रीद्वारा भी ब्रह्मका ही निरूपण किया जाता है, क्योंकि 'नेति नेति' इत्यादि प्रकारसे विशेषोंके प्रतिषेध-द्वारा अनुभूत होनेवाला सर्वविशेष-रहित ब्रह्म कठिनतासे समझमें आने-वाला है। अनेकों छन्दोंके रहते हुए भी प्रधानताके कारण गायत्रीका ही ब्रह्मज्ञानके द्वाररूपसे ग्रहण किया जाता है। सोमाहरण^१ करनेसे अन्य छन्दोंके अक्षरोंको लानेसे^२,

१. एक बार सोमाभिलाषी देवताओंने सोम लानेके लिये गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती—इन तीन छन्दोंको नियुक्त किया; परंतु असमर्थ होनेके कारण जगती और त्रिष्टुप्—ये दो छन्द तो मार्गमेंसे ही लौट आये, केवल एक गायत्री छन्द ही सोमके पास जा सका और वही सोमके रक्षकोंको परास्त कर उसे देवताओंके पास लाया। यह कथा ऐतरेय ब्राह्मणमें 'सोमो वै राजाऽमुष्मिल्लोक आसीत्' इस प्रसङ्गमें आयी है।
२. गायत्रीके सिवा जो और छन्द सोम लानेके लिये गये थे वे मार्गमें ही थक जानेके कारण अपने कुछ अक्षर छोड़ आये थे। जगतीके तीन अक्षर और त्रिष्टुपका एक अक्षर—ये मार्गमें रह गये थे। इन्हें लाकर गायत्रीने उनकी पूर्ति की।