छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 340, कुल 978 में से
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| ३३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| पश्यन्ति ? वासरमहरहरिव तत्सर्वतो व्याप्तं ब्रह्मणो ज्योतिः। | कहती है—] वासर अर्थात् दिनके समान सर्वत्र व्याप्त उस ब्रह्मकी ज्योतिको देखते हैं । |
| निवृत्तचक्षुषो ब्रह्मविदो ब्रह्मचर्यादिनिवृत्तिसाधनैः शुद्धान्तःकरणा आ समन्ततो ज्योतिः पश्यन्तीत्यर्थः । परः परमिति लिङ्गव्यत्ययेन, ज्योतिष्परत्वात्; यदिष्यते दीप्यते दिवि द्योतनवति परस्मिन्ब्रह्मणि वर्तमानम्, तेन ज्योतिषेद्धः सविता तपति चन्द्रमा भाति विद्युद्विद्योतते ग्रहतारागणा विभासन्ते । | तात्पर्य यह है कि जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंसे निवृत्त हो गयी हैं वे ब्रह्मचर्य आदि निवृत्तिके साधनोंद्वारा शुद्धचित्त हुए ब्रह्मवेत्ता उस ज्योतिको सब ओर देखते हैं । जो ज्योति 'दिवि' द्योतनवान् परब्रह्ममें देदीप्यमान है; तथा जिस ज्योतिसे दीप्त होकर सूर्य तपता है, चन्द्रमा प्रकाशित होता है, बिजली चमकती है तथा ग्रह और तारागण विशेष रूपसे भासते हैं । यहाँ 'परः' यह शब्द [नपुंसकलिङ्ग] 'ज्योतिः'के साथ अन्वित है, इसलिये इसका लिङ्ग बदल कर 'परम्' ऐसा समझना चाहिये । |
| किं चान्यो मन्त्रदृगाह यथोक्तं ज्योतिः पश्यन्—उद्वयं तमसोऽज्ञानलक्षणात्परि परस्तादिति शेषः । तमसो वापनेद्यज्ज्योतिरुत्तरमादित्यस्थं परिपश्यन्तो वयमुदगन्मेति व्यवहितेन संबन्धः । तज्ज्योतिः स्वः स्वमात्मीयमस्मद्धृदि स्थितम्, | तथा उपर्युक्त ज्योतिको देखनेवाला एक दूसरा मन्त्रद्रष्टा कहता है—अज्ञानरूप अन्धकारसे अतीत [ जो परम तेज है ] अथवा अन्धकारकी निवृत्ति करनेवाला जो सूर्यमण्डलस्थ उत्कृष्ट तेज है उसे देखते हुए हम प्राप्त हुए—इस प्रकार इसका व्यवधानयुक्त क्रियासे सम्बन्ध है । वह ज्योति 'स्व'—आत्मीय अर्थात् हमारे |